विश्वामित्र और मेनका


मुझे कोई उपेक्षा नहीं,
की तुम सीता – सावित्री बन के रहो,
मगर ये भी तो कहो,
जब कह ही रही हो खुद ही,
की अब तक कितनो को,
सीता – सावित्री बनके छला है.
मैं उन पंडितों में नहीं जिन्हे बस,
विश्वामित्र का दम्भ ही दिखा है,
मैं वो पंडित हूँ,
जिसकी कलम ने हमेसा,
मेनका को बस चरितहीन ही लिखा है.
भूख से बिलखते बच्चे को जिसने छोड़ा,
बस इंद्रा और सवर्ग के चाह में,
लिखते रहे सब उसको बस नारी की विवसता,
मैंने उसको बस व्याभिचार ही लिखा है.

परमीत सिंह धुरंधर

कुरुक्षेत्र II


कर्म ही जीवन,
कर्म ही साधन।
कर्म ही,
मानव का संसाधन।
कर्म ही साँसे,
कर्म ही आँखें।
कर्म से ही,
मानव का भाग्योदय।
कंटीले पथ पे,
कर्म ही राही।
मृत्यु-शैया पे,
कर्म ही साथी।
कर्म ही पुण्य,
कर्म ही पाप.
कर्म ही,
मानव का लाभ.
कर्म ही वेद-पुराण,
कर्म ही गुरु-ज्ञान,
कर्म ही,
मानव का अभिमान।
कर्म से बंधे है सभी,
कर्म से उठे, और मिटे है सभी.
कर्म से ही, सजा,
ये कुरुक्षेत्र है.
इस कुरुक्षेत्र में भी,
सबमे भेद, बस उनका कर्म है.

परमीत सिंह धुरंधर

कुरुक्षेत्र


मेरा विस्तार देख,
मेरा आकार देख.
मैं ही हूँ सृष्टि,
आज मुझको साक्षात देख.
आँखों से अपने,
ज्ञान को मिटा के.
मूरख बनके तू,
मेरा प्रमाण देख.
सब कुछ मेरा है,
मुझसे बना है.
एक दिन सबको फिर,
मुझमे ही मिलना है.
तेरा है क्या यहाँ,
तूने क्या रचा है.
जिसके मोह में तू,
इतना बंधा है.
तेरा ये ज्ञान,
ये तीर – कमान।
सब मेरा है,
मुझसे बंधा है.
मैं न जो चाहूँ,
तो न गांडीव हिले।
न तुझसे,
एक भी तीर चले.
शुक्र कर मेरा तू,
ए मूरख।
मैंने अपने इस यज्ञ में,
बस तुझको ही पुरोहित चुना है.
मैं ही हूँ द्रोण में,
मैं ही हूँ कर्ण में.
मैं ही हूँ भीम का बल,
मैं ही दुर्योधन – धृतराष्ट में.
मैं ही पालक विष्णु,
मैं ही संहारक शिव हूँ.
मैं शिशु के भूख में,
मैं ही हूँ माँ के दूध में.
जब मुझको ही मोह नहीं,
अपनों के नाश का.
जब मुझको ही भय नहीं,
मेरी रची सृष्टि के सर्वनाश का.
फिर क्यों तू इतना,
इनसे बंधा है.
जिनके प्रेम में तू,
इतना जकड़ा है.
उनके ही तीरों पे,
तेरा नाम चढ़ा है.
फिर तू क्यों इतना,
अपने कर्म – पथ से डिगा है.
तूने देखा है अब तक,
प्रेम मेरा।
आज मेरे संग,
मेरी लीला भी देख.
तूने देखा है,
द्रोण – भीष्म की शक्ति यहाँ।
अब इस धरा पे,
उनकी मुक्ति भी देख.
बिना सुदर्शन के,
मेरी युद्ध – नीति भी देख.
सबके प्रेम में बंधा हूँ मैं,
मगर मेरी आत्मा की,
इनसे मुक्ति भी देख.
बढ़ मेरे साथ आज इस पथ पे,
मेरे ह्रदय में प्रज्जवलित अग्नि को देख.
ये सर्वनाश नहीं,
एक आरम्भ है.
मेरे साथ तू आज,
एक नए युग का शुभारंभ भी देख.

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन हो तो शिव सा


जीवन हो तो शिव सा,
सर्वश दान कर दूँ.
मैं चखुं बस विष को,
जग को अमृत-पान दूँ.
अवघड कहे जग मुझे,
या भभूत-धारी।
या फिर योगी बन के,
मैं भटकता रहूँ।
पर भगीरथ के एक पुकार पे,
मैं प्रलय को बाँध दूँ.
जीवन हो तो शिव सा,
सर्वश दान कर दूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

जहाँ राम की हो गयीं जानकी


जहाँ बुध हुए, महावीर हुए,
और दुनिया को मिली शान्ति.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ गंगा बहतीं, गंगा उमरती,
और राम की हो गयीं जानकी.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ गुरु मिले, गोबिंद मिले,
और मिल जाए सबको मुक्ति.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ गुप्त हुए, मौर्य हुए,
और बूढ़े कुँवर ने खडग उठा ली.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.
जहाँ दिनकर हुए, नेपाली हुए,
और बाबा नागार्जुन ने पहनी,
विद्रोह की चोली.
वो धरती है बिहार की,
वो धरती है बिहार की.

परमीत सिंह धुरंधर

जय श्री राम-1


जब – जब जीवन ने,
संघर्ष किया।
सागर ने रोकी राहें,
पत्थरों ने साथ दिया.
जब छूट गए अपने,
कोसों दूर.
सत्य की लड़ाई में,
भील, रीक्ष और बानरों ने,
संग युद्ध किया.
जब – जब सत्ता ने,
संहार किया.
मौन हुए जब वेद-पाठी,
और देव-गण.
एक नारी के संघर्ष में,
पक्षियों (जटायुं) ने,
युद्ध आरम्भ किया.
जग को सिखला गए प्रभु,
राम-रूप में,
सत्य की राह पे मानव ने,
भगवान से बढ़के काम किया.
जब – जब जीवन ने,
संघर्ष किया।
सागर ने रोकी राहें,
पत्थरों ने साथ दिया.

परमीत सिंह धुरंधर

जय श्री राम


बल से बड़ी बुद्धि,
बुद्धि से बड़ी भक्ति.
जो राम की चरणो में है,
उसी की है मुक्ति.
जिसके एक ही नाम से,
पत्थर तक जुड़ गए.
सागर की लहरों को मथ के,
किनारों को जोड़ गए.
जहाँ सूझे ना,
कुछ भी आकर,
वहाँ काम आती है बस,
राम-नाम की युक्ति.
बस छूकर अहिल्या को.
पत्थर की मूरत से,
नारी-रूप दिया.
चखकर जूठे बेरों को,
भील सबरी को,
माँ का सुख दिया.
जग में कभी नहीं है,
प्रेम से बड़ी कोई शक्ति.
बल से बड़ी बुद्धि,
बुद्धि से बड़ी भक्ति.
जो राम की चरणो में है,
उसी की है मुक्ति.

परमीत सिंह धुरंधर

पिता-पुत्र की जोड़ी


वो पिता-पुत्र की जोड़ी,
बड़ी अलबेली दोस्तों।
एक अर्जुन,
एक अभिमन्युं दोस्तों।
एक ने रौंदा था,
भीष्म को रण में.
एक ने कुरुक्षेत्र में,
कर्ण-द्रोण को दोस्तों।

परमीत सिंह धुरंधर

बाप ने जिंदगी दी है, बाप के लिए जिंदगी दे दूंगा.


मेघनाथ: प्रणाम काका श्री. अच्छा हुआ, आप दिख गए. मई असमंजस में था की आप से मिलकर रणभूमि में जाऊं या जाकर मिलूं।
विभीषण: पुत्र, मैं तो तुम्हारा सदा से शुभचिंतक रहा हूँ. मेरी तुमसे कोई बैर नहीं है पुत्र.
मेघनाथ: हा हा हा हा!! काका श्री, पिता से बैर और उसके पुत्र से प्रेम। मैं वैसा पुत्र नहीं हूँ.
विभीषण: मैं तुम्हारे पिता का सागा भाई हूँ, उनका बैरी नहीं।
मेघनाथ: तो दुश्मनों की छावनी में क्यों ?
विभीषण: क्यों की, लंकेश धर्म भूल चुके हैं. तुम तो ज्ञानी हो. मैंने भ्राता कुम्भकर्ण को भी समझाया। तुम्हे भी कहता हूँ, ये युद्ध छोड़ के श्री राम के शरण में आ जाओ. इसमें हम सब का भला छुपा है.
मेघनाथ: बहुत-बहुत धन्यवाद काका श्री। अगर सबका भला इसी में छुपा रहता तो आपकी माता श्री आज यहाँ आपके साथ होती, वहाँ लंका में नहीं।
मेघनाथ: अगर श्री राम भगवान भी है, और स्वयं नारायण भी अपने असली रूप में आ जाएँ, तो भी मैं लंका का प्रतिनिधित्व करूंगा।
मेघनाथ: आखिर में इतना ही कहूँगा, काका श्री की “बाप ने जिंदगी दी है….. बाप के लिए जिंदगी दे दूंगा।”

परमीत सिंह धुरंधर

विश्वामित्र – मेनका: एक प्रेम कथा या बलात्कार


विश्वामित्र – तुम मेरा प्रेम ठुकरा कर उस इंद्रा की सभा में नाचना चाहती हो. मैंने वैसे कितने इन्द्रलोक बना कर छोड़ दिए मेनका।
मेनका – तुमने इन्द्रलोक तो जरूर बनाये विश्वामित्र, पर तुम कभी भी स्वयं इंद्रा नहीं बन पाये।
विश्वामित्र – तो क्या तुम्हारा प्रेम सिर्फ इंद्रासन पे बैठे व्यक्ति से है? अच्छा है, मैं कभी इंद्रा नहीं बना! मैं अपने प्रेम को हारते तो देख सकता हूँ, लेकिन बिकते नहीं।
मेनका – प्रेम क्या है? विशवमित्र पहले ये तो जान लो फिर हारने और बेचने की बात करना। मैं तो जिससे प्रेम करती हूँ उसके लिए तुम क्या, रावण के पास भी चली जाऊं। तुम प्रेम की बात करते अच्छे नहीं लगते, जिसने एक पशु को पाने की जिद्द पे अपनी हज़ारों रानियों को छोड़ दिया।
विश्वामित्र – मेनका। मैंने उनको नहीं छोड़ा, वल्कि अपना सबकुछ छोड़ दिया। उनका कुछ नहीं छिना है. और मैंने अपने स्वार्थ के लिए उनका जिस्म और चरित्र तो दाँव पे नहीं लगाया है. मैंने तुम्हारे प्रेमी की तरह उन्हें वशिष्ठ के पास तो नहीं भेजा।
मेनका – हाहाहाहा! विश्वामित्र, चरित्र बुढ़ापे की चादर है, जवानी को इसकी जरुरत नहीं। और मैं तो चिरकाल तक योवन की मालिक रहूंगी।
विश्वामित्र – तो ये कैसा योवन है तुम्हारा मेनका? तुम इस योवन से अपने प्रेमी की प्यास भी नहीं मिटा सकती। जो कभी भटकता हुआ अहिल्या तो कभी दस्यु-सुंदरियों की चरणो में लेटता है. वो तुम्हे नाचता तो जरूर है मेनका, लेकिन वो अधिकार नहीं देता जो देवी शुचि को प्राप्त है.
मेनका-ये चरित्र, ये अधिकार, ये गौरव मिथ्या शब्द हैं तुम जैसे हारे हुए पुरुष ढाल बना लेते हैं अपनी नपुंसकता छुपाने के लिए. जिनके योवन में आकर्षण नहीं, जो प्यास नहीं जगा सकती, वैसी नारियां ही ये धारण करती हैं. चरित्र कभी भी स्त्रियों का आभूषण नहीं रहा. तुम जिसे चरित्रहीनता समझते हो, वो तो स्त्रियों का असली आभूषण है. अगर हम ऐसा नहीं करे तो फिर क्या हमारा योवन। भोग पुरुषों के लिए पाप के रूप में वर्णित हैं वेदों में, हम स्त्रियों के लिए नहीं।
मेनका – विश्वामित्र, मैं तुम्हे उस सुख सुविधा के लिए तो नहीं छोड़ रही, ना ही अमरत्व के लिए स्वयं से इंद्रा के पास जा रही हूँ. मैं तुम्हे छोड़ रही हूँ क्यों की इंद्रा मुझे चाहने लगे हैं. मैं तुम्हे पहले दिन ही छोड़ देती अगर उन्हें मेरी याद आती. मैं इतने दिन तुम्हारे साथ रही, ये मेरा प्रेम नहीं था. ये तो तुम्हारी अज्ञानता हैं, तुमने मेरे मन को कभी समझा ही नहीं की. तुम तो मेरा शोषण करते रहे, मेरा वलात्कार करते रहे.
विश्वामित्र – मेनका!!!
मेनका – हाँ विश्वामित्र, तुमने मेरा वलात्कार किया है इतने साल, हर एक रात, हर एक पल. और तुम कैसे सोच रहे हो की मैं, एक स्त्री, एक वलात्कारी के साथ रहूंगी। मैं तो तुम्हे छोड़ देती अगर वशिष्ठ मुझे चाहते, क्यों की वो ही धरती पे तुमसे श्रेष्ठ हैं.
विश्वामित्र – तो क्या प्रेम सिर्फ श्रेष्ठ आभूषण की चाहत हैं.
मेनका – हा हा !! विश्वामित्र, तुम कभी ज्ञानी नहीं हो सकते। मैं तो कल इंद्रा को भी छोड़ दूँ अगर नारायण, महादेव या ब्रम्हदेव मुझे चाहने लगे. और मुझे इंद्रा इसलिए पसंद है की वो मुझे तुम्हारी तरह, प्रेम-प्रेम कह कर नहीं रोकेगा। वो तो खुश रहेगा ये सोच कर की कुछ पल तो आंनद के मिले।

परमीत सिंह धुरंधर