कटे पंखों से भी उड़ सकता है पंक्षी,
अगर उसके घोसलें में बच्चों की चहचहाट हो.
चूल्हे की आग से झुलसती जिस्म को क्या पता प्यास की?
अगर उसके बच्चों के मुख पे खिली मुस्कराहट हो.
परमीत सिंह धुरंधर
Respect Mom and not the religion
कटे पंखों से भी उड़ सकता है पंक्षी,
अगर उसके घोसलें में बच्चों की चहचहाट हो.
चूल्हे की आग से झुलसती जिस्म को क्या पता प्यास की?
अगर उसके बच्चों के मुख पे खिली मुस्कराहट हो.
परमीत सिंह धुरंधर
Respect Mom and not the religion
मैं कान्हा ना बन पाया,
पर तू यशोदा ही है माँ.
मैं राम ना कहला पाया,
पर तू कशोल्या ही है माँ.
मैं ना तोड़ पाया तेरे बंधन,
पर तूने मुझे झूला झुलाया।
मैं शिवा जी सा ना लड़ पाया,
पर तू जीजाबाई ही है माँ.
परमीत सिंह धुरंधर
Respect mom and not religion.
बहुत दौलत कमा के मैंने माँ से पूछा,
बोल माँ तुझे क्या चाहिए?
तो माँ बोली, “चल गरम कहना बनाया है, खा ले जल्दी से.”
परमीत सिंह धुरंधर
जब उसने मेरे दिल को तोड़ा,
ठोकर – पे ठोकर लगा के.
तब मुझे एहसास हुआ, धुप में,
नंगे पैर चलती माँ के प्यार का.
परमीत सिंह धुरंधर
Respect mom and not religion.
जो सिर्फ सूरत देख के मुस्करा दे,
वो माँ है.
जो जेब की भार देख के मुस्कराए,
वो औरत है.
जो कीचड़-मिटटी से सने देह को,
अपने सबसे सुन्दर साड़ी से पोंछे,
वो माँ है.
जो रात में बाहों में आके भी, बाजार की,
साड़ियों और गहनों की बात करे,
वो औरत है.
परमीत सिंह धुरंधर
बहुत दौलत कमा के भी,
जब खुशियाँ दूर ही रही.
तो हमने घुंघरुओं पे,
लुटा दी साड़ी दौलत।
माँ के लिए,
एक साड़ी भी नहीं खरीद सके,
ये गम रहा हमको।
उस सुकून को,
फिर से पाने के लिए,
पहनते हैं पैंट में लगा कर पैबंद।
परमीत सिंह धुरंधर
तुम्हारी लबों से होकर गुजरा जो पल,
फीका लगने लगा ये ताजो – ये तख़्त।
एक पल में सब गुरुर बिखरने लगा,
कितना बड़ा फकीर है ये शहंशाहे-हिन्द।
परमीत सिंह धुरंधर
माई कहले बारी,
तहसे हम बात ना करीं,
की तू बड़ा बदनाम बड़ा हो.
हमार माई कहले बारी,
तहके घर ले चलीं,
की ताहार नाक बाटे सुन्दर बड़ा हो.
चलअ, हटअ पीछे, हमके मत छेडअ हमके,
बाबुल से पहले मांगअ ई हाथ हो.
देखअ ताहरा खातिर कंगन ले आइल बानी,
पाहिले पहनाएम ई ताहरा हाथ हो.
देखअ हाथे तक रहअ, पहुँचा मत धरअ,
हमार धड़कअता अब दिल हो.
त छोड़अ माई – बाबुल के चिंता,
अब हो जाएगअ सार खेल हो.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी आँखे मुझसे कह रही है,
यूँ साँसों की दूरी अब अच्छी नहीं।
तो छोड़ दे ये शर्म ए गोरी,
तेरी कोरी जवानी अब अच्छी नहीं।
कब तक संभालेंगे बाबुल तुझको,
ढलकने लगा है तेरा आँचल।
यूँ मायके में चढ़ती जवानी अच्छी नहीं।
अंगों में तेरे इतना कसाव,
जैसे मन में छुपा हैं कोई डर.
यूँ डरती – खामोश जवानी अच्छी नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
हम चाहें हुस्न वालों को,
मेरी ऐसी औकात नहीं।
सीधे -सादे इंसानों के लिए,
हुस्न के पास कोई सौगात नहीं।
इससे अच्छा की लगा दे जिंदगी,
अगर खुदा की राह में,
तो कोई बरक्कत हो जाए.
मक्कारी के अलावा,
हुस्न की झोली में कुछ भी नहीं।
कल रात मेरी कलम ने मुझसे कहा,
२५ दिन हो गए,
तुमने मुझे छुआ तक नहीं।
किसी के जिस्म को क्या छुऊँ?
किसी भी हुस्न में,
ऐसी विरह की आग नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
There is no desire left for you as my brain feels attraction for creativity and simplicity.