ना मैं देवो को मैं मानता,
ना मैं गुरुवों को जानता,
मैं रणभूमि तक आ गया हूँ,
बस पिता को ही मैं पूजता,
तो,
करों सामना मेरी तीरों का,
की मैं ही अर्जुन हूँ.
ना तन को देखो, ना कद को,
की नशों में दौड़ता,
मैं वो ही ख़ून हूँ.
माँ के गर्भ में ही,
पढ़ लिया था पाठ,
मैने अपने पिता से.
करों सामना मेरे बल का,
मैं ही श्वेतवाहन हूँ.
न उत्तरा का हूँ मैं,
ना मैं सुभद्रा का,
ना ही मैं हूँ कृष्णा का,
ना मैं बलराम का,
नाता मेरा बस एक ही है,
परमीत, की मैं ही अर्जुन हूँ,
हाँ, मैं ही अर्जुन हूँ.
Category: Mahabharat
परमीत और पराजय
ठोकर खायी मोहब्बत में जिस दिन,
मुझको भी नारी का ज्ञान हुआ,
अभिमान था मुझे अपने योवन पे,
पर मैं भी भीष्म सा पराजित हुआ.
लेकर जिनको बाहों के घेरे में,
मैं इतराता रहता था,
जब चौरस खेली उनके नाम की,
तो मैं भी युधिष्ठिर सा पराजित हुआ.
मैंने उखड़ा है कितने ही सर्पो के,
जबड़े से उनके दांतों को,
मगर बात आई जब मेरे जीवन की,
तो परमीत,
मैं भी परीक्षित सा पराजित हुआ.
जीत-हार
न जीत न हार, सत्य है प्यार
क्या जीते थे राम, रावण का अंत कर
क्या जीते थे राम, सीता का त्याग कर
क्या जीते थे पांडव, दुर्योधन का अंत कर
क्या जीते थे पांडव, भीष्म का अंत कर
जीत कर भी, होती है अक्सर हार,
कर दे इस, माया का त्याग
रस है इस, जीवन का त्याग
सत्य है प्यार, न जीत न हार
by a friend
मैं उस पिता का पुत्र हूँ
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो धरती पे किसी से हारा नहीं,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो उर्वशी पे भी डिगा नहीं।
खडग उठा लिया है जब,
तो करो मेरा सामना महारथियों,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जिसका तीर कभी चूका नहीं।
शिशु समझ के मौत का भय,
किसको दिखा रहे हो,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो रण में शिव से भी डरा नहीं।
तुम उन्माद में हो अपने शौर्य के,
मैं जवानी में चढ़ के आया,
रौंद के हर दिशा से जाऊँगा तुम्हे,
ये अपनी माँ से मैं कह के आया।
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जिसका रथ कभी रुक नहीं।
मैं उस पिता का ‘परमीत’ पुत्र हूँ,
जिसका धवज कभी झुका नहीं।
अभिमन्यु
काश तुम होते हमारे साथ पिता जी,
तो हम यूँ अकेले न होते।
इस मोड़ पे जिंदगी के,
यूँ तन्हा-तन्हा न होते।
अभिमन्यु बढ़ा है,
तुम्हारी शान में,
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल इस मैदान में,
जग करता रहेगा,
तुम्हारा गुणगान पिता जी,
काश तुम होते हमारे साथ पिता जी।