दूध पिलाती मेनका


बिन पैसे का प्रेम दिखा दे,
तो मैं भी बिक जाऊं तुझपे।
माँ जैसी सच्ची कोई महबूब दिखा दे,
तो मैं भी बिक जाऊं तुझपे।
कब तक,
नारी देवी है- इसका जय-घोष करोगी।
बस दूध पिलाती मेनका दिखला दे,
तो मैं भी बिक जाऊं तुझपे।

परमीत सिंह धुरंधर

अर्जुन-कृष्ण


विकराल रूप ले के भगवान बोलें,
अरे खोल अर्जुन अब तू अपनी आँखे।
सृष्टि का आज तुझे मैं सच दिखलाऊं,
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।
ऐसा नहीं जो मुझसे न हो बंधा,
ऐसा नहीं जो न हो मेरा यहाँ।
मैं ही नदियों की धारा,
मैं पर्वत हूँ।
मैं ही पुष्प उपवन का,
मैं उसका भ्रमर हूँ।
मैं रात का अंधियारा,
मैं ही सूरज का ताप हूँ।
मैं नारी का सौंदर्य,
मैं ही पुरुष का काम हूँ।
आज तेरे हर भ्रम को मैं हर जाऊं।
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।
सुनहरे अक्षरों में जब इतिहास लिखेगा,
वीरों से पहले तेरा नाम लिखेगा।
धर्म की आज ऐसी होगी स्थापना,
सदियों तक धरती पे तेरा नाम गूजेंगा।
आज तुझे साक्षात हरी से मिलाऊँ।
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।
ये हैं भीष्म, जिनकी तू गोद में खेला,
ये हैं गुरु द्रोण जिनसे तुम्हे ज्ञान है मिला।
द्रौपदी की लाज इनके सामने उतरी,
चौरस की बाजी पे जब तू था बिका।
ये भाई, बंधू, सखा, सहोदर,
इनसे पूछ तो जरा।
उस दिन तो भूल गए थे तुझसे नाता,
और आज क्यों, फिर हर कोई,
तेरे विरुद्ध है खड़ा।
इस रणभूमि में तुझको,
आज अपने -पराये का भेद समझाऊं।
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।
तू जिन्हे समझता है अपना,
वो तेरे विरुद्ध हैं खड़े।
देख, तेरे गैर, आज तेरे लिए,
मौत से भिड़ने को हैं डटे।
तू नहीं उठाएगा जो गांडीव अपनी,
भीष्म, द्रोण, कर्ण,
वो तेरे अपनों का संहार करेंगे।
इस रणभूमि में तुझको,
आज कर्म का पाठ पढ़ाऊं।
माया-मोह सब ह्रदय से तेरे मिटाऊं।

परमीत सिंह धुरंधर

सुलोचना और मेघनाथ


रणभूमि में उतर चला हूँ,
शायद लौट के ना आ पाऊं,
पर याद बहुत आ रहे हो पिता।
की जिन पत्थरों को उड़ा देता था,
तुम्हारी संरक्षण में तीरों से।
आज उन्ही का आकार देख कर,
डर गया हूँ मैं पिता।
सुलोचन की आँखों और,
माँ के प्यार से भी ज्यादा।
दुश्मनो के बीच में,
याद आ रही है तेरी गोद ए पिता।

परमीत सिंह धुरंधर

द्रौपदी


सुरक्षा की उमीदें पतियों से लगा कर,
द्रौपदी बैठी थी श्रृंगार करने,
युधिष्ठिर से धर्म निभाकर।
अपने सामर्थ्य को भुला दिया,
पिता-भाई के बल को देखकर।
आंसू बहा रही थी,
अधर्मियों को धर्म बता कर।

परमीत सिंह धुरंधर

वर


मुझे इतना ज्ञान तू दे पिता,
की भूखा भी मैं मुस्कराता रहूँ।
अन्धकार मिले मेरी आँखों को,
या तिरस्कार मिले इस जीवन को,
मैं हर पल तेरा नाम गाता रहूँ।
पतन भी हो जीवन का अगर,
मैं पाप कर्म भी करता रहूँ अगर.
मुझे इतना वर तू दे पिता,
मैं हर पल वेदो को पढ़ता रहूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

भगवान शिव


जीवन की हर धारा पे,
शिव आपका किनारा हो.
कुछ मिले न मिले मुझे,
हे पिता, मुझे तेरा सहारा हो.
मैं अज्ञानता से बंधा हुआ,
आप दिव्या ज्ञान के भंडारी।
मैं पाप कर्म में डूबा हुआ,
आप पुण्य के अवतारी।
हर दंड है स्वीकार मुझे,
बस तेरी गोद में मेरा बसेरा हो.

परमीत सिंह धुरंधर

प्यासा


लो,
दर्द के अपने कुछ किस्से,
आज तुम्हे भी सुना दूँ.
जो कुछ मीठा है मेरे पास,
आज तुम्हे भी चखा दूँ.
मुझे अब भूख नहीं लगती,
और तुम आज भी भूखे हो.
तो लो,
बैठो।
अपनी थाली में से कुछ,
आज तुम्हे भी खिला दूँ.
खा लो,
पर अब पानी मत माँगना.
वो मेरे पास मीठा नहीं,
खरा है.
तुम प्यास मिटाने के लिए जी रहे,
मैं प्यासा ही जी रहा हूँ.
की उसे पी कर,
मैं आज तक,
प्यासा ही जी रहा हूँ,
प्यासा ही जी रहा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रावण


मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
वो कैलाश पे विराजे,
मेरे बुलंद हैं इरादे।
उनके ही छात्र-छाया में,
मैं बढ़ रहा निरंतर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
उनके ही चरणों में,
मैं सर हूँ नवाता।
उनके ही दर्शन से,
मेरा भाग्य खिल जाता।
मैं पुत्र उनका हूँ,
अज्ञानी – अपराधी।
और वो पिता हैं मेरे,
धर्म – ज्ञान के धुरंधर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
कैलाश को उठाया,
अपने बाजुओं पे.
त्रिलोक को दला है,
मैने अपने बल से.
सब-कुछ है समर्पित,
भोलेनाथ के चरणों में,
उन्ही की आशीष से है,
मेरे साँसों का ये समंदर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट है शिव-शंकर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नगरिया चलल बा ये भोला


नगरिया चलल बा ये भोला,
डगरिया उठल बा ये भोला,
तहरे ही धाम अब ई रुकी,
भक्तन के टोला ये बाबा.
केहू के तन्वा में पीड़ा उठल बा,
केहू के मनवा में आंधी मचल बा,
सबके दिल के आस बा ,
तहरे दुअरिया पे बाबा .
अन्ख्वा के लोर त सुख गईल बा,
मनवा त अभी बैचेन बा,
कब तक आँचल ई एसे रही, सुखल आ खाली ये बाबा,
भर दिहिन अब त भक्तन के झोला ये बाबा.
आ व ना मान जा अब, पूरा कर अ परमित के कामना,
ताहरा से बढ़ के कें बाटे ये संसारिया में बाबा.
कभी-कभी त उठेला मनवा में हाम्रो आस हाँ,
तहरे से जुरल बा भक्तन के सारा ख्वाब हाँ,
अब त सुन के पुकार आँखवा त खोलीं ये बाबा,
ल देख अ आइल्बानी तहरे वोसरिया ये बाबा.
डगरिया भरल बा ये भोला,
नजरिया लागल बा ये भोला.
नगरिया……………..ये बाबा.

परमीत सिंह धुरंधर

शिव


जहाँ शिव हैं, वहाँ शक्ति.
तुम निश्छल हो बाबा,
हम बंधे हैं लोभ से.
जहाँ शिव हैं, वहाँ भक्ति.
तुम महाकाल हो बाबा,
हम भयभीत है काल से.
जहाँ शिव है, वहाँ मुक्ति.

परमीत सिंह धुरंधर