राधा – कृष्णा


हम तो हो गए हैं जुदा,
पर मन में बस तुम्ही हो.
इस कृष्णा की प्रिये,
बस राधा, केवल तुम्ही हो.
तीरों – अश्त्रों की गूंज में,
कुरुक्षेत्र की तपती भूमि पे,
मेरे ह्रदय और मस्तिक के,
हर अस्पंदन में तुम्ही हो,
इस कृष्णा की प्रिये,
बस राधा, केवल तुम्ही हो,
बस तुम्ही हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कृष्ण


मधुवन में मैं भी नाची,
मधुवन में तू भी नाची,
सखी, समझ नहीं पायी मैं,
कृष्ण थे किसके साथ में.
मटकी तेरी टूटी पनघट पे,
चुनर मेरी खोयी यमुना-तट पे.
सखी धुरंधर सिंह,
समझ नहीं पायी मैं,
कृष्ण थे किसके साथ में.

माँ का लाल


तेरे वास्ते ए माँ, मैं लौट के हाँ आऊंगा,
न तू उदास हो, मैं रण जीत के ही लौटूंगा।
आज समर में देख ले, ज़माना भी बढ़ के,
क्या द्रोण, क्या कर्ण,
सबको परास्त कर के ही लौटूंगा।
तेरा दूध ही मेरे शौर्य का प्रतीक है,
और क्या चाहिए, जब मुझपे पे तेरा आशीष है.
ना कृष्णा का, ना अर्जुन का,
मैं बस परमीत, लाल माँ तेरा कहलाऊंगा।

मैं ही अर्जुन हूँ


ना मैं देवो को मैं मानता,
ना मैं गुरुवों को जानता,
मैं रणभूमि तक आ गया हूँ,
बस पिता को ही मैं पूजता,
तो,
करों सामना मेरी तीरों का,
की मैं ही अर्जुन हूँ.
ना तन को देखो, ना कद को,
की नशों में दौड़ता,
मैं वो ही ख़ून हूँ.
माँ के गर्भ में ही,
पढ़ लिया था पाठ,
मैने अपने पिता से.
करों सामना मेरे बल का,
मैं ही श्वेतवाहन हूँ.
न उत्तरा का हूँ मैं,
ना मैं सुभद्रा का,
ना ही मैं हूँ कृष्णा का,
ना मैं बलराम का,
नाता मेरा बस एक ही है,
परमीत, की मैं ही अर्जुन हूँ,
हाँ, मैं ही अर्जुन हूँ.

मीरा


कहाँ मेरे कान्हा,
कहाँ हो कन्हैया,
प्यासी मेरी धरती,
प्यासी हैं मीरा।
गैयन के संग,
मैं भी,
उदाश हूँ खड़ी।
सुनी इस बगिया में,
कहाँ हैं बंसी तेरी।
कहाँ मेरे बंधू,
कहाँ हो कन्हैया,
प्यासी मेरी धरती,
प्यासी हैं मीरा।
चादर भी तन से,
गिरा के मैं हूँ आयी,
पयाल भी पथ में,
कही टूट गयी मेरी।
कांटो से छलनी,
है पग मेरे,
फिर भी आँखों में,
प्रेम छलकाती हूँ आयी।
कहाँ मेरे सखा,
कहाँ हो रचैया,
प्यासी मेरी धरती,
प्यासी हैं मीरा।
दो पल जरा नैनों,
से मेरे पी लो,
दो पल जरा,
बंसी तो बजा दो.
लोक-लाज, शर्म-भय,
सब।
बहती गंगा में,
बहा के हूँ आयी.
कहाँ मेरे प्रेमी,
कहाँ हो रसैया,परमीत
प्यासी मेरी धरती,
प्यासी हैं मीरा।