जीवन हो तो शिव सा


जीवन हो तो शिव सा,
सर्वश दान कर दूँ.
मैं चखुं बस विष को,
जग को अमृत-पान दूँ.
अवघड कहे जग मुझे,
या भभूत-धारी।
या फिर योगी बन के,
मैं भटकता रहूँ।
पर भगीरथ के एक पुकार पे,
मैं प्रलय को बाँध दूँ.
जीवन हो तो शिव सा,
सर्वश दान कर दूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

वर


मुझे इतना ज्ञान तू दे पिता,
की भूखा भी मैं मुस्कराता रहूँ।
अन्धकार मिले मेरी आँखों को,
या तिरस्कार मिले इस जीवन को,
मैं हर पल तेरा नाम गाता रहूँ।
पतन भी हो जीवन का अगर,
मैं पाप कर्म भी करता रहूँ अगर.
मुझे इतना वर तू दे पिता,
मैं हर पल वेदो को पढ़ता रहूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

भगवान शिव


जीवन की हर धारा पे,
शिव आपका किनारा हो.
कुछ मिले न मिले मुझे,
हे पिता, मुझे तेरा सहारा हो.
मैं अज्ञानता से बंधा हुआ,
आप दिव्या ज्ञान के भंडारी।
मैं पाप कर्म में डूबा हुआ,
आप पुण्य के अवतारी।
हर दंड है स्वीकार मुझे,
बस तेरी गोद में मेरा बसेरा हो.

परमीत सिंह धुरंधर

प्यासा


लो,
दर्द के अपने कुछ किस्से,
आज तुम्हे भी सुना दूँ.
जो कुछ मीठा है मेरे पास,
आज तुम्हे भी चखा दूँ.
मुझे अब भूख नहीं लगती,
और तुम आज भी भूखे हो.
तो लो,
बैठो।
अपनी थाली में से कुछ,
आज तुम्हे भी खिला दूँ.
खा लो,
पर अब पानी मत माँगना.
वो मेरे पास मीठा नहीं,
खरा है.
तुम प्यास मिटाने के लिए जी रहे,
मैं प्यासा ही जी रहा हूँ.
की उसे पी कर,
मैं आज तक,
प्यासा ही जी रहा हूँ,
प्यासा ही जी रहा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रावण


मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
वो कैलाश पे विराजे,
मेरे बुलंद हैं इरादे।
उनके ही छात्र-छाया में,
मैं बढ़ रहा निरंतर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
उनके ही चरणों में,
मैं सर हूँ नवाता।
उनके ही दर्शन से,
मेरा भाग्य खिल जाता।
मैं पुत्र उनका हूँ,
अज्ञानी – अपराधी।
और वो पिता हैं मेरे,
धर्म – ज्ञान के धुरंधर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
कैलाश को उठाया,
अपने बाजुओं पे.
त्रिलोक को दला है,
मैने अपने बल से.
सब-कुछ है समर्पित,
भोलेनाथ के चरणों में,
उन्ही की आशीष से है,
मेरे साँसों का ये समंदर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट है शिव-शंकर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नगरिया चलल बा ये भोला


नगरिया चलल बा ये भोला,
डगरिया उठल बा ये भोला,
तहरे ही धाम अब ई रुकी,
भक्तन के टोला ये बाबा.
केहू के तन्वा में पीड़ा उठल बा,
केहू के मनवा में आंधी मचल बा,
सबके दिल के आस बा ,
तहरे दुअरिया पे बाबा .
अन्ख्वा के लोर त सुख गईल बा,
मनवा त अभी बैचेन बा,
कब तक आँचल ई एसे रही, सुखल आ खाली ये बाबा,
भर दिहिन अब त भक्तन के झोला ये बाबा.
आ व ना मान जा अब, पूरा कर अ परमित के कामना,
ताहरा से बढ़ के कें बाटे ये संसारिया में बाबा.
कभी-कभी त उठेला मनवा में हाम्रो आस हाँ,
तहरे से जुरल बा भक्तन के सारा ख्वाब हाँ,
अब त सुन के पुकार आँखवा त खोलीं ये बाबा,
ल देख अ आइल्बानी तहरे वोसरिया ये बाबा.
डगरिया भरल बा ये भोला,
नजरिया लागल बा ये भोला.
नगरिया……………..ये बाबा.

परमीत सिंह धुरंधर

शिव


जहाँ शिव हैं, वहाँ शक्ति.
तुम निश्छल हो बाबा,
हम बंधे हैं लोभ से.
जहाँ शिव हैं, वहाँ भक्ति.
तुम महाकाल हो बाबा,
हम भयभीत है काल से.
जहाँ शिव है, वहाँ मुक्ति.

परमीत सिंह धुरंधर

दुखिया


तानी सुनी न दिलवा के बतिया,
कोरा-कोरा मन बा, कोरा रे रतिया।
ए भोला तानी सुनी ना,
का कह अ तारी दुखिया।
गावें-गावें खेलनी,
सावन के झूला भी,
सब सखियाँ के गोद भरल,
बस रह गैनी हम ही,
कोरा-कोरा हमर आचार, कोरा रे देहिया।
तानी सुनी न दिलवा के बतिया,
कोरा-कोरा मन बा, कोर रे रतिया।
ए भोला तानी सुनी ना,
का कह अ तारी दुखिया।

शिव


तुम शिव हो, तुम शंकर हो,
इस जगत के तुम सवामी निरंतर हो।
मैं अज्ञानी पापी प्रभु,
ज्ञान के तुम सागर-समुन्दर हो.
तुम कालजयी, कालनायक,
विश्व के तुम संहारक हो.
मैं तुच्छं-सुक्ष्म,विरह-वाशना से बंधा,
निर्गुण के तुम धुरंधर हो.

शिवमई गंगा


Image

लहरा कर बोले शिवशंकर,
बांध लूँगा गंगा को इन्ही ज्टावों में,
तो हंस कर बोली गंगा,
जाउंगी पाताललोक,
शिवशंकर,
कमंडल ये साथ लेके.
हर-हर शिवशंकर,
हाहाकार गंगा,
शांत-अविचल शिवशंकर,
प्रलयंकारी गंगा.
उफनती,
गरजती,
जो चल दी धाराएं,
तो डोली ये धरती,
और,
कांपी दिशाएं,
थर्राने लगा,
जो कैलाश भी थर-थर,
तो योगी की,
टूटी गहरी निन्द्राएं.
तमक कर बोले शिवशंकर,
बांध लूँगा गंगा को इन्ही ज्टावों में,
तो हंस कर बोली गंगा,
जाउंगी पाताललोक,
शिवशंकर,
कमंडल ये साथ लेके.
निश्छल भोले शिवशंकर,
विध्वंशकारी गंगा,
परोपकारी शिवशंकर,
तेजमयी गंगा.
आगे-आगे भागीरथ,
पीछे विध्वंश,
धुल-धुश्रित भागीरथ,
मन में मचा एक द्वन्द.
क्या हो जायेगा सृष्टीका,
आज यहाँ अंत,
क्या मिट न सकेगा,
कुल से मेरे ये कलंक.
व्याकुल मन से,
पुकार उठे भागीरथ,
कहाँ हो बाबा शिवशंकर?
डम-डम शिवशंकर,
माहमई गंगा,
योगरुपी शिवशंकर,
योगमई गंगा.
धीरे-धीरे,
चारो और,
फैल गयी काली जटाएं,
सोंख लिया,
एक-एक बूंद,
ना रहीं धाराएँ.
विलुप्त हो गयीं,
धरती पे आकर,
विष्णुप्रिया गंगा.
धिरधारी शिवशंकर,
प्रचंद्कारी गंगा,
सर्प्धारी शिवशंकर,
विनाशकारी गंगा.
चीत्कार उठे भागीरथ,
अब कहाँ से लाऊं गंगा.
तो हंस कर बोले,
शिवशंकर,
लो प्रकट भयीं, परमित,
अब शिवमई गंगा,
ममतामई गंगा,
कल्याणकारी गंगा.