अब तेरे पाँवों में बेड़िया नहीं, खनकती चूड़ियाँ हैं


सितारों से भी जयादा तन्हाई लिए हूँ,
एक उदासी सी बैठ गयी है जिंदगी में,
तेरे जाने के बाद.
मैं आज तक वो दर्द, वो बेबसी,
वो गहराई लिए हूँ.
जवानी तो उसी दिन ढल गयी,
कहानी भी जिंदगी की खत्म हो गयी,
जब तूने राहें बदल लीं.
मैं तो आज तक वो निशाँ तेरे क़दमों के,
संजोएं बैठा हूँ.
साँसे तो है, बस सिसकती हुई,
तेरे लौट आने की आस लगाये।
इन्हे कौन बताये?
की अब तेरे पाँवों में बेड़िया नहीं,
खनकती चूड़ियाँ हैं.
मैं आज भी ये राज इनसे,
छुपाये बैठा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हसरते उनकी भी कम जवाँ न थीं


मोहब्बत में उनके अर्ज किया था,
की जान तक अपनी लूटा देंगे।
हसरते उनकी भी कम जवाँ न थीं,
बर्बाद ही करके छोड़ेंगे।
मोहब्बत कुछ ऐसे बढ़ी अपनी,
की जमाना तक दुश्मन हो गया.
पता भी हमें तब चला, जब उनकी,
डोली उठा कोई और ले गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जरूरतें


बचपन में त्योहारों की, जवानी में ललकारों की,
और बुढ़ापे में सहारों की जरूरतें होती हैं सभी को.

 

परमीत सिंह धुरंधर

यूँ ही धरा पे ये भीषण ठंड रहे


यूँ ही धरा पे ये भीषण ठंड रहे,
और तू यूँ ही मेरी बाहों में सिमटती रहे.
तेरी साँसे जीवित रखें मेरी नसों को,
यूँ ही मेरे रुधिर को गर्मी देती रहें।
मेरी पलकों पे तेरी ओठो का भार रहे,
बस एक रात ही सही सोनिये,
तेरी अधरें मेरी अधरों का आधार बनें।
ऐसे फिर रसपान करता रहूँ रात भर,
की जीवन भर गुमान रहे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नूरे – धुरंधर हूँ मैं


जंग तो होगी,
चाहे पूरी दुनिया एक तरफ,
और मैं अकेला ही सही.
नूरे – धुरंधर हूँ मैं,
पीछे हटने का सवाल ही नहीं।
मौत का भय मुझे क्या दिखा रहे हो,
लाखो दर्द में भी जो मुस्कराता रहा,
खून उसका हूँ मैं,
झुकने का सवाल ही नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं घनघोर विरोधी हूँ


मैं घनघोर विरोधी हूँ,
चक्रवात सा.
मेरी प्रखरता,
है आज भी एक विवाद हाँ.
ना रोक सके न तोड़ सके,
ना मोड़ सके कोई.
इसलिए कहते हैं सभी की,
मेरा होगा बुरा अंजाम हाँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न वालों को बस छावं ढूंढते देखा है


मोहब्बत भले न मिली जिंदगी में,
नफरतों ने मुझे आगे बढ़ने का मुद्दा दिया है.
जमाना कर रहा है कसरते मुझे मिटाने की,
मेरी साँसों ने तो बस मुझे जिन्दा रखा है.
किसने कहा की हुस्न के आँचल में जन्नतों का द्वीप है,
हमने तो बस यहाँ साँसों को सिसकते देखा है.
रातों के अँधेरे में तो वफ़ा हर कोई निभा दें,
दिन की चिलचिलाती लू में,
हमने हुस्न वालों को बस छावं ढूंढते देखा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

उलझते – उलझते


यूँ ही उलझनों में,
उलझते – उलझते,
सुलझाई है मैंने जिंदगी।
उनको नाज है की वो,
महफ़िलों की चाँद हैं.
मगर मैंने आज भी अंधेरों में,
जलाये राखी है ये रौशनी।

परमीत सिंह धुरंधर

मुसाफिर


सारे रिश्ते खामोस हो गए,
हम किसी राह पे,
वो किसी राह के मुसाफिर हो गए.
न कोई खबर, न इल्तिजा,
हम तो तन्हा ही हैं,
पर सुना है,
उनके लाखों रिश्तेदार हो गए.

परमीत सिंह धुरंधर

Do not be a part of substitution


If you cannot be a word in a sentence, try to be a comma or a full stop. However, do not be a part of substitution.

Parmit Singh Dhurandhar