माँ, मुझको पति चाहिए


माँ, मुझको पति रूप में,
बस वो एक खत्री चाहिए।
माँ, पिता को भी अब ये,
बात पता चलनी चाहिए।
मत पूछ की उसमे ऐसा है क्या?
रोबीला, छबीला, गठीला है वो हाँ.
शातिर है, चालक है, चालबाज है वो,
मुझे ऐसा ही मर्द खतरनाक चाहिए।
माँ, पिता को भी अब ये,
बात पता चलनी चाहिए।
आँखों से जो मदहोस कर दे,
बाहों में लेके जो खामोश कर दे.
तारे, चाँद, ना ये सितारे चाहिए,
बस खत्री के आँगन में एक खाट चाहिए।
माँ, पिता को भी अब ये,
बात पता चलनी चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जंग


जंग कभी सितारों में नहीं होती,
जब की चाँद केवल एक है.
क्यों की उनको पता है,
चाँद सिर्फ बेवफा होता है.
जंग पतंगों में भी नहीं होती,
जब की शमा भी केवल एक है.
क्यों की उनको भी पता है,
इश्क़ में मरना सिर्फ पतंगों को है.
जंग तो भौरों में भी नहीं होती,
कलियों के रास को लेकर।
क्यों की भौरें जानते हैं,
साँझ होते ही कालिया,
वफ़ा – महब्बत सब भूल जाती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हम फिर से कुरुक्षेत्र का निर्माण करेंगे


हार जिंदगी का अंत नहीं।
हार अगली जीत का शुभारम्भ हैं.
वो जीत कर कोइसिस करेंगे खुद को बचाने की,
हम हार कर कोसिस करेंगे,
खुद को उठाने की,
लोगो को जगाने की.
वो जीत कर दम्भ करेंगे,
हम हार कर उठान करेंगे।
लोहिया को तोड़ न सके,
वो बार – बार हरा कर.
बोस को मिटा न सके,
वो जूठी अफवाहे उठा कर.
वो जीत कर सत्ता को प्राप्त करेंगे,
हम हार कर पुनः संघर्ष और प्रयास करेंगे।
जीत उनकी भी अमर नहीं,
और हार मेरी भी अटल नहीं।
हम फिर से इस कुरुक्षेत्र का निर्माण करेंगे।
मेरे अंत तक इस सत्ता परिवर्तन,
को आवाहन करेंगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो कैसे संभाले?


दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
मुरादों को जला दिया है,
उम्मीदों को कब का दफना दिया है.
फिर भी आँखे जो देखें खवाब,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
रास्तों, गलियों, शहर तक छोड़ के उनका,
इन घने वीरानों में बैठें हैं.
फिर भी हवाएं उड़ा लाएं दुप्पट्टा,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
होंठों की प्यास को नसीब मान लिया है,
उनकी बेवाफ़ाई को अपना जहाँ मान लिया है.
फिर भी कोई आँचल ढलका दे,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?

 

परमीत सिंह धुरंधर

सवाल


उस ने फिर मेरा हाल पुछा है कितना मुश्किल सवाल पुछा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं दिया जलाता रहूँगा


लड़ाई होगी,
जब तक आसमान मुझे मेरी जगह न दे दे.
मैं दिया जलाता रहूँगा,
हर अँधेरी राह में,
जब तक सूरज मेरे आँगन में अपनी किरण न बिखरा दे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नजर


जवानी के तीर थे,
नजर को मशहूर कर गए.
जब – जब ढलका उनका आँचल,
शहर में सरे – आम, कत्ले – आम कर गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तमन्ना


सुबह तो हो जाती है तुम्हारी आँखों से,
ना जाने कब रात होगी तुम्हारी जुल्फों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

निगाहें


निगाहें ही काफी हैं,
यह दर्द जगाने के लिए.
आदाओं को रखों,
घूँघट उठाने के बाद,
बिजली गिराने के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

You are Jwala Gutta


 

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I am Parmit Crassa,
You are Jwala Gutta.
मिल जाएँ हम तो,
लूट लें ये सारी दुनिया।
I am Parmit Crassa,
You are Jwala Gutta.
नजर में कुछ भी नहीं,
बस जिगर में तुम हो.
तुम मान जाओ तो,
बसा ले अपनी छोटी सी दुनिया।
I am Parmit Crassa,
You are Jwala Gutta.

Figure was from google image.

परमीत सिंह धुरंधर