रौशनी में दिवाली तो हर कोई मनाता हैं,
अंधेरों में दिया जलाना हमें आता है.
अपनी किस्मत पे गुमान करने वालो,
किस्मत के साथ जुआ खेलने का मज़ा हमें आता हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
These are just related to life as philosophy.
रौशनी में दिवाली तो हर कोई मनाता हैं,
अंधेरों में दिया जलाना हमें आता है.
अपनी किस्मत पे गुमान करने वालो,
किस्मत के साथ जुआ खेलने का मज़ा हमें आता हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी की मस्ती में मैं बहता चला,
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
मैं गिरता रहा, गिर कर उठता रहा.
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
लाखों राहें हैं मेरे लिए यहाँ बनीं,
पर मैं इन राहों का मुसाफिर नहीं.
उठ जातें हैं मेरे कदम खुद-ब-खुद उस तरफ,
जिस तरफ अंधेरों ने रखी है अपनी पालकी.
फूल कोई मेरी किस्मत में नहीं, ये जानता हूँ,
इसलिए बहारों से कोई रिश्ता, मैं रखता नहीं.
काँटों से उलझता हूँ मैं मुस्करा-मुस्करा कर,
की नशों में मेरे लहूँ की कमी नहीं.
ज़माने को ये नहीं हैं अंदाजा,
की ठोकरों में उसके हर हस्ती को, मैं तौलता चला.
जिंदगी की मस्ती में मैं बहता चला,
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
मैं गिरता रहा, गिर कर उठता रहा.
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम्हे इतना प्यार दिया है,
की अब निगाहें धरती पे हैं.
रातों को दिया जल के,
बेचैनी मेरे सिराहने पे है.
परमीत सिंह धुरंधर
विद्रोहियों की कोई जात नहीं होती,
इनकी कोई विसात भी नहीं होती।
पर बैठ नहीं सकते ये चैन से,
किसी भी परिस्थिति में,
इनको चैन नहीं मिलती।
अगर रोकना हैं इनको,
तो आप इनको मोहब्बत करा दो.
क्यों की वहीँ,
इनसे कोई विद्रोह नहीं होती।
उलझ के रह जाते हैं,
अपने ही दिल-दिमाग के जाल में.
भूख के खिलाफ लड़ने वाले,
विद्रोही की प्रेम में कोई औकात नहीं होती।
सिर्फ पुष्पों, सिद्धांतों, और नारी-सम्मान पे बोल के,
भारतीय नारियों का दिल नहीं जीता जा सकता।
और इनके जेब से,
सोने-चांदी के तोहफे खरीदी नहीं जाती।
तभी तो कोई स्त्री, किसी विद्रोही से प्रेम नहीं करती।
आवाज धीरे -धीरे कम हो जाती है,
घुट-घुट कर वो खुद से ही,
हतास-निराश हो जाती हैं.
और फिर एक दिन,
किसी अनजान से मोड़ पे,
विद्रोही के प्राण ही विद्रोह कर देते हैं.
लावारिस, अंजाना,
ना कोई देखने वाला, ना पहचानेवाला,
और अंत में इस तरह, एक विद्रोही की आवाज,
अनंत में सम्मिलित हो जाता है,
उदासी और हार के आवरण में ढक कर.
और समाज फिर चल पड़ता है,
उस विद्रोही की भुला कर.
और वो नाचने लगती हैं,
रईसो के दरबार में.
जिन बेड़ियों को तोड़ने के लिए,
जीवन भर विद्रोही ने विद्रोह किया।
उन्ही को अपने गोरे और नाजुक पावों में,
घुंघरू बना कर.
परमीत सिंह धुरंधर
ऐसे लूटा हूँ, की टूटे हुए,
खवाबो को सीने से लगाये बैठा हूँ।
परमीत सिंह धुरंधर
जली राहें,
जो काली राखों से ढकीं हैं.
हरे पत्तों और पुष्पों से बंचित,
पक्षियों के कलरव से रहित हैं.
ना ये प्रतिक हैं,
अन्धकार का,
ना किस्मत का,
ना हार का.
ये तो चिन्ह हैं,
उस संघर्ष का.
जहाँ, झुलस गए,
पर झुके नहीं।
मिट गए पर मुड़े नहीं।
मौत तक डटे रहे,
मगर पथ से हटे नहीं।
ये उत्साह है,
उत्सव है,
प्रेरणा है,
हम जैसे नवजवानों का.
जिनके लिए जिंदगी सिर्फ सफलता नहीं,
प्रयास हैं,
एक और असफलता का.
आदि है,
एक और सफर के अन्त का.
चाह है,
एक और विरह का,
अलगाव का.
जहाँ जिंदगी पैसो की चमक,
कंगन की खनक नहीं।
जुल्फों की छावं और ओठों का जाम नहीं।
जहाँ जिंदगी मरूस्थल की प्यास,
कीचड़ सी उदास,
हो कर फिर भी,
एक बुझते दिए का,
जलते रहने का,
एक आखरी प्रयास है.
परमीत सिंह धुरंधर
स्त्री को प्रेम जवानी में और मर्द को बुढ़ापे में होता है. एक को हमने चरित्रहीनता तो दूसरे को वासना का नाम दे दिया है, जबकि प्रेम की और दूसरी अवस्था सिर्फ और सिर्फ दोनों की मज़बूरी है. उसे रोकने के लिए हम वफ़ा, इज्जत, और समाज की दुहाई देते हैं और हमें रोकने के लिए वो उम्र, परिवार, और अपने बच्चों की दुहाई।
परमीत सिंह धुरंधर
किसी भी हालात से डरना नहीं है,
मौत भी समक्ष हो,
तो हटना नहीं है.
चंद साँसों के लिए,
क्या समझौता करें हम,
अँधेरी राहों में भी हमें रुकना नहीं है.
तुझको मुबारक हो ए साथी,
ये गुलिस्तां,
तेरे बाहों के लिए हमें पलटना नहीं है.
धरती पे आएं हैं तो दलें जाएंगे,
या दल के जाएंगे,
भय से बंध के हमें सिकुरना नहीं है.
कुछ भी मिले या न मिले हमको,
पर अमीरों की बस्ती में,
गरीब बनके रहना नहीं है.
परमीत सिंह धुरंधर
वो मुस्कायीं,
मेरी जवानी देख कर.
फिर मेरी मैय्यत पे ही,
आकर मुस्कायीं।
ऐसी मोहब्बत थी हम में,
की वो कभी,
फिर, मेरे घर नहीं आई.
उन्हें अपनी माँ से ज्यादा,
मेरी माँ पसंद थी.
आखिरी क्षणों तक,
मुझे कहाँ खबर थी,
की अपनी माँ की खुशियों के लिए,
वो मेरी माँ को रुला गयी.
परमीत सिंह धुरंधर
रिश्ते सुधर लो,
कब तक यूँ उनसे उलझते रहोगे?
क्या, इरादा है?
कब तक यूँ इन गलियों में भटकते रहोगे?
दिन तो कट ही जायेगी,
कहीं किसी के दूकान पे,
चाय का सवाद ले कर.
किसी घने वृक्ष के नीचे,
तन डाल कर.
सोचों, रातों का क्या करोगे?
कब तक यूँ अंधेरों में,
दिया जलाओगे?
(I would prefer to live with you,
to a life with a new.
With all pain and happiness,
would prefer to be with you.)
परमीत सिंह धुरंधर