अपने पिता के प्रेम में पुकारता हूँ प्रभु शिव तुम्हे,
मेरे पिता को लौटा दो,
मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में.
मुझे भय नहीं मौत का, ताप का,
बस मुझे गोद दिला दो फिर वही,
मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में.
परमीत सिंह धुरंधर
अपने पिता के प्रेम में पुकारता हूँ प्रभु शिव तुम्हे,
मेरे पिता को लौटा दो,
मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में.
मुझे भय नहीं मौत का, ताप का,
बस मुझे गोद दिला दो फिर वही,
मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में.
परमीत सिंह धुरंधर
मैंने देखें हैं दिल के कई टुकड़े,
भिखरे हुए तेरे आँगन में.
रोते हो क्या तुम आज भी,
बैठ के मेरे यादों में.
बढे चलो, मुझे भूलकर,
ये प्रेम नहीं,
ये बेड़ियाँ हैं, तुम्हे रोकेंगी।
पुत्र मेरे, सबल बनो,
इस निर्बलता के केंचुल से.
जीवन में जो भी विष मिले,
ऐसे उसे धारण करों,
की अजर – अमर नीलकंठ बनो.
नागिन है ये दुनिया, बस बिष ही देगी,
उसपे नारी,
शल्य सा तुम्हारा मनोबल हरेगी।
पुत्र मेरे, तुम अपने हाथों से,
कुरुक्षेत्र में भविष्य गढों।
ना की भविष्य का चिंतन,
नारी के आगोस में बैठ के करो.
परमीत सिंह धुरंधर
अभिमन्यु को देखकर दुर्योधन अट्टहास करता हुआ बोला, “अभी बालक हो, लौट जाओ. अभी तो तुमने जीवन में कुछ किया ही नहीं। तुम यूँ अपने जीवन को बेकार मत करो.”
अभिमन्यु ने सबको प्रणाम करने के बाद कहा,
” जीवन में मधुरता प्यार से हैं,
जीवन की प्रखरता कर्म से है,
मगर जीवन की महानता त्याग से है.
इन तीनो के बिना जीवन कुछ नहीं,
और जब जीवन नहीं तो फिर धर्म क्या?”
दुर्योधन ने कहा, “अगर जीवन प्रेम और त्याग है, तो क्या तुम्हे अपने बंधुओं से प्रेम नहीं? क्या तुम उनके जीवन के लिए ये सत्ता का त्याग नहीं कर सकते?”
अभिमन्यु, “प्रेम तो बहुत है. और हमने त्याग भी किया था. आज भी ये लड़ाई हम सत्ता के सुख के लिए नहीं लड़ रहे. अगर लड़ाई सत्ता के सुख की होती तो मैं इस कुरुक्षेत्र में नहीं खड़ा होता। यह हमारा संघर्ष है आपके अत्याचार के खिलाफ। यह संघर्ष है आपकी निरंकुशता के खिलाफ, आपके लोभ, और आपके दमन के खिलाफ।”
अभिमन्यु, “तात श्री, बिना संघर्ष का त्याग, त्याग नहीं; बिना संघर्ष के प्रेम, प्रेम नहीं और बिना संघर्ष के कर्म, कर्म नहीं। अथार्थ, मानव के जीवन की हर परिभाषा और उसकी जवानी बिना संघर्ष के कुछ नहीं। हमारी ये लड़ाई न तो सत्ता के लिए है, ना आपके दमन के लिए. ये हमारा संघर्ष है इस समाज से, जिसके आप चालाक और पालक हो. हम चाहते हैं की इसको बदल दे, और ये संघर्ष है उस बदलाव के लिए.”
परमीत सिंह धुरंधर
मैं मेघनाथ हूँ, मेघनाथ,
पुरे ब्रह्माण्ड में,
कोई नहीं जो मुझे रोक सके.
मैं जब रथ पे होता हूँ,
विराजमान, सारे जहाँ में,
कोई नहीं जो मेरे अश्वो को बाँध सके.
मैं पल में पताका फहरा दूँ,
त्रिलोक में कहीं भी.
मुझसे कोई नहीं छुप सकता,
पुरे ब्रह्माण्ड में कहीं भी.
मैं जब करता हूँ तीरों का संधान,
ऐसा शक्तिमान कोई नहीं रण में,
जो मेरे भीषण प्रहरों से बच सके.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं भीषण तीरों से बाँध दूंगा,
शेषनाग के फनों को.
तुम एक बार तो हमसे,
प्रेम कर के देखो।
मैं इंद्रा को हराकर भी,
अधूरा हूँ तुम बिन.
तुम एक बार अपने नैनों,
के बाण चला के तो देखो।
मेरा तुमसे हैं वादा ए देवी,
तुम यूँ ना अधीर हो.
मैं असुर भले ही हूँ मगर,
मृत्यु तक एक-भार्या नियम में बधूंगा।
तुम अपने मधुर अधरों से,
मुझे प्राणनाथ कह के तो देखो।
ऐसी कोई शक्ति नहीं सृष्टि में,
जो तोड़ सके तुमसे मेरे प्रेम को.
ऐसी कोई अप्सरा भी ना होगी,
जो अब मोह सके इस मन को.
तुम अपनी वेणी में,
मेरे पुष्प तो लगा के देखो।
मैं तुम्हारी लिए,
शिव – विष्णु समस्त, साक्षात परम ब्रह्म,
से टकरा जाऊं।
मैं अपने भीषण बल से,
एक पल में, समस्त क्षीर – सागर सुखा दूँ.
तुम एक बार ह्रदय से अपने भय मिटा के,
मेरे अंक-पास में आके तो देखो।
परमीत सिंह धुरंधर
This is based on the first love story of the universe: Meghnaath and Sulochana.
ब्रह्मलोक में ब्रह्मा और माँ सरस्वती के सम्मुख देवराज इंद्रा और सारे देव चिंता ग्रस्त मुद्रा में.
इंद्रा: ब्रह्मदेव, अब आप ही हमारे संकट का समाधान कीजिये।
ब्रह्मदेव: इंद्रा, आपके आने से ही हम समझ गए की आप हमें धर्मसंकट में डालने आ गए हैं.
तभी नारद जी प्रकट हुए.
नारद: नारायण – नारायण, कौन सी संकट की बात कर रहे हैं आप ब्रह्मदेव।
ब्रह्मदेव: पुत्र नारद, इंद्रा देव की चिंता विश्वामित्र हैं.
नारद: अट्हास करते हुए. होना भी चाहिए। स्त्री का मोह रखने वाले ही स्त्री के खोने पे उसकी चिंता करते हैं जो वो उसके समीप रहते नहीं करते।
ब्रह्मदेव: नारद, तुम्हारे शब्द मेरे समझ के बहार हैं पुत्र.
नारद: देव राज, वो देव राज हैं जो अपने आश्रितों को, ख़ास कर स्त्रियों को, युद्ध का हथियार मानते हैं. खुद को बचाने के लिए उनका बलिदान देते हैं. रम्भा का बलिदान भी तो अब उन्हें रम्भा के रूप- रंग की याद दिलाता हैं. इसलिए वीर पुरुष नारी के प्रेम में मौत चुनते हैं, नारी का विरह नहीं, देव राज.
इंद्रा: देव मुनि आप हमेशा मुझ पर गलत आरोप लगाते हैं.
नारद: तो आप ही बताइए देव राज, रम्भा के लिए आप क्या कर रहें हैं? आज भी आप यहाँ हैं, तो सिर्फ विश्वामित्र को रोकने के लिए. मुझे पूर्ण विश्वास है की आपने अभी तक ब्रह्मदेव से रम्भा के संकट हरने का निवेदन नहीं किया होगा। आपसे ये उम्मीद ही बेकार है देव राज.
देव राज: ब्रह्मदेव, देख रहे हैं, देवऋषि मुझ पर कुपित है.
ब्रह्मदेव: तो आप बतावो देवराज, मैं क्या करूँ?
देव राज: आप विश्वामित्र की तपस्या भंग में हमरी मदद करें।
बर्ह्मदेव: देवराज, ये मेरा काम नहीं।
इंद्रा: ब्रह्मदेव, मैंने इस बार मेनका को भेजने का निर्णय लिया है.
नारद: ओह्ह, तो क्या देवराज रम्भा का हाल भूल गए या उन्हें मेनका पर विश्वास हैं?
इंद्रा: ना मैं रम्भा को भुला हूँ, ना मुझे ये विश्वास है की मेनका कुछ कर पाएंगी। इसलिए, मैंने काम देव को विश्वामित्र का मन असंतुलित करने को कहा है।
नारद: तो अब आप ब्रह्मदेव से क्या चाहते हैं? क्या आप उनको भी काम देव की तरह मन मोहने का काम कहेंगे।
देव राज: नहीं। मैं तो सिर्फ इतना चाहता हूँ की प्रभु कुछ करें ताकि काम देव और मेनका अपने उद्देश्य में सफल हो कर लौटें।
ब्रह्मदेव: हम क्या करे, देव राज. आप ही बताइए।
देव राज: अगर हमें ज्ञात होता, तो हम क्या आपके पास आते?
कुछ समय के मौन के बाद ब्रह्मदेव बोले, ” ठीक है देव राज, आप जाइये। हम देखते हैं की क्या कर सकते हैं.”
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ब्रह्मदेव: उठो विश्वामित्र, उठो. हम तुम्हारी तपस्या से प्रभावित हैं.
विश्वामित्र: ब्रह्मदेव आपके दर्शन से मैं अहोभाग हुआ.
ब्रह्मदेव: तुम वर मांगो विश्वामित्र और ये तप छोड़ दो.
विश्वामित्र: आप के दर्शन ही मेरा वर है. लेकिन तप कैसे छोड़ दूँ, इसके लिए ही तो राज – पाट छोड़ा है.
ब्रह्मदेव: तुम्हारा तप सृष्टि में प्रलय ला रहा है पुत्र. तुमने रम्भा को पाषाण बन दिया। इंद्रा तुम्हे तप-मार्ग से हटाने के लिए फिर से कोई अप्सरा भेजेगा।
विश्वामित्र: ब्रह्मदेव, आप मेरी चिंता न करे. मेरा मार्ग अब कोई नहीं बदल सकता। मैंने अपनी कितनी पत्नियों को छोड़ा है, उनका शरीर, उनका सौंदर्य, उनका लावण्या, उनका मोह -प्यार सब, कब का छोड़ दिया है. तो इंद्रा की सुंदरियों में वो बात कैसे होगी की मुझे बाँध ले.
ब्रह्मदेव: विश्वामित्र, हम जानते हैं की तुम्हे कोई नहीं डिगा सकता। लेकिन पुत्र, तुम्हारा नहीं डिगना मेरी पराजय होगी। मेरी अपूर्णता होगी। अथार्थ, हम त्रिदेवों की हार होगी। क्या तुम चाहते हो की मैं सारी उम्र सबकी हंसी का पात्र बन के रहूं?
विश्वामित्र: वो कैसे?
ब्रह्मदेव: मैंने स्त्री की सृष्टि ही इसलिए किया है की वो किसी के मन को भी छल ले, उसे अपने वश में कर ले और समय आने पे उसे धोखा दे. इन तीनो गुणों में पुरुष कुछ भी नहीं है स्त्री के आगे. स्वयं, मैं भी अपनी ही सृष्टि, एक नारी, के सौंदर्य से छाला गया और भगवान् शिव ने मेरे पांचवे मस्तक का नाश किया, मुझे उस मोह से मुक्त करने के लिए. क्या तुम चाहते हो, की सारी सृष्टि कहे की जिससे मैं नहीं बच पाया, उसे विश्वामित्र ने प्रभावहीन कर दिया? ये मेरी और मेरी सृष्टि की हार होगी। उस के बाद मेरे लिए सृष्टि करना असम्भव होगा और प्रलय बिना आये भी सृष्टि रुक जायेगी। पुत्र, मेरी एक विनती स्वीकार करो. मेरे लिए, मेरी सृष्टि के लिए, नारी से हार स्वीकार कर के, मेरी सृष्टि को सम्पूर्ण रहने दो.
विश्वामित्र: तो आप बताइए, मैं क्या करूँ?
ब्रह्मदेव: पुत्र, इस बार जब मेनका आये तुम्हारा मन मोहने, तो उसका हाल रम्भा सा ना करना। तुम उसका प्रणय स्वीकार कर लेना। स्त्री की जीत में तुम्हारी हार नहीं, क्यों की मैंने ऐसी ही सृष्टि बनायीं है. लेकिन मेनका को त्रिस्कार करने से नारी के साथ मेरी भी हार होगी।
विश्वामित्र: इतनी सी बात ब्रह्मदेव। जाइये, यही होगा। मैं मेनका का प्रणय स्वीकार कर लूंगा और जब तक आप कहेंगे उसके साथ गमन करूँगा।
ब्रह्मदेव: धन्य हो विश्वामित्र, तुम धन्य हो. तुम सही अर्थों में ब्रह्मऋषि हो. जिसने आज स्वयं ब्रह्मदेव की मनोकामना पूर्ण की. पुत्र मैं तुम्हे कुछ देना चाहता हूँ. इंकार मत करना।
ब्रह्मदेव: मैं तुम्हे आशीष देता हूँ की तुम सारे ब्रह्मऋषियों के सप्तऋषि बनके सृष्टि के अंत तक इस जगत में उदयमान रहोगे।
विश्वामित्र: जैसी आपकी मनोकामना, ब्रह्मदेव।
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विश्वामित्र की चारो तरफ गुणगान होने से, ब्रह्मणनों में हाहाकार मच जाता हैं. और ब्राह्मणों ने फिर चतुराई दिखाते हुए, इंद्रा के सहयोग से, मेनका को समझाया की वो विश्वामित्र को छोड़ दे. उन्होंने मेनका को ये लालच दिया की आपका नाम घमंडी विश्वामित्र का घमंड तोड़ने के लिए सदा -सदा अमर रहेगा। सृष्टि आपका आभार मानेगी। ब्राह्मणों ने कहा की विश्वामित्र का प्रेम सच नहीं और उसने ब्रह्मदेव के कहने में तुम्हारा पाणिग्रहण किया है. इंद्रा ने मेनका को अप्सराओं में सबसे महान बनने का लालच दिया।
इंद्रा : मेनका, जो काम रम्भा, उर्वशी नहीं कर सकी. वो तुमने किया। तुम्हारा सौंदर्य अनुपम है. तुम अप्सराओं की अप्सरा हो. क्या तुम चाहती हो की सारी सृष्टि तुम्हे ये कहे की तुम वो काम नहीं कर सकी? तुम्हारा विश्वामित्र के साथ रहना, तुम्हारी हार और विश्वामित्र की जीत होगी।
इंद्रा: सोचो मेनका, एक नारी होकर, क्या तुम नारी के अपमान का बदला नहीं लोगी? इस विश्वामित्र ने ना सिर्फ रम्भा का अपमान किया, बल्कि इसने हज़ारो अपनी पत्नियों को उनके यौवन की आग में अकेला छोड़ दिया। इसने उनका हाथ थामा था, लेकिन ब्रह्मऋषि कहलाने के लिए उनको बीच में छोड़ दिया। क्या तुम उन सभी के अपमान का बदला नहीं लोगी?
इस तरह दोस्तों, मेनका ने सम्पूर्ण नारी जगत के अपमान का बदला लेने के लिए, ना सिर्फ अपने प्रेम को, प्रेमी को छोड़ दिया, बल्कि अपनी नन्ही लड़की को बिना दूध पिलाए, स्वर्ग लौट गई. और अंत में ब्राह्माणवाद की जीत हुई.
परमीत सिंह धुरंधर
असहनीय पीड़ा है जीवन बिन पिता के,
मत लिखो ऐसा कुरुक्षेत्र फिर ए दाता,
की अभिमन्यु हो बिन अर्जुन के.
समर में किसे हैं अब भय प्राणों का,
लेकिन तीरों को और बल मिलता,
जो होता अभिमन्यु संग अर्जुन के.
परमीत सिंह धुरंधर
शिव-शंकर बोले हमसे,
तुम मेरे प्रिये हो.
फिर क्यों डरते हो इतना,
क्यों भय से बंधे हो?
ये आँखे है तुमपे सदा,
सर्वदा, तुम्ही इनको प्यारे हो.
धन की तमन्ना,
नारी की कामना।
ना रखो मन में,
ये ही है वेदना।
की तुम मेरा अंश हो,
तुम मेरा तेज हो.
फिर क्यों डरते हो इतना,
क्यों भय से बंधे हो?
भटकना है तुम्हे,
बहना है तुम्हे, हर पल में निरंतर-2।
ना कोई बाँध सकेगा,
ना कोई दल सकेगा।
बस तुम्ही हो केवल,
इस जग में शिव -सा – धुरंधर-2।
तुम ही रूद्र हो,
तुम ही मेरा जोत हो.
फिर क्यों डरते हो इतना,
क्यों भय से बंधे हो?
परमीत सिंह धुरंधर
असमंजस में अर्जुन,
की तीर किसपे चलाये?
रणभूमि में कहीं पितामह,
कहीं भ्राता नजर आएं.
दुविधा देख पार्थ की,
वासुदेव मुस्काये।
ये कैसा मोह है अर्जुन?
तुम आज तक नहीं निकल पाए.
पथराए मन से,
बोझिल आँखों को बंद किये,
माथे पे सिकन,
गांडीव थामे, अर्जुन खड़े कपकपाये।
लगे अर्जुन गिनाने, हर रिश्ता अनंत बार,
कभी भीष्म, कभी द्रोण,
कभी याद आये मामा शल्य का प्यार।
तो विकराल रूप ले कर भगवान बोले,
खोल अर्जुन अब तू अपनी आँखे।
सृष्टि का तुझको आज सच बतलाऊं,
मन-मस्तिक से तेरे ये भ्रम मिटाऊं।
मेरे सिवा न कुछ, जो अनंत, अमिट हो,
ना कोई ऐसा सृष्टि में,जो अटल और अडिग हो.
फिर इस जगत में ऐसा क्या?
जिसमे तुम अकड़े – जकड़े हो,
किसके प्रेम में बंध के यूँ खड़े हो.
यहाँ ना कोई अपना न पराया है,
सब मेरी और केवल मेरी ही माया है.
मैं ही पर्वत – पहाड़ में,
मैं ही अंत और आरम्भ में.
मैं ही दुर्योधन के दम्भ में,
मैं ही द्रोण के द्वेष में.
मैं ही धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह हूँ,
मैं ही उर्वशी के योवन में.
मैं ही भीष्म का धर्म हूँ,
और मैं ही इन अश्वों के वेग में.
मैं ही प्रेम हूँ,
मैं ही हूँ मन का विकार।
मैं ही मिलन का रस हूँ,
और मैं ही हूँ तन का श्रृंगार।
पर हे अर्जुन,
फिर भी मैं त्रुटिहीन हूँ,
मैं नीरस, निर्जीव,
और श्रृंगार विहीन हूँ.
इस कुरुक्षेत्र में यहाँ,
बस मेरी ही जय है,
मेरी ही पराजय है.
मैं हैं बचूंगा अंत में,
इन सबके अवशेष में.
इनको भी ज्ञान है,
की निश्चित है इनकी हार,
फिर भी देखो,
ये तैयार है करने को मुझपे प्रहार।
इनको भी ज्ञात है,
की मैं ही हूँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड,
फिर भी आ गए है रणभूमि में ये,
रखने अपने इस जीवन का मान.
वो रोकना चाहते है जिस समय की प्रवाह को,
मैं ही वो समय हूँ.
वो खेल रहें हैं अपना खेल जिस धर्म की आड़ में,
मैं ही वो धर्म हूँ.
वो बांधना चाहते है इस धरती पे जिस जीवन को,
मैं चाहता हूँ मुक्ति उस जीवन की.
मैं चाहता हूँ मुक्ति उस धर्म की, उस समय की,
अपने इस ब्रह्माण्ड की, उसके प्रवाह की.
मैं चाहूँ तो मौत दूँ इनको, प्रलय के प्रलाप से,
मैं चाहूँ तो मौत दूँ इनको सूरज के भीषण ताप से.
मगर मैं जानता हूँ इनको संतोष मिलेगा,
तुम्हारे तीक्ष्ण तीरों के घाव पे.
तुम नहीं तो कोई और मेरा साधन होगा,
बिना तुम्हारे ही मेरा लक्ष्य साध्य होगा।
फिर भी तुम नहीं रोक पाओगे इस विध्वंश को,
नहीं देख पाओगे कल से,
अपने प्रियजनों के इस भेष को.
तो उठो अर्जुन,
अपनी तीरों से मेरा पथ प्रज्जवलित करों,
मेरी सृष्टि को आज तुम,
संग मेरे स्वचालित करो.
मुझमे समाहित हो,
मुझमे सम्मिलित हो,
बिना बंधे माया – मोह में,
मेरी तरह प्रवाहित हो.
परमीत सिंह धुरंधर
हौले-हौले बहती है गंगा, हिमालय की ऊँचाइयों से ढल कर,
ए मन तू न हो अधीर यूँ किसी की नजरों में गिरकर।
परमीत सिंह धुरंधर