अपने दर्द को समेटे, बैठा है समंदर,
आंसुओं को सैलाब बना के.
कोई क्या समझेगा जिंदगी,
जो जीता है गमो को बिना मुस्करा के.
परमीत सिंह धुरंधर
These are just related to life as philosophy.
अपने दर्द को समेटे, बैठा है समंदर,
आंसुओं को सैलाब बना के.
कोई क्या समझेगा जिंदगी,
जो जीता है गमो को बिना मुस्करा के.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे सीने पे, उनकी अधरों का चुम्बन,
अब कोई तीर भी चलाये, तो क्या गम है.
एक बार तैर गए ये दरिया,
अब डूब भी जाएँ, तो क्या गम है.
मौत तो आएगी, अगर जिंदगी है,
मौत ही अगर जिंदगी हो, तो क्या गम है.
परमीत सिंह धुरंधर
राजपूत हो के भी,
मैंने कौन सा युद्ध लड़ा?
इतिहास के पन्नो पे,
मैने क्या है लिखा?
एक महान पिता की,
संतान हो के भी,
मैं नारी के तन से,
खेलता रहा.
एक चक्रवर्ती का पौत्र,
हो कर भी,
मैं यूँ ही जुल्फों से,
बंधा रहा.
उनकी अधरों की लाली,
और देह का चुम्बन,
के पीछे मैं,
भागता रहा.
धिक्कार है मुझे,
मेरे जीवन पे.
मैं उनकी घुंघरुओं पे,
कीड़ों सा मचलता रहा.
अब सजे कुरुक्षेत्र,
मेरे ईश्वर.
रौंद दूंगा।
तीरों से वेंधा जाऊं,
या तलवार से कटा जाऊं,
लेकिन धरती से आकाश तक,
मैं भी भीषण प्रहार करूँगा.
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी से मुझे मोह तब हुआ,
जब तेरी गोद में मैं खेला, पिता .
और जिंदगी से मोह भी तब टूटा,
जब तुझे काँधे पे ले के चला.
परमीत सिंह धुरंधर
ए सितारों बरसना सीखो,
बादलों से मेरी जंग छिड़ चुकी है.
अब वो नहीं बरसेंगे मेरी जमीन पे,
और मैं नहीं विचरने दूंगा उन्हें,
अपनी सरहदों पे.
ए सितारों गरजना सीखो,
बिजली से मेरी जंग छिड़ चुकी है.
वो गरजेगी हमारी सरहदों में,
डराने को हमें.
हम भी ललकारेंगे उसे,
अपनी जमीन पे मशाल जला के.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं ख़्वाब देखता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
मेरे वृक्षों पे फल नहीं लगते,
फिर भी मैं उनको सींचता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
बागों में अपने मैं आम नहीं,
शीशम लगता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
मेरे तालाब की मछलियाँ,
किनारों पे तैरती हैं.
और मैं बीच पानी में,
बंसी डालता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
हर शाम हारता हूँ,
युद्ध जीवन का.
पर नयी सुबह में,
नयी रणभेरी छेड़ता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
दो रात बाहों में आये,
दो पल मुस्करा के.
दो जिंदगियां तबाह कर गए,
दो सर्द-रात संग में गुजार के.
परमीत सिंह धुरंधर
शाम होते ही उनकी तलब होती है,
मोहब्बत जिंदगी बदल देती है.
रहम की भीख क्यों और किस से मांगे,
मेरी आंसूओं पे ही वो मुस्करा देती है.
परमीत सिंह धुरंधर
हर सीरत का एक सूरत है, हर सूरत में सीरत नहीं,
हर जोड़े में एक इश्क़ हैं, हर इश्क़ का जोड़ा नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
मयखाने सारे सुख गए,
नजराने सारे खो गए.
कोई कैसे जिए,
कब तक उम्मीदों के सहारे.
जब सबके घर,
यहाँ बस गए.
परमीत सिंह धुरंधर