उम्मीदों का पत्र


पद और पुरस्कार,
कुछ नहीं,
मेरे दिव्य ललाट के समक्ष।
चाहत तो बिलकुल नहीं,
इस जग में अपने लिए,
इस कलम के समक्ष।
जिस समूह में हर इंसान,
विभूषित है साहित्यकार बन कर.
मैं अपनी उम्मीदों का पत्र,
कैसे रखूं उन विकृत विद्वानों के समक्ष।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हम फिर से कुरुक्षेत्र का निर्माण करेंगे


हार जिंदगी का अंत नहीं।
हार अगली जीत का शुभारम्भ हैं.
वो जीत कर कोइसिस करेंगे खुद को बचाने की,
हम हार कर कोसिस करेंगे,
खुद को उठाने की,
लोगो को जगाने की.
वो जीत कर दम्भ करेंगे,
हम हार कर उठान करेंगे।
लोहिया को तोड़ न सके,
वो बार – बार हरा कर.
बोस को मिटा न सके,
वो जूठी अफवाहे उठा कर.
वो जीत कर सत्ता को प्राप्त करेंगे,
हम हार कर पुनः संघर्ष और प्रयास करेंगे।
जीत उनकी भी अमर नहीं,
और हार मेरी भी अटल नहीं।
हम फिर से इस कुरुक्षेत्र का निर्माण करेंगे।
मेरे अंत तक इस सत्ता परिवर्तन,
को आवाहन करेंगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तो कैसे संभाले?


दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
मुरादों को जला दिया है,
उम्मीदों को कब का दफना दिया है.
फिर भी आँखे जो देखें खवाब,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
रास्तों, गलियों, शहर तक छोड़ के उनका,
इन घने वीरानों में बैठें हैं.
फिर भी हवाएं उड़ा लाएं दुप्पट्टा,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?
होंठों की प्यास को नसीब मान लिया है,
उनकी बेवाफ़ाई को अपना जहाँ मान लिया है.
फिर भी कोई आँचल ढलका दे,
तो कैसे संभाले, खुदा?
दिल जो ना सम्भले, खुदा,
तो कैसे संभाले, बता?

 

परमीत सिंह धुरंधर

सवाल


उस ने फिर मेरा हाल पुछा है कितना मुश्किल सवाल पुछा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं दिया जलाता रहूँगा


लड़ाई होगी,
जब तक आसमान मुझे मेरी जगह न दे दे.
मैं दिया जलाता रहूँगा,
हर अँधेरी राह में,
जब तक सूरज मेरे आँगन में अपनी किरण न बिखरा दे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तमन्ना


सुबह तो हो जाती है तुम्हारी आँखों से,
ना जाने कब रात होगी तुम्हारी जुल्फों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जंग तो लड़ना होगा


जीत के लिए,
जंग तो लड़ना होगा।
सत्ता पाने के लिए,
सत्ताधीशों को उखाड़ना होगा।
न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते,
यूँ सर झुका कर अब इनसे।
न्याय चाहिए तो,
आँखे मिलाकर,
न्यायधीशों को ललकारना होगा।
जिन्हें प्यार से आहार चाहिए,
वो बैठ जाएँ अपने घर और गोशालों में.
सबेरा देखने वालों को,
इन अंधेरों से गुजरना होगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Instagram


विद्रोही कलम ही सिर्फ Bold हो सकती है,
बाकी उनकी Boldness तो सिर्फ Instagram पे ही दिखती है.

 

Just by posting your pic on the Instagram, you can not show your boldness or courage. A courageous  person has to be on the road to fight for the poor people.

 

Parmit Singh Dhurandhar

भिखारी – मदारी


दाने – दाने पे,
उसने मेरा नाम लिख दिया।
यह मेरी किस्मत नहीं,
ना भाग्य है.
बल्कि ऐसा करके,
उसने मुझे भिखारी,
और खुद को मदारी लिख दिया।
मैंने भी गमझे से पेट में,
विकराल होते भूख को,
बाँध दिया।
दुपहरी में पीपल के नीचे,
खाट डाल के लेट गया.
मुझे मेरी गरीबी में भी खुसी हुई,
की आज मैंने,
उसके ऊँचे महलों के दर्प,
को बुझा दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

सिंह सा दहाड़ लेता है


जिंदगी ने हर तरफ से तन्हा कर दिया,
उमीदों के हर किनारे को तोड़ कर,
बे- आसरा कर दिया।
फिर भी नशों में बहता ये खून,
जो राजपूती है,
उछाल लेता हैं,
उबाल लेता है.
संकट के हर घड़ी पे,
ये सिंह सा दहाड़ लेता है.
मैं मिटने की राह पर रहूँ,
साँसे टूटने की कगार पे रहे.
छाने लगते हैं जब भी,
हार की आंशका के ये काले बादल।
गिरते – गिरते भी, धूल में धूसरित होते भी,
ये खून, दुश्मनों को ललकार देता है.
मुझमे फिर से अहंकार भर,
जोश भर,
आखिरी क्षणों में भी,
राण-भूमि में, अरुंओं के सम्मुख,
नाव-योवन प्रदान करता हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर