भिगों के धरा को आंसुओं से,
कब मोहब्बत मिला है किसे।
सींच दो किसी बंजर को इतना,
की कहीं तो कोई फसल उगे.
भाग कर उसके पीछे,
कौन पा सका है उसको।
हल ही चला दो किसी बंजर पे इतना,
की कहीं तो धरती से भूख मिटे।
परमीत सिंह धुरंधर
These are just related to life as philosophy.
भिगों के धरा को आंसुओं से,
कब मोहब्बत मिला है किसे।
सींच दो किसी बंजर को इतना,
की कहीं तो कोई फसल उगे.
भाग कर उसके पीछे,
कौन पा सका है उसको।
हल ही चला दो किसी बंजर पे इतना,
की कहीं तो धरती से भूख मिटे।
परमीत सिंह धुरंधर
मैंने खुदा से पूछा,
की कब तक रखोगे,
इस जालिम जमाने में मुझे.
तो खुदा बोलें,
की अभी ज़माने में,
तेरी चाहत बहुत है.
परमीत सिंह धुरंधर
तारीखे-मिलन पे चर्चा करनी हो अगर,
तो महफ़िल में मेरा कोई काम नहीं.
जश्ने-कुर्बानी मनानी हो अगर,
तो मेरा बांकपन अभी बाकी है.
होठों को पीने की तमन्ना अब कहाँ,
रक्त का कतरा बहना हो अगर,
तो मेरी जवानी अभी बाकी है.
मत पूछो की जोशे-उद्गम कौन है मेरा,
अभी इस सागर में,
कितनी नदियों का मिलना बाकी है.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी पलकों से इतना बिसरे हैं,
अब घुल रहे मेरे भी मिसरे हैं.
अर्ज करें से पहले कुछ भी,
तेरी इज़ाज़त चाहिए.
अब मेरी जिंदगी के बचे,
कुछ ही लम्हें हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
उनकी बेवफाई का गम तो बहुत है,
पर जिंदगी में दर्द भी तो बहुत है.
रोज सोचता हूँ,
आज सारे दुश्मनों को मिटा दूँ,
पर कमबख्त,
इस दिल में मोहब्बत भी तो बहुत है.
कैसे रखूं तलवार उनके गर्दन पे,
उनकी आँखों में आंसू भी तो बहुत है.
परमीत सिंह धुरंधर
समर में समर ने,
दिखाया ऐसा होसला.
समर ही नहीं बचा कोई,
अब समर के लिए.
एक हम ही हैं,
उलझे हुए हैं अब भी समर में.
जाने कितने समर बचे हैं और,
मेरे इस जिन्दगी के समर में.
परमीत सिंह धुरंधर
सर में ना एको बाल,
ना आँख में बा जोति।
फिर भी बुढऊ ढुढ़े लें,
कोई एगो, पकावे ल रोटी।
परमीत सिंह धुरंधर
कालेज में एक नया चेहरा,
मजनुओं के महफिल में,
जोश जगा गया.
जो मिट गए मोहब्बत में,
वो किसी काम के नहीं.
पर इन बचे हुए, दबे, हारे,
कुचलों के मन में,
इंकलाब जगा गया.
कुछ खास नहीं,
बस एक दुप्पट्टे में हैं,
इस उजड़ी हुई बस्ती में,
एक चाँद सी हैं.
की एक,
चलना ही देख कर उनकी,
बहक रहे हैं यहाँ सभी,
एक झलक उनकी,
कब्र में जाने से पहले,
जन्नत दिखा गया.
अब साजिस रची जाएंगी,
किस्से गढ़े जाएंगे,
जीते-जश्न, गमे-हार,
के दौर भी आएंगे।
मगर, उदास चेहरों,
बुझती जवानी,
इन अँधेरी रातों में,
कोई फिर से आज,
सुनहरे भविष्य और,
मीठे ख़्वाबों का,
एक दिया जला गया.
परमीत सिंह धुरंधर
दर्द ही अगर जिंदगी है तो मोहब्बत खुले आम कर,
शौक ही अगर तेरा यह ही है तो बेवफाई का न गम कर.
हौसले अगर पस्त ना हुए हो तेरे तो बढ़ा चल, बढ़ा चल,
वो किसी और की डगर तू एक नयी थाम कर.
खूबसूरत चेहरे चाँद से और आँचल उनका बादल सा,
बरस गए तो किस्मत तेरी वरना नए मानसून का इंतज़ार कर.
शहीद हुए कितने इन राहों में कौन आंसू बहता है,
मौत से जो निर्भय है वो ही हुस्न से दिल लगता है.
बेवफाओं की इस बस्ती में कितने उजड़ गए,
किस -किस का जिक्र करें और कहाँ -कहाँ करें।
तू अपनी सोच, मंजिल पे नज़र रख, बढ़ा चल-बढ़ा चल,
वो किसी और की डगर तू एक नयी थाम कर.
परमीत सिंह धुरंधर
किनारों की चाहत में तैरने वालो में हम नहीं,
बैठें हैं मज़धार में, डूबनें वालों में हम नहीं।
कष्ट होगा मुझे जितना लिखा हैं,
मोतियों को पाने से किस्मत बदलती नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर