तेरी आँखों का रंग,
लगता है जीवन।
मेरी साँसों का समंदर बनके,
गोरी ले जा हंस के जवानी मेरी।
परमीत सिंह धुरंधर
These are just related to life as philosophy.
तेरी आँखों का रंग,
लगता है जीवन।
मेरी साँसों का समंदर बनके,
गोरी ले जा हंस के जवानी मेरी।
परमीत सिंह धुरंधर
खूबसूरत बंगलों में मोहब्बत की गुंजाइस ही क्या,
शिकारी शिकार करे तो फिर बचने की गुंजाइस ही क्या।
लो जल के रख दिया है दीपक, तुम संवर के बैठो तो ज़रा,
घूँघट न सरक जाए खुद-बी-खुद तो मेरी मोहब्बत ही क्या।
मिल जाएंगे तुम्हारे हुस्न के दीवाने कई हर मोड़ पे,
जिसके सीने में तुम धड़कों, उसका हर मोड़ पे मिलना ही क्या।
परमीत सिंह धुरंधर
जीवन हो तो शिव सा,
सर्वश दान कर दूँ.
मैं चखुं बस विष को,
जग को अमृत-पान दूँ.
अवघड कहे जग मुझे,
या भभूत-धारी।
या फिर योगी बन के,
मैं भटकता रहूँ।
पर भगीरथ के एक पुकार पे,
मैं प्रलय को बाँध दूँ.
जीवन हो तो शिव सा,
सर्वश दान कर दूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
इसी धरती पे हमने देखा अंग्रेजों को जाते,
इसी धरती पे हमने देखा सिकंदर को हारते।
इसी धरती पे हमने देखा ख़्वाबों को टूटते,
इसी धरती पे देख रहे हैं हम ख़्वाबों को लूटते।
हर दाल पे बैठा है एक मदारी,
दिखता है ख़्वाब जो रंगीन जीवन के.
मगर कोई कह दे कैसे हम डालें,
रंग उनमे हकीकत के.
हर मंदिर में जाके हमने माथा अपना टेका,
हर मस्जिद में जाके दुआ की अपने रब से,
फिर भी हार जाते हैं, हम मंजिल पे आके.
परमीत सिंह धुरंधर
संगम हुई तो समझे सरस्वती का दर्द,
वो मेरी न हो सकी जब हम थे एक संग.
भूल तो सबसे हुई पर हम भूल न सके,
एक भूल की इतनी बड़ी कीमत.
परमीत सिंह धुरंधर
बिखरना है जिंदगी इस कदर जमाने में,
की जर्रे – जर्रे में खुशबु रहे.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी आँखों का रंग,
यूँ बदलता है,
मेरा सितम ही मुझपे,
अब भारी पड़ता है.
गुनाहों का बोझ कब तक,
उठायें.
अब तो ईमान का बोझ,
भी गुनाह लगता है.
परमीत सिंह धुरंधर
हमने प्रेम में,
इतने तिरस्कार झेलें हैं.
आंसू भी निकलने से,
अब इंकार करते हैं.
चाँद कभी भी,
पलट के अमावस कर दे.
सैकड़ो सितारे भी,
इसके आगे विवस दीखते हैं.
जमाने का क्या है?
यहाँ तो सभी, दूसरों के चूल्हे,
की आग पे सेंकते हैं.
हम इस कदर,
दिल को जला चुके हैं,
हर शहर में, हुस्नवालों से पहले,
हम मयखाना ढूंढते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
आइए,
जिंदगी है,
तो गम उठाइए।
देव नहीं तुम,
जो रस का भोग हो।
ना दानव हो तुम,
जो दुष्ट तुम बनो।
मानव हो,
मृत्यु से तुम बंधे।
तो साँसों में,
स्वाभिमान का दीप,
जलाइए।
आइए,
जिंदगी है,
तो गम उठाइए।
इस धरा पे,
हर दुःख,
तुम्हारे लिए।
इन राहों की,
हर पीड़ा,
सिर्फ तुम्हारे लिए।
मगर,
जवानी है तुमको मिली,
तो हिमालय से,
टकराइए।
आइए,
जिंदगी है,
तो गम उठाइए।
परमीत सिंह धुरंधर
आरम्भ तो करो युद्ध का, विस्तार हम करेंगे।
शंखनाद तो हो कहीं, प्रहार हम करेंगे।
डर ही हो अगर आधार जिंदगी का,
शान्ति भी लाचारी लगती है.
पग को तो उठाओ, राह हम बनेंगे।
परमीत सिंह धुरंधर