दाल 250 रूपये किलो


जब प्रेम प्यास बन जाए,
तो दाल 250 रूपये किलो मिले,
या फिर 950 रूपये किलो मिले,
क्या फर्क पड़ता है?
तो अपना – अपना प्रेम सम्भालो दोस्तों,
मैं आज तक रोता हूँ, बस एक उनको खोकर।
दाल गलती है, एक दिन सबकी गल जायेगी,
दाल के चक्कर में भात ना गवाना दोस्तों।
भथुआ पे भात खाओ, तीसी पे भात खावों,
रोटी है तो थोड़ा साग भी साथ खाओ.
बस दाम बढ़ा है, कोई अकाल नहीं है यह,
की दाल के चक्कर में रात न गवाना दोस्तों।
मैं आज तक रोता हूँ, बस एक रात गवाकर।
जब अधरों पे प्यास जग जाए,
तो जाम बेवफाई का हो,
या वफ़ा का,
क्या फर्क पड़ता है?
तो अपना – अपना प्रेम सम्भालो दोस्तों,
मैं आज तक रोता हूँ, बस एक जाम ठुकराकर।

परमीत सिंह धुरंधर

नींद


कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो शब्दों में बखान नहीं होते,
थाली सोने की हो, या केले के पत्ते की,
माँ के हाथों के बिना, उसमे स्वाद नहीं होती।
हम कितना भी कमा लें पैसों – पे – पैसा,
और एक – से – एक बिस्तर लगालें,
मगर वो सुकून नहीं मिलती।
जो नींद आती थी पुवाल पे गावं में अपने,
वो अब इन हसीनाओं के गोद में नहीं मिलती।

परमीत सिंह धुरंधर

आनंद


जब दिल टूट जाए, तो माता – पिता की सेवा करनी चाहिए।
धन तो नहीं मिलेगा, पर आनंद जरूर मिलेगा।

परमीत सिंह धुरंधर

आप थे, तो किसी के चुम्बन में भी मज़ा था


जिंदगी के इस दौर में अकेला पड़ गया हूँ,
भीड़ से सजी इस बस्ती में भी मैं तन्हा पड़ गया हूँ.
ए पिता, धीरे – धीरे तेरी चाहत बढ़ने लगी है.
जिंदगी हैं मजबूर अब,
बिना तुम्हारे बोझ सी लगने लगी है.
आप थे, तो किसी के चुम्बन में भी मज़ा था,
बन के भौंरा, मैं भी मंडराता था.
अगर आप होते, तो मैं इठलाता,
अगर आप होते, तो मैं मंडराता,
फूल तो लाखों हैं, पर उनमे अब वो बात नहीं,
रिश्ते तो कई बन रहे, मगर वो मिठास नहीं।
रिश्तों के संगम में भी मैं प्यासा रह गया हूँ.
ए पिता, धीरे – धीरे तेरी चाहत बढ़ने लगी है.
जिंदगी हैं मजबूर अब,
बिना तुम्हारे बोझ सी लगने लगी है.

There is no meaning to have living relationship if you do not have a good relationship with your father.

परमीत सिंह धुरंधर

जब तक गुनाह नहीं होगा


जब तक गुनाह नहीं होगा,
कोई तुम्हारा अपना रिस्तेदार नहीं बनेगा।
ये वक्त ही ऐसा है दोस्तों,
जिन आँखों के लिए जी रहे हो,
वक्त आने पे,
वो भी तुम्हारा पहरेदार नहीं बनेगा।
जिस्म की भूख तो गौरेया को भी होती है,
पर शर्म की देवियों से नीचे,
कोई परिंदा भी नहीं गिरेगा।

परमीत सिंह धुरंधर

पर आज भी हम भिखारी हैं


उनकी कलम क्या लिखेगी, जो महलों के पुजारी हैं,
हमने तो बाँधा है लहरो को, पर आज भी हम भिखारी हैं.
उनकी नजरें क्या चाहेंगी, जो बस सत्ता से चिपकती हैं,
चाहत तो की बस हमने, की आज तक तन्हाई है.
क्या कहे उनपे जिनकी हर बात पे शर्म ही दुहाई है,
अजी, देखा है हमने, हर रात उनकी बजती नयी शहनाई है.

परमीत सिंह धुरंधर

मन


हौले-हौले बहती है गंगा, हिमालय की ऊँचाइयों से ढल कर,
ए मन तू न हो अधीर यूँ किसी की नजरों में गिरकर।

परमीत सिंह धुरंधर

हालात बदल रहें हैं


वो हाल पूछती है हमसे मौसम का,
जबकि उनके शौहर मौसम विभाग में हैं.
हालात इस कदर बदल रहें हैं,
की उनके बच्चे भी अब हमारी सोहबत में हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

पगुराने का मज़ा


जो मज़ा खाने में नहीं वो पगुराने में है.

परमीत सिंह धुरंधर

Lets try once again


Lets try once again,
Even if there is no chance,
Lets try once again.
Failure does not mean,
this is the last stage,
Lets try once again,
Lets try once again.
I still remember those nights,
When we were together,
I still have the same need,
And you still have the same fire.
Lets try once again,
Even if there is no chance,
Lets try once again.

Parmit Singh Dhurandhar