बाप का मंत्र कभी बेकार नहीं जाता,
ब्रह्माश्त्र भी इस के सामने काम नहीं आता.
परमीत सिंह धुरंधर
These are just related to life as philosophy.
बाप का मंत्र कभी बेकार नहीं जाता,
ब्रह्माश्त्र भी इस के सामने काम नहीं आता.
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी दो पलों की, बेवफाई उम्र भर का,
रिश्ते यूँ ही नहीं बनते, लहू हो या दिलों का.
परमीत सिंह धुरंधर
सितम बहुत हुई, ए सितमगर,
अब लड़ेंगे हम.
भय, डर कुछ भी नहीं है,
अब कोई समझौता नहीं करेंगे हम.
परमीत सिंह धुरंधर
कब तक दुवाओं के सहारे,
जिन्दा रहोगे।
कभी जिंदगी में कुछ और भी तो,
आजमाओ।
ये सच है,
दरिया के मौज़ों में मज़ा है बहुत,
पर कभी शांत, स्थिर समुन्दर में,
भी सबकी तो लगाओ।
परमीत सिंह धुरंधर
सजा देते, देते
दुआ दे गए.
दुश्मन मेरे,
मुझको गले से लगा के.
जिसके लिए,
दुनिया छोड़ी।
वो ही खंजर चुभा गए,
मुझको गले से लगा के.
परमीत सिंह धुरंधर
उनकी हर सरहद पे,
मेरी लहरो का निशान आज भी बाकी है.
दुश्मनो में हलचल मचा देने के लिए,
मेरा एक नाम ही काफी है.
मैं हार के बैठ भी जाऊं,
तो गम होता है उन्हें।
उनके माथे पे एक बल के लिए,
बस मेरी चंद साँसे ही काफी हैं.
वो सजती हैं,
घंटो आइना देख के.
उनकी आँखों में हया और गालो पे लाली के लिए,
मेरी एक नजर ही उनपे काफी है.
बरसों से कोशिस कर रहा है जमाना,
मुझे बिखराने के लिए.
उसकी हर आजमाइश पे,
मेरा मुस्कुराना ही काफी है.
परमीत सिंह धुरंधर
क्या ढूंढता है इन आँखों में तू,
सितारे चाहिए या चाँद ढूंढता है तू.
दे सकती हूँ चंद राते चांदनी की मैं,
या पूरा आसमान ढूंढता है तू.
जाम का मज़ा हलके-हलके छलका के पीने में हैं,
या एक बार में ही गटकना चाहता है तू.
किस्मत है तेरी, पूरा मज़ा ले,
या प्यास अपनी मिटाना चाहता है तू.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं कर्म कोई भी करूँ,
खुदा उसे गुनाह गिनता है.
परमीत सिंह धुरंधर
शौक रखता हूँ तैरने का सागर की लहरो पे,
पर कमबख्त ये प्यास दरिया तक खींच लाती है.
सोचता हूँ कहीं गावं में बस जाऊं, पर
दौलत की चाहत शहर तक खींच लाती है.
परमीत सिंह धुरंधर
बचपन के शौक जवानी को दुःख देते हैं,
और जवानी की मौज़ बुढ़ापे को रुला देती है.
कोई क्या सितम ढायेगा मुझपे,
जिसकी औलाद ही उसे गैर बता देती है.
मोहब्बत का शौक लेकर चला था,
हाथों में गुलाब लेकर चला था.
अंदाजा नहीं था जमाने के नए रूप का,
जहाँ फ्रेंडशिप ही अब सबकुछ बिकवा देती है.
क्या किस्सा सुनोगे दोस्तों, उनकी डोली उठने के बाद,
अब तो जवानी भी बुढ़ापे का एहसास देती है.
इतना तरसने के बाद भोजन का क्या,
ऐसा खाना अब भूख और बढ़ा देती है.
मुझसे मिलने आते हो तो मेरा पता मत पूछ,
मेरे नाकामयाबी, घर आने वाली हर राह में दिए जल देती है.
परमीत सिंह धुरंधर