बहुत लिखूंगा ए कलम तुझे अपना बनाकर,
किसी सितमगर-जालिम से अपना दिल लगाकर।
परमीत सिंह धुरंधर
These are just related to life as philosophy.
बहुत लिखूंगा ए कलम तुझे अपना बनाकर,
किसी सितमगर-जालिम से अपना दिल लगाकर।
परमीत सिंह धुरंधर
इतना मत सोच दिल मोहब्बत की नाकामियों पे,
जिंदगी में तुझे और भी बोझ उठाना बाकी है.
कब तक झुकाएगा खुद को खिदमत में किसी की,
अभी इबादत में में सर को झुकाना बाकी है.
और कितना भागेगा अपनी प्यास मिटने के लिए,
अभी तेरा इस जिंदगी में दरिया तो बनना बाकी है.
परमीत सिंह धुरंधर
चंद पलकों की शिकायत,
की हम में कुछ नहीं है,
उनके होठों से मेरे कानो तक,
आते-आते ज़माने गुजर गए.
परमीत सिंह धुरंधर
अब क्या मोहब्बत करूँ, जो शौक था मेरे,
तूने तोड़ दिया, मैंने छोड़ दिया।
परमीत सिंह धुरंधर
सुबह इतनी बारिश हुई,
की मैं शाम तक गीला रहा.
जिस रात हमें तुम छोड़ गयी थी प्रिये,
मैं सागर के तट पे टहलता रहा.
उठती हुई लहरो के बीच,
मैं अकेला ही जूझता रहा.
अनुकूल नहीं वो प्रतिकूल पल था,
विफल रही हर एक योजना।
मज़धार में फंसा मैं,
तेरी तस्वीर को संजोता रहा.
परमीत सिंह धुरंधर
रौशनी करो,
दूसरों की जंदगी में.
तभी दुःख मिटेगा,
सामाज से.
उत्सव होगा,
समूह गान होगा.
जैसे उषा के आने पे,
प्रकृति कलरव करती है.
तभी हर इंसान,
प्रयाश करेगा।
जैसे अंधेरो में दुबके,
अपने पंखों को समेटे पक्षी,
पंखो को पसार,
आकाश को चुनौती देते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
बहुत कष्टमय होता है वो जीवन,
जिसका हर क्षण पुष्पों के साथ गुजरे।
काँटों का दर्द यहाँ कौन समझता है,
जहाँ हर भौंरा पुष्प को चूमता है.
परमीत सिंह धुरंधर
सूरज ने जब तपाया धरती को,
बादलों ने दी शीतलता।
एक बीज कही अंकुरित हुआ गोद में,
वृक्षों ने फिर लीं धरती पे साँसे।
थका-हारा एक राही,
जब छाँव में सुस्ताने बैठा।
तो वृक्षों ने दी उसके साँसों में,
जीवन की एक नई आशा.
जीवन का ये ही चक्र है,
छोटा-बड़ा, कोमल -पत्थर।
एक जीवन दूसरे जीवन से,
एक हाथ, दूसरे हाथ से बंधा है.
परमीत सिंह धुरंधर
सबका हित हो,
सबका कल्याण हो.
मानव के संग,
मानवता का विकास हो.
न किसी का शोषण हो,
न कोई शोषित ही रहे.
भारत वर्ष में,
जन-जन का उत्थान हो.
ना कोई बच्चा दूध को तरसे,
ना बूढें अब भोजन को.
शिक्षित – अशिक्षित सबका,
सबपे हक़ अब सामान हो.
किसी एक के आंसू पे,
ना दूसरे का मुस्कान हो.
भारत वर्ष में,
जन-जन का उत्थान हो.
मानव के संग,
मानवता का विकास हो.
परमीत सिंह धुरंधर
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
जब जीना ये चाहते हैं,
साँसे टूट जाएँ,
जब पीना ये चाहते हैं,
दरिया सुख जाए.
इनके बस में कही कुछ भी ना,
एक तेरे नाम के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू विधाता।
भोले – भाले,
पल में छले जाते हैं,
बेबस, लाचार,
अपने शर्म से मर जाते हैं.
कोई दुआ नहीं, कोई दया नहीं,
जीवन में इनके,
बस तेरी एक आस के सिवा।
गरीबों की सुन ले ए दाता,
इनका कोई नहीं, तू है विधाता।
परमीत सिंह धुरंधर