कर्ण


हर पल में बेचैनी है जिसके,
हर नींद में एक ही चाह,
एक बार सामना तो हो जिंदगी,
मैं रोक दूंगा अर्जुन की हर राह.
ना माँ की दुआएं हैं, न प्रियेसी की प्रीत,
न किसी से आशा है, न किसी का आशीष,
बस एक बार सामना तो हो जिंदगी,
मैं रोक दूंगा अर्जुन की हर जीत.

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

प्रभु हरि विष्णु


आप सा सरल कोई धर्म नहीं,
आप सा सबल कोई कर्म नहीं,
जो दौड़ती हैं आपकी नशों में,
मेरे मस्तिक में ओ ही प्राण दीजिये,
या प्रभु हरि विष्णु,
मुझपे भी थोड़ा धयान दीजिये।
ऐसा कोई पथ नहीं,
जो न मिले जाके आपके भवसागर में,
लक्ष्यहीन मेरे इस जीवन को,
मंजिल प्रदान कीजिये,
या प्रभु हरि विष्णु,
मुझपे भी थोड़ा धयान दीजिये।
सुगम नहीं है व्रत आपके नाम का,
पर ले लिया है प्रण,
अब चाहे तो मेरा बलिदान लीजिये,
या प्रभु हरि विष्णु,
मुझपे भी थोड़ा धयान दीजिये।
मुझसे भी कई हैं सबल यहाँ,
मुझसे भी कई है कर्मठ यहाँ,
भक्तों की भीड़ लगी है यहाँ,
सबसे पीछे खड़ा हूँ मैं निर्धन,
मौत से पहले मेरे जीवन को,
ऊंचाई का आसमान दीजिये,
या प्रभु हरि विष्णु,
मुझपे भी थोड़ा धयान दीजिये।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

प्रभु विष्णु


ज्ञान दीजिये, अरमान दीजिये,
या फिर मुझको ये वरदान दीजिये,
वृक्षों से हरी कर दूँ सारी धरती,
या प्रभु मुझको दर्शन दीजिये – दर्शन दीजिये।
मान दीजिये, सम्मान दीजिये,
या फिर मुझको ये वरदान दीजिये,
हर रोते हुए को मैं दे दूँ हंसी,
या प्रभु विष्णु मुझ पे भी धयान दीजिये।

परमीत सिंह परवाज

लक्ष्मण


मैं अपने बाजूंओं से,
विधवंश मचा दूंगा।
क्या रावण,
क्या मेघनाद,
व्रह्माण्ड मिटा दूंगा।
काल की हुई,
कैसे ये हिम्मत,
की लक्ष्मण के प्राण हरे,
आज सारी सृष्टि में धुरंधर सिंह,
मैं प्रलय ला दूंगा।

लक्ष्मण


बिना तुम्हारे राम कुछ नहीं,
बिना तुम्हारे सीता की चाह नहीं,
बिना तुम्हारे अवध ही क्या,
अब ये ब्रह्माण्ड भी मेरा नहीं।
मैं नैनों को भींच लूंगा,
सीता को भी छोड़ दूंगा,
जीवन को सीचने वाला मैं,
अब सबका जीवन सोंख लूंगा।
बिना तुम्हारे सम्बन्ध नहीं,
बिना तुम्हारे कोई शौर्य नहीं,
बिना तुम्हारे राम नहीं,
और धुरंधर सिंह मेरा कोई धर्म नहीं।

कृष्ण


मधुवन में मैं भी नाची,
मधुवन में तू भी नाची,
सखी, समझ नहीं पायी मैं,
कृष्ण थे किसके साथ में.
मटकी तेरी टूटी पनघट पे,
चुनर मेरी खोयी यमुना-तट पे.
सखी धुरंधर सिंह,
समझ नहीं पायी मैं,
कृष्ण थे किसके साथ में.

प्रेम इतना


पिता- पुत्र का प्रेम इतना, प्राण निकल गए राम पे।
दसों दिशा को जीतने वाले, उठ न पाये पुत्र- वियोग में।
भाई-भाई का प्रेम इतना, प्रियेशी को छोड़ गए राम पे।
छोड़ के उर्मिला को दौड़े, लक्ष्मण पीछे- पीछे राम के।
भाई-भाई का विरह इतना, मुख मोड़ गए भरत माँ से।
छोड़ दिया हर सुख जीवन का, बस राम के एक खड़ाऊं पे।
बंधू-बंधू का प्रेम इतना, भूल गए केवट हर धर्म-धाम रे।
पार लगाया सरयू के, बस पखार के पाँव राम के।
पति-पत्नी का प्रेम इतना, राम दौड़े एक सवर्ण मृग पे।
मायापति ही छले गए धुरंधर सिंह, सीता के प्रेम में।

दुखिया


तानी सुनी न दिलवा के बतिया,
कोरा-कोरा मन बा, कोरा रे रतिया।
ए भोला तानी सुनी ना,
का कह अ तारी दुखिया।
गावें-गावें खेलनी,
सावन के झूला भी,
सब सखियाँ के गोद भरल,
बस रह गैनी हम ही,
कोरा-कोरा हमर आचार, कोरा रे देहिया।
तानी सुनी न दिलवा के बतिया,
कोरा-कोरा मन बा, कोर रे रतिया।
ए भोला तानी सुनी ना,
का कह अ तारी दुखिया।

कर्ण


समय है प्रतिकूल, भाग्य-विहीन मैं धूल,
पर माँ अब मैं लौट के नहीं आऊंगा,
माना, अर्जुन-कृष्णा की है प्रीत,
माना, तय है उनकी जीत,
मैं भी वचन अपना निभाउंगा,
इस कुरुक्षेत्र में मैं ही, अर्जुन से टकराउंगा।
धरा नहीं छोड़ती कांटो से भरे वृक्षों को,
तुमने तो ठुकराया, बिना आहार दिए मेरे मुख को,
माना, समय नहीं है दूर,
माना, काल भी है आतुर,
पर मैं अपनी तीरों से, बल अपना दिखाऊंगा,
इस कुरुक्षेत्र में मैं ही, अर्जुन से टकराउंगा।
अब मैं शिशु नहीं की स्तनपान कर पाउँगा,
ना मैं कुरुवंशी की राजन ही कहलाऊंगा।
माना, धर्म नहीं मेरा वसूल,
माना, कलंकित है मेरा खून,
पर, आखरी सांस तक दुर्योधन को बचाऊंगा,
इस कुरुक्षेत्र में मैं धुरंधर ही, अर्जुन से टकराउंगा।

परशुराम -लक्ष्मण


मैं राम नहीं,
की श्र्वन करूँ।
परिणाम का चिंतन,
मनन करूँ।
मैं तीरों का अभिलाषी हूँ,
फिर परशु से क्या डरु.
मैं अहंकारी नहीं,
की शान करूँ।
जीवन का अपने,
गुणगान करूँ।
मैं रघुबंसी रामपथगामी,
बस राम का गुणगान करूँ।
नाम में मेरे क्या रखा है.
वीर पल नहीं गवाते विवाद में.
लक्ष्मण के रहते,
धुरंधर राम आएं,
रण में,
ऐसी हमारी मर्यादा नहीं।