रावण


मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
वो कैलाश पे विराजे,
मेरे बुलंद हैं इरादे।
उनके ही छात्र-छाया में,
मैं बढ़ रहा निरंतर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
उनके ही चरणों में,
मैं सर हूँ नवाता।
उनके ही दर्शन से,
मेरा भाग्य खिल जाता।
मैं पुत्र उनका हूँ,
अज्ञानी – अपराधी।
और वो पिता हैं मेरे,
धर्म – ज्ञान के धुरंधर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
कैलाश को उठाया,
अपने बाजुओं पे.
त्रिलोक को दला है,
मैने अपने बल से.
सब-कुछ है समर्पित,
भोलेनाथ के चरणों में,
उन्ही की आशीष से है,
मेरे साँसों का ये समंदर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट है शिव-शंकर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

लक्ष्मण


मैं अपने बाजूंओं से,
विधवंश मचा दूंगा।
क्या रावण,
क्या मेघनाद,
व्रह्माण्ड मिटा दूंगा।
काल की हुई,
कैसे ये हिम्मत,
की लक्ष्मण के प्राण हरे,
आज सारी सृष्टि में धुरंधर सिंह,
मैं प्रलय ला दूंगा।

लक्ष्मण


बिना तुम्हारे राम कुछ नहीं,
बिना तुम्हारे सीता की चाह नहीं,
बिना तुम्हारे अवध ही क्या,
अब ये ब्रह्माण्ड भी मेरा नहीं।
मैं नैनों को भींच लूंगा,
सीता को भी छोड़ दूंगा,
जीवन को सीचने वाला मैं,
अब सबका जीवन सोंख लूंगा।
बिना तुम्हारे सम्बन्ध नहीं,
बिना तुम्हारे कोई शौर्य नहीं,
बिना तुम्हारे राम नहीं,
और धुरंधर सिंह मेरा कोई धर्म नहीं।

प्रेम इतना


पिता- पुत्र का प्रेम इतना, प्राण निकल गए राम पे।
दसों दिशा को जीतने वाले, उठ न पाये पुत्र- वियोग में।
भाई-भाई का प्रेम इतना, प्रियेशी को छोड़ गए राम पे।
छोड़ के उर्मिला को दौड़े, लक्ष्मण पीछे- पीछे राम के।
भाई-भाई का विरह इतना, मुख मोड़ गए भरत माँ से।
छोड़ दिया हर सुख जीवन का, बस राम के एक खड़ाऊं पे।
बंधू-बंधू का प्रेम इतना, भूल गए केवट हर धर्म-धाम रे।
पार लगाया सरयू के, बस पखार के पाँव राम के।
पति-पत्नी का प्रेम इतना, राम दौड़े एक सवर्ण मृग पे।
मायापति ही छले गए धुरंधर सिंह, सीता के प्रेम में।

परशुराम -लक्ष्मण


मैं राम नहीं,
की श्र्वन करूँ।
परिणाम का चिंतन,
मनन करूँ।
मैं तीरों का अभिलाषी हूँ,
फिर परशु से क्या डरु.
मैं अहंकारी नहीं,
की शान करूँ।
जीवन का अपने,
गुणगान करूँ।
मैं रघुबंसी रामपथगामी,
बस राम का गुणगान करूँ।
नाम में मेरे क्या रखा है.
वीर पल नहीं गवाते विवाद में.
लक्ष्मण के रहते,
धुरंधर राम आएं,
रण में,
ऐसी हमारी मर्यादा नहीं।

जीत-हार


न जीत न हार, सत्य है प्यार
क्या जीते थे राम, रावण का अंत कर
क्या जीते थे राम, सीता का त्याग कर
क्या जीते थे पांडव, दुर्योधन का अंत कर 
क्या जीते थे पांडव, भीष्म का अंत कर
जीत कर भी, होती है अक्सर हार,
कर दे इस, माया का त्याग
रस है इस, जीवन का त्याग
सत्य है प्यार, न जीत न हार

 by a friend 

इसे मेरा प्रेम तो न समझो


एक-एक करके,
काट दिया था,
वशिष्ठ के पुत्रों को,
नारी हो तुम,
छोड़ रहा हूँ,
इसे मेरा प्रेम तो न समझो।
कैसा प्रेम, कैसा प्यार,
तुम प्यादा हो,
इस शह और मात,
के खेल में,
तुम्हे प्राप्त कर, मैंने,
हरा दिया है आज इंद्रा को,
इसे मेरा अनुराग तो न समझो।
कैसा धर्म, कैसी विवशता
तुम लौट सकती थी,
प्रथम-मिलन के बाद भी,
तब तुम्हारा ऐसा अंत न होता,
शकुंतला रो रही है,
छोड़ रहा हूँ,
इसे मेरा पराजय तो न समझो।
स्वर्ण और सत्ता को,
जिसने ठुकराया,
आज भी रो रही है,
कितनी रानियां,
जिसने रचा है माँ गायत्री को,
उसे अपनी वफ़ा
के झूठ में जीता अज्ञानी तो न समझो, परमीत।

चरित्र


बदलता मौसम भी शर्मसार है, वो इस कदर रंग बदलती है,
चाँद भी कहीं जाके छुप जाता है , वो इस कदर साथ बदलती है.
पोंगे पंडित थे वो जो लिख गये, की मनेका ने विश्वामित्र का तप तोडा,
बिलखते-बिकलते शिशु को जिसने , सवर्णों की चाहत में छोड़ा,
नागिन भी विषहीन हो जाये, ये इस कदर जहर घोलती हैं,
की भारतीय नारी हैं ये, जो हर पल में अपना चरित्र बदलती है, परमित …..Crassa