माँ सरस्वती और मेरी कलम


लिखता हूँ तो लिख देता हूँ,
जिंदगी को हर तकाजे में.
ये ऐसा गुलिस्तां हैं दोस्तों,
जहाँ प्यास मिटती नहीं,
बस जिस्म के मिल जाने से.
ओठों को चख – चख के,
कितने मायूस हैं इस गलियारे  में.
जो  ठोकरों में भी मुस्कराए,
वैसे कमल को खिलता हूँ अपनी कलम से.
माँ सरस्वती का भक्त हूँ मैं,
मेरी आँखों को बस उनकी ही लालसा।
उनके चरणों को चुम लूँ,
तो मीट जाए मेरी हर तृष्णा।
ऐसे ही दुःस्वप्न ले कर,
भटक रहा हूँ जीवन के मरुस्थल में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

This is just to explain that life is not only for success in professional life, in relationship. It is beyond that to understand the connection with the source of energy.

जिंदगी


जिंदगी छोटी ही सही, मगर खोटी नहीं होनी चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रसोई सम्भालूँ क्या?


तेरे मस्त -मस्त आँखों से,
कुछ ख्वाब चुरा लूँ क्या?
तू दे – दे इज़ाज़त तो आज,
रसोई सम्भालूँ क्या?
तेरे ओठों को पीने की,
रोज -रोज चढ़ी रहती है.
तू दे – दे इज़ाज़त तो आज,
चूल्हा जला दूँ क्या?
कंघी तेरी जुल्फों से,
जब बूंदों को छानती है.
गीली साड़ी में तू,
सुलगती गैंठी सी लगती है.
तू दे – दे इज़ाज़त तो आज,
सारे कपड़े धो डालूं क्या?

 

परमीत सिंह धुरंधर

ग़ालिब बना दिया


जिंदगी के शौक ने काफिर बन दिया,
मजनू बनने चला था, ग़ालिब बना दिया।
हुस्न वालो की शहर में होता है,
चर्चा मेरा एक बेवकूफ के रूप में.
क्यों की मैंने उनको,
उन्हीं का आइना दिखा दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

सोचता हूँ


कब तक दूसरों के चिराग से काम चलाऊ,
सोचता हूँ अब अपना दिया जला ही लूँ.
गम नहीं है जिंदगी यूँ ही अकेले अंधेरों में,
सोचता हूँ इन दीवारों को भी थोड़ी रौशनी दिखा हीं दूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हम उनके शहर में आ गए हैं


बनेंगे अब रिश्ते मेरे धुआंधार,
की हम भी बेईमानों में आ गए हैं.
पूछने लगी हैं अब वो भी रोज मेरा हाल,
की हम उनके शहर में आ गए हैं.
मेरे ख़्वाबों को तोड़ के,
कर रहा है बुलंद मेरे इरादें, ये जमाना,
की हर फलसफा सिख कर जिंदगी का,
हम भी अब गुनाहगारों में आ गए हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मुसाफिर की किस्मत में


मुसाफिर की किस्मत में,
माँ का सुख कहाँ?
लड़कियों की चाहत,
ताउम्र सफर की,
उनका एक मुकाम कहाँ?
जो मान लेते हैं,
झटपट अपने बेगम की हर ख्वाइस।
ऐसे शौहर को क्या पता?
की बेगम के शौक क्या -क्या?
और नजरें कहाँ – कहाँ?

 

परमीत सिंह धुरंधर

जीवन


मैं धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे जो जवान हुआ,
कितनों ने राहें बदली, कितनों ने सलवार बदलीं।
मैं धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे जो कुर्बान हुआ,
कितनों ने निगाहें बदली, कितनों ने आँगन बदलीं।
मैं धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे जो धनवान हुआ,
कितनों ने रातें काटी, कितनों ने दांत काटी।
मैं धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे जो परेशान हुआ,
कितनों ने ईमान बदली, कितनों ने पहचान बदली।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Life


There is two ways to live the life. One, where you get all success, awards, recognitions, crowd behind you. The other way is to live like Prof. V. Sitaramam, Pune University, where there is only loneliness. And long back, I have chosen the second way.

 

Parmit Singh Dhurandhar

मेरी गृहणी


तन्हाई मेरी इस कदर संगनी बन गयी है,
की संगनी मेरी तन्हा हो गयी है.
दर्पण देख के वो गुंथी है अपने केशुंओं को,
हर एक केशु में मेरी खुसबू को ढूंढती।
बेबसी मेरी इस कदर गृहणी बन गयी है,
की गृहणी मेरी बेबस हो गयी है.
सजती है जिस माथे पे लाल बिंदी लगा के,
उस माथे पे अब चिंता की लकीरे उभरने लगी है.
उदासी इस कदर मेरी जिंदगी बन गयी है,
जिंदगी मेरी अब उदास हो गयी है.

 

परमीत सिंह धुरंधर