लाल साड़ी


लाल साड़ी में आपको देख के,
दिल तो बईमान हो गया हैं.
हम ही अभी तक,
इस ईमान को थामे बैठे हैं.
ये जानते हुए की आप,
किसी और की हो रही हो,
जाने क्यों आपका आँचल पकड़े बैठे हैं.
जाने किस्मत में क्या लिखा है,
और आप कितना समझोगी,
मगर हर रात,
आपके लिए दिया बुझा के बैठे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

दरार


जमीन नयी हो तो निगाहें पड़ ही जाती हैं,
रिश्ते चाहे कितने ही करीब हो, दरार आ ही जाती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

अमावस की रात


रहनुमाओं की खोज में, हसरतें जवाँ हो गयी,
जवानी के जोश में हम तनहा रह गए.
कब तक उछालोगे ये आज़ादी का जश्न,
सबको खबर हो चुकी है, ये रात हमें खोखला कर गयी.
और बेइंतहा मोहब्बत करते थे सितारों से हम,
अमावस की रात को, कत्ले-आम मच गयी.
अब ना हम हैं, ना वो हैं, ना जवानी का वो गुरुर,
मुफलसी है, तन्हाई है, और थोड़ी साँसे बच गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

ख़्वाब


ख़्वाब तो टूटते ही रहते हैं मेरे,
किस्मत वालों से कह दो,
बंजारे भटकते रहते हैं.
इल्जाम आये तो हम मुकरते हैं,
दहाड़ रखने वालो को, दुनिया वाले,
अहंकारी कहते रहते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

जुदाई


ए दिल तुझे कितना देखें शरारत से,
कहानियों की रात अब खत्म हो गयी.
जिसके लिए किस्सा गढ़ते हैं दिन भर,
राहें उनकी हमसे जुदा हो गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी


दुआओं से जिंदगी नहीं चलती,
सितारों से कह दो,
हम तन्हा रहते हैं।

परमीत सिंह धुरंधर

खालीपन


तेरी आँखों का कालापन,
मेरे मन का कुँवारापन।
एक है सागर की गहराई लिए,
और एक में, दहकते रेगिस्तान का सूनापन।
तेरी योवन का ये अकेलापन,
मेरे मन का ये बंजारापन।
एक है हिमालय सा उन्नत,
और एक में अनंत बसा ये खालीपन।

परमीत सिंह धुरंधर

पाप


बचपन,
जो प्रगतिशीलता का विरोध करता है.
बचपन,
जो आधुनिकता का विरोध करता है.
बचपन,
जो, “मैं ही सबसे अच्छा हूँ”, में विश्वास रखता हो.
ऐसा बचपन जब जवानी में आता है,
तो पतन होता है.
यह पाप होता है.
जवानी,
जो अपने घर को टुटा-फूटा समझती हैं.
जवानी,
जो अपने इतिहास, साहित्य की निंदा करती हैं.
जवानी,
जो अपनी पत्नी को कुरूप और भोग्या समझती हैं.
ऐसी जवानी जब मस्तक पे छाती हैं,
तो पतन होता है.
यह पाप होता है.
बुढ़ापा,
जिसमे अपने किये पे पछतावा होता है.
बुढ़ापा,
जिसमे हर छाया में स्त्री का आभास होता है.
बुढ़ापा,
जिसमे ह्रदय में वासना का निवास होता है.
ऐसा बुढ़ापा जब शरीर पे आता है,
तो पतन होता है.
यह पाप होता है.

परमीत सिंह धुरंधर

यकीन


मुझे पीने का शौक हैं,
तू पिलाने की शौक़ीन बन.
छोड़ ये वफ़ा, बेवफाई की बातें,
तू एक बार तो,
इन बादलों की जमीन बन.
मुझे बरस कर,
मिट जाने का डर नहीं।
तुझे भींग कर,
लहलहाने में भय है.
कब तक टकटकी लगाओगे,
खुदा के दर पे मदद की,
कभी तो अपने योवन का यकीन बन.

परमीत सिंह धुरंधर

प्रयास कर


प्रयास कर, ए मानव,
प्रयास कर.
विपरीत है परिस्थिति,
तो कुछ खास कर.
प्रयास कर, ए मानव,
प्रयास कर.
तू तरल नहीं,
जो ऊंचाई से फिसले.
तू सरल नहीं,
जो उनके अंगो पे बहके.
मिला है तुझे योवन,
तो चट्टानों पे प्रहार कर.
प्रयास कर, ए मानव,
प्रयास कर.
माना, तेरी किस्मत में,
सुबहा नहीं,
माना, अंधकारों में,
कोई तेरे पास नहीं.
माना, ठोकरों ने तौला है तुझे,
माना, नहीं बची हैं तेरी साँसे.
पर आखिरी क्षणों तक,
बनके धुरंधर, हुंकार भर.
प्रयास कर, ए मानव,
प्रयास कर.
रणभूमि सजी है,
तो क्या तेरा अपना-पराया.
हर तीर मिटा सकता है,
तेरा अपना साया।
तो हर बढ़ते कदम पे अपने,
खुद ही जय-जय कार कर.
प्रयास कर, ए मानव,
प्रयास कर.

परमीत सिंह धुरंधर