मेरे श्रीराम प्रभु


मैं बुलंद हूँ, और बुलंदी मेरी आपके नाम से मेरे प्रभु
मैं भक्त हूँ, और मेरी भक्ति आपके चरणों से मेरे प्रभु।
स्वयं शिव भी लगावे ध्यान जिसका
रुद्रावतार लेकर करे बखान जिसका
टूट जाए माया की हर जंजीर, एक तेरे नाम पे प्रभु
भवसागर में सहारा बस एक तेरा ही, मेरे श्रीराम प्रभु।

Dedicate to the Shri Ram Mandir construction.

परमीत सिंह धुरंधर 

श्री हरी


थकते नहीं निहारते
रह -रह कर पुचकारते
अघाते नहीं थाम के.
चक्रवर्ती सम्राट
चूमते शिशु-पाँव
भूलकर ताज
और महल चमचमाते।
माँ देख रही
प्रजा हंस रही
एक बालक के कहने पे
सम्राट मटक-मटक नाचते.

परमीत सिंह धुरंधर 

कण – कण में व्याप्त है श्रीराम


कण – कण में व्याप्त है श्रीराम
चाहे अयोध्या हो या अंडमान।

मंदिर बने या ना बने
जयकारों में गूँजते रहेंगे श्रीराम।

भूमण्डल के हर कोने – कोने मे
जन – जन के ह्रदय में है श्रीराम।

परमीत सिंह धुरंधर

जन – जन के ह्रदय में हैं श्रीराम


जब श्रीराम को आना होगा
श्रीराम आयेंगे।
अत्याचारी से कह दो
संग हनुमान जी भी आयेंगे।
जब मंदिर बनना होगा
मंदिर बन जाएगा।
जन – जन के ह्रदय में हैं श्रीराम
ह्रदय से कैसे मिटाओगे?

इस माटी का रंग उनसे
इस माटी की खुशबु हैं श्रीराम।
मीठी हो जाती है धुप भी
अगर लिख दें
हम आँगन में श्रीराम।
घर – घर में बसे हैं
हनुमान-ध्वज में श्रीराम
घर – घर से कैसे मिटाओगे?

परमीत सिंह धुरंधर

क्यों Fair & Lovley ढूंढती हैं?


नदिया हमसे
ये सवाल पूछती है.
किसके पाँव पखारूँ?
वो नाम पूछती है.

पत्थर बन गया
एक सुन्दर सी नारी
फिर क्यों भारत की लड़कियाँ
Fair & Lovley ढूंढती हैं?

यहाँ पत्थर पे भी
तुलसी चढ़ती है.
फिर क्यों भारत की लड़कियाँ
Fair & Lovley ढूंढती हैं?

परमीत सिंह धुरंधर

मिट्टी में लोटना


राम जी ने भी लक्ष्मण से कहा था, “मिट्टी में लोटना ज्यादा आनंददायक और मीठा है, वनिस्पत रण में दुश्मन को बांधना।”

परमीत सिंह धुरंधर

मेघनाथ तैयार है


तेरे अंग – अंग पे अधिकार करने को
मन व्याकुल है रानी तुझे प्यार करने को.
अपने पिता से कह दो की स्वीकार कर ले हमें
वरना मेघनाथ तैयार है युद्ध आरम्भ करने को.

माना की विष्णु के सखा हैं वो
माना की अजर और अमर हैं वो.
मगर दम्भ मेरा भी उछाल मार रहा
उनको आज यहाँ परास्त करने को.

सोख लूंगा समस्त क्षीरसागर को
अपने तीरों से बांधकर शेषनाग को.
अपने पिता से कह दो की स्वीकार कर ले हमें
वरना मेघनाथ तैयार है त्राहिमाम करने को.

परमीत सिंह धुरंधर

कौटिल्या – विभीषण – महाभारत : An interesting triangle from Hindu history


अगर वक्षों से नियंत्रित सत्ता होने लगे,
तो किसी को कौटिल्या बनना पड़ता है.
अगर वक्षों पे लालायित सत्ता होने लगे,
तो किसी को विभीषण बनना पड़ता है.
अगर वीरों की सभा में चर्चा अंगों और वक्षों पे होने लगे,
तो किसी को महाभारत रचना पड़ता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक बुद्ध ढूंढ रहा हूँ


गहन अन्धकार में
एक सूक्ष्म प्रकाश ढूंढ रहा हूँ.
मैं इस भीड़ में
एक बुद्ध ढूंढ रहा हूँ.
हर ज्ञान, हर रसपान
के बाद जीवन के रहस्य को
भेद पाने का संसाधन ढूंढ रहा हूँ.
मैं इस भीड़ में
एक बुद्ध ढूंढ रहा हूँ.

 

मिले बुद्ध, तो पूंछू,
ऐसा क्या था की यशोधरा का त्याग कर
आप महान बन गए?
और सीता का परित्याग कर
राम आलोचना का पदार्थ।
मैं पूंछू, हे देव,
ऐसा क्या था की नन्हे राहुल को रोते छोड़कर,
आप सम्म्मान के अधिकारी बन गए?
और लव-कुश के पिता होने मात्र से
राम, सर्वत्र निंदा के पात्र।

 

जिसने अहिल्या का मान रखा,
जिसने एक पत्नी व्रत का पालन किया।
जिसने पिता के वचन का मान रखा,
जिसने सबसे मित्रवत व्यवहार किया।
ऐसा क्या गलत किया उस मानव ने?
जो जीवन के अंत में उसे इतनी
पीड़ा, अपमान और दुःख ने ग्रसित किया।
और आपने कैसे इस संसार में खुद को,
इन बंधनों, कलंको से मुक्त किया?

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं त्रिलोक बदल दूंगा


मैं अंदाज बदल दूंगा,
परिणाम बदल दूंगा।
होगा अगर कोई रण यहाँ,
तो धरती क्या?
मैं आसमान बदल दूंगा।
क्यों चिंतित हो पिता?
तात श्री के ज्ञान से.
अगर राम, नारायण भी हैं तो,
मैं अपनी तीरों से त्रिलोक बदल दूंगा।
मैं यूँ ही इंद्रजीत नहीं,
मुझे त्रिलोक के सुख की चाह नहीं।
बस आपके जय-जयकार के लिए,
पिता श्री,
मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बदल दूंगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर