दामाद


चढ़ के अइलन सूरज माथा पे,
अब तअ उठीं न हमार सैयां।
कब तक दही पे ई छाली जमीं,
कभी तअ चखी मठ्ठा-छाज सैयां।
सबके धान के बिया गिर गइल,
तनी सीखी न जाए के बथान सैयां।
रतिया में करेनी सब आपने मनमानी,
दिन में तअ तनी करी दूसर काम सैयां।
जाने बाबू जी कौन लक्षण देखनी,
की बाँध देनी हमारा साथ सैयां।
देखे में तअ अतना सीधा बानी,
पर बात-बात में फोड़े नी कपार सैयां।
रोजुवे नु माई पूछअ तारी,
अब बताई, बोली कौन बात सैयां।
गंगा नहइली, कतना पियरी चढ़ाइली,
तब जा के मिलल इह परमीत दामाद सैयां।

मेरे सैंया बड़े रंगीले


मेरे सैंया बड़े रंगीले,
मेरे सैंया बड़े रंगीले,
मैं पकाऊँ भिण्डी,
वो मांगते हैं करेलें।
मेरे सैंया बड़े रंगीले।
मेरे सैंया बड़े रंगीले,
मै खाती हूँ थोड़ा सा,
वो खाते हैं भर के पतीले।
मेरे सैंया बड़े रंगीले।
मेरे सैंया बड़े रंगीले,
दिवाली मे खेलें होली,
और होली मे जलाएं दिये।
मेरे सैंया बड़े रंगीले।
मेरे सैंया बड़े रंगीले,
मै कहती हूँ चलो घूम आएं,
वो कहते है आवों लुड्डों खेलें।
मेरे सैंया बड़े रंगीले।
परमीत, मेरे सैंया बड़े रंगीले।

अनाडी-बलमा


दरिया इतना उछलती है क्यों,
जरा हमको बता बलमा।
सागर इतना है गहरा हाँ क्यों ,
जरा हमको समझा बलमा।
कौआ आसमान में उड़ता है क्यों,
क्यों, फूलो पे मंडराएं भौरां।
कालिया खिलती हैं सुबह में क्यों,
जरा हमको बता बलमा।
सूरज बिखरायें किरणों को क्यों,
जरा हमको समझा बलमा।
बहती हवा का मुझे छू जाना,
क्यों, भाता है जुल्फों का लहराना,
गिराती हूँ मैं यूँ आँचल को क्यों,
जरा हमको बता बलमा।
परमीत, तू इतना है अनाडी हाँ क्यों,
जरा हमको समझा बलमा।

होली और सौतन


जब निकलती हूँ मै डाल के,
घूँघट अपने मुखड़े पे,
तो छुप जाता है सूरज,
जाने-जाके किन गलियों में.
जब चलती हूँ उठा के,
घूँघट मैं अपने मुखड़े से ,
तो चाँद भी बहक जाता है,
मेरे यौवन के रस से.
कैसी जवानी,
रब्बा तुने है दी मेरे तन पे,
हर गली में एक आशिक हैं मेरा,
हर घर में है एक सौतन रे.
कैसे छोड़ दूँ मैं,
साजन को अकेले होली में,
कितनो कि नजर मुझपे है,
और कितनो कि मेरे घर पे, परमीत

सैयां संग होली


ये पहली होली है,
मेरे सैयां जी के साथ में,
खूब चली है पिचकारी,
शिकागो-लखनऊ के संग्राम में, परमीत

सैया मेरे मैके में


कि बड़ी भीड़ लगी है सैया मेरे मैके में,
सब पूछ रहे हैं तेरे घर आने पे.
अब जब निकलती हूँ इन गलियों से,
सब बुलाते हैं बैठने, घर-आँगन में.
कि बड़ी रौनक बढ़ी है सैया मेरे मैके में,
सब पूछ रहे हैं तेरे घर आने पे.
पहले भी जलती थी सब्जी चूल्हे पे,
मगर कोई कुछ कहता न था,
अभी तो खाँसी उठी नहीं,
बहने-भाभी, बैठा देतीं हैं हमें झूले पे.
कि बड़े भाव चढ़ें है सैया मेरे मैके में,
सब पूछ रहे हैं परमीत तेरे घर आने पे.

सौतन- सखियाँ


जिस पल से मिले हो तुम सैंया,
सजने लगी हूँ, मैं छुप-छुप के.
पराया लगे है, अब बाबुल,
रहने लगी हूँ, मैं घूँघट में.
एक तेरी नजर की आशा में,
जलता है तन-मन मेरा,
एक नजर जो तू देख ले,
खिल जाता है अंग-अंग मेरा.
जिस पल से मिले हो तुम सैंया,
खुश रहने लगी हूँ, मैं बंद दरवाजों में.
सौतन लगती है, अब सखियाँ,
राज दबाने लगी हूँ, मैं सीने में, परमित.

काली रातों की यादें


ए चाँद तुझसे क्या कहें,
कैसी कटीं हैं रातें,
मैं उमरती थी नदी की तरह,
वो बाँध गयें किनारें-2.
फूलों के ख़्वाबों का,
भी नहीं हैं ये मंजर,
पलकों-से-पावों तक,
वो दे गयें हैं यादें-2.
बिन सवान के बरसातें,
बिन साज बजी मल्हार,
मैं जितना ही इतराती,
वो साध गयें निशाने-2.
कब भोर हुई पलकों में,
कब सांझ ढली आके,
मैं कुछ जान न पाई,
वो इस कदर पीने लगे प्याले-2.
पायल भी जली इर्ष्या के अगन में,
चूड़ी दूर हुई साजन की राहों से,
मैं फँसी इस कदर भंवर में, परमित
वो ले गये बहा के शर्म की मेरी दीवारें-2.