राम जी ने भी लक्ष्मण से कहा था, “मिट्टी में लोटना ज्यादा आनंददायक और मीठा है, वनिस्पत रण में दुश्मन को बांधना।”
परमीत सिंह धुरंधर
राम जी ने भी लक्ष्मण से कहा था, “मिट्टी में लोटना ज्यादा आनंददायक और मीठा है, वनिस्पत रण में दुश्मन को बांधना।”
परमीत सिंह धुरंधर
हे गणपति अब तो पधारो
टूट रहा मेरा आस भी.
निरंतर असफलताओं के मध्य, हे अवनीश
कब तक करूँ और प्रयास भी?
हे गजानन, हे वक्रकुंड
अब तो रख दो मस्तक पे हाथ ही.
कुछ तो मिले सहारा प्रभु देवव्रता
कब तक भटकता रहूं?
मरुस्थल में यूँ असहाय ही.
एक आपका नाम जपकर हे गौरीसुता
सबका बेड़ा पार हुआ.
कब तक मैं पुकारूँ आपको हे गदाधर?
छूट रहा मेरा सांस भी.
आपका – मेरा अनोखा है रिश्ता, हे गजकर्ण
आप मेरे अग्रज, आप ही सखा
आप ही मेरे भाग्या भी.
अब तो निष्कंटक कर दो
पथ मेरा, हे गणाधाक्ष्य
बिन आपके इक्क्षा और आशीष के हे चतुर्भुज
रख नहीं सकता मैं एक पग भी.
हे गणपति अब तो पधारो
टूट रहा मेरा आस भी.
निरंतर असफलताओं के मध्य, हे अवनीश
कब तक करूँ और प्रयास भी?
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी को जीने का
अपना – अपना विचार है.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.
सोने की लंका का त्याग कर
कैलास को पावन कर गए.
भगीरथ के एक पुकार पर
प्रबल-प्रचंड गंगा को
मस्तक पर शिरोधार्य कर गए.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.
गर्व का त्याग कर
कृष्णा सारथि बने कुरुक्षेत्र में.
सब सुखों का श्रीराम
परित्याग कर गए.
हिन्द की इसी धरती पे
जब रचा गया चक्रव्यूह
तो वीरता के अम्बर को
अभिमन्यु दिव्यमान कर गए.
जब बंट रहा था अमृत
तो शिव विष धारण कर गए.
परमीत सिंह धुरंधर
ए चाँद मेरी गलियों में
आना – जाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.
जिसने धारण किया है
विष को अपन कंठ में
उसके अधरों के पान की
अभिलाषा छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.
भूत – भभूत – डमरुँ
पे जो रीझ जाए
उसपे नयनों के
तीर चलाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.
जब – जब आस टूटती है
मानव की
तब प्रभु शिव हरते हैं
पीड़ा भक्तों की.
मुझे ऐसी भक्ति से
भटकाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.
मुझसे भी बलिष्ठ और कर्मनिष्ठ
बहुत है यहाँ।
इस अवघड-फ़कीर को
आजमाना छोड़ दे.
मैं भक्त हूँ भगवान् शिव का
मुझे ललचाना छोड़ दे.
परमीत सिंह धुरंधर
पल – पल में इरादों का विखंडन होता है
पल – पल में इरादों का सृजन होता है.
ये संसार तो अनंत है, अनंत ही अनंत है
यहाँ एक युद्ध में हार से
नहीं जीवन का कभी अंत होता है.
स्वयं जो इस सृस्टि का ब्रह्म है
उस साक्षात् शिव को भी
विष का करना पान होता है.
पल – पल में जीवन का त्रिस्कार होता है
पल – पल में जीवन का अपमान होता है.
जो इनसे परे होकर ना विशलित हो कभी
शिव के समक्ष वही वैराग होता है.
मैं फिर पुलकित होऊंगा ए मेरी शाखाओं
फिर वही पुष्प और फल धारण करूंगा मेरी शाखाओं
की हर पतझड़ के बाद विकसित वसंत होता है.
पल – पल में जीवन का विनाश होता है
पल – पल में जीवन का आरम्भ होता है.
ये संसार तो अनंत है, अनंत ही अनंत है
यहाँ एक युद्ध में हार से
नहीं जीवन का कभी अंत होता है.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरी लड़ाई
मेरे अस्तित्व की नहीं
मेरे अंतरात्मा की बन गयी है.
मेरे सही या गलत की नहीं
मेरे विश्वास की बन गयी है.
मैं जानता हूँ
की मैं टूट रहा हूँ
पिछड़ रहा हूँ
थक रहा हूँ
पर इन सबके बावजूद
मेरा टीके रहना जरुरी है
उस बरगद की तरह
जिसके नीचे क्या ?
दूर – दूर तक कोई और पेड़ – पौधा
नहीं होता।
जी हाँ जब जिंदगी आप की
बरगद हो तो
लोग दूर -दूर ही रहते हैं
की कहीं विकास ना रुक जाए.
कहीं भुत – पिचास न पकड़ ले.
ये तो वो ही इनकी छावं में आते है
बैठते हैं
जो मुसाफिर हों, राही हो
जिनकी मज़बूरी है थकान मिटाने की.
या फिर प्रेमी-युगल हो
जिनकी मज़बूरी हो निवस्त्र हो कर भी
एक वस्त्र या चादर के आड़ की.
बरगद, जिसके कोई करीब नहीं
बरगद, जिसके फल की किसी को चाह नहीं।
बरगद, जिसके गिरने पे आँधियों में
एक धाराम सी आवाज होती है
और गावं समझ जाता है
और जब गिरता है बरगद तो
या तो रात का अँधेरा और सनाटा होता है
या फिर ऐसा तूफ़ान जो दिन में भी
सबको घरों में छिपने को विवस कर दे.
तब उस अँधेरे से और उस तूफ़ान से सिर्फ
वो बरगद ही जूझता है.
और वो गिरना भी देखिये
की उसी पल से लोग उत्सव मनाते हैं
बच्चे उछाल -उछाल कर लांघते हैं
विजय-उल्लास की तरह.
और लोग ज्यादा -ज्यादा धो लेना चाहते हैं
उसे चूल्हे या अलाव में लगाने को.
गिरना भी ऐसा हो और मौत भी ऐसा हो
की जन-सैलाब उमड़ उठे.
भीष्म की सैया पे
पांडव – कौरव क्या?
कर्ण, दुर्योधन, गांधारी, धृतराष्ट,
ही नहीं
स्वयं जगत के पालनहारी
कृष्णा कराह उठे.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरे अंग – अंग पे अधिकार करने को
मन व्याकुल है रानी तुझे प्यार करने को.
अपने पिता से कह दो की स्वीकार कर ले हमें
वरना मेघनाथ तैयार है युद्ध आरम्भ करने को.
माना की विष्णु के सखा हैं वो
माना की अजर और अमर हैं वो.
मगर दम्भ मेरा भी उछाल मार रहा
उनको आज यहाँ परास्त करने को.
सोख लूंगा समस्त क्षीरसागर को
अपने तीरों से बांधकर शेषनाग को.
अपने पिता से कह दो की स्वीकार कर ले हमें
वरना मेघनाथ तैयार है त्राहिमाम करने को.
परमीत सिंह धुरंधर
हर जनम में पिता बन कर
हे प्रभु शिव
रखों मेरे सर पे अपना हाथ.
और मैं पुत्र बनकर
आपके चरणों को धो के पीता रहूँ
जपता रहूँ आपका नाम.
परमीत सिंह धुरंधर
प्रभु आप जब से जीवन को साकार कर रहे,
रोम – रोम से गजानन हम आपका गुणगान कर रहे.
चक्षुओं को भले प्रभु आपका दर्शन ना मिला हो,
हम साक्षात् ह्रदय से परमानंद का आभास कर रहे.
अद्भुत है आपका अलंकार देवों में,
स्वयं महादेव भी ये बखान कर रहे.
लाड है, प्यार है माँ पार्वती को आपसे,
जग में शक्ति को प्रभु आप स्वयं सम्पूर्ण कर रहे.
मैं भिखारी हूँ, भिक्षुक हूँ दर का प्रभु आपके,
कृपा है प्रभु आप मुझपे नजर रख रहे.
आपके चरण-कमलों में हो मस्तक मेरा भी,
बस इसलिए प्रभु हम आपका नाम जप रहे.
परमीत सिंह धुरंधर
अगर वक्षों से नियंत्रित सत्ता होने लगे,
तो किसी को कौटिल्या बनना पड़ता है.
अगर वक्षों पे लालायित सत्ता होने लगे,
तो किसी को विभीषण बनना पड़ता है.
अगर वीरों की सभा में चर्चा अंगों और वक्षों पे होने लगे,
तो किसी को महाभारत रचना पड़ता है.
परमीत सिंह धुरंधर