माही


शैतान माही की चंचल शैतानियाँ,
सीधे से मनु की कीमती नादानियाँ,
उसपे से बाबूसाहब की कभी न खत्म,
होने वाली लम्बी कहानियाँ।
हसीं पल वो लौट के नहीं आ रहे,
पर छोड़ गए हैं धड़कनो पे गहरी निशानियाँ।
चावल, दाल, सब्जी, और उसपे चलती थी,
भाभी के हाथों से मीठी मछलियाँ।
वो स्वाद, वो एहसास, वो मिठास,
अब कहाँ सजने वाली हैं,
रसोई में मेरे ये खनकती थालियाँ।

परमीत सिंह धुरंधर

मन का प्रेम


अब अकेले खाने का मज़ा आएगा,
हर कौड़ किसी की याद लाएगा।
ये कोई बदन का दर्द नहीं,
की योग करके मिटा दूँ.
ये तो मन का प्रेम है,
अब आत्मा के साथ ही जाएगा।

परमीत सिंह धुरंधर

प्यास


तुम्हें दर्जनो की मोहब्बत मिले,
मैं यूँ ही प्यासा भटकता रहूँ।
तुम्हें चाँद-तारों की रोसनी मिले,
मैं यूँ ही अंधेरों में जाता रहूँ।
मेरी मोहब्बत ही सच्ची थी,
पर मैं सोना-चांदी नहीं ला सका।
तुम्हें सोहरत मिले, तुम्हें दौलत मिले,
मैं यूँ ही फकीरी में तेरी चित्र बनता रहूँ।
तमन्ना थी की आँखों का काजल बनूँ,
जुल्फों का गजरा, होठों की लाली बनूँ।
तेरा सौंदर्य सदा सबकी प्यास जगाता रहे,
मैं यूँ ही आँसुंओं से प्यास मिटाता रहूँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कीमत


शादी हुई तो समझे खाने -खिलाने की कीमत,
माँ दौड़ती थी कौड़ ले के, हम ठोकर लगा गए.
वैसी सब्जियां क्या पकाएंगी, मेरी माँ जो पकाती है,
हम थे, आँखों में देख हाथ की तारीफ कर गए.
थकी-हारी, भूखी, जो सिर्फ मुझे देख के,
मुस्करा दे, वो है मेरी माँ, जिसे मैं कुछ दे न सका.
और महबूब की एक सालाना मुस्कान के पीछे,
हम सोना -पीतल सब कुछ चढ़ा गए.
अब उठती है, तो माँ से बात करती है घंटो,
एक हम है जो उनके लिए कब का अपनी माँ भुला गए.
शादी हुई तो समझे खाने -खिलाने की कीमत,
माँ दौड़ती थी कौड़ ले के, हम ठोकर लगा गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सोना -पीतल


फ़क़ीर मत समझो तकदीर मेरी देख के,
जवानी थी अपनी, अमीरी लूटा गए.
ऐसे -ऐसे शौक पाले थे, वो मांगती गयी,
हम सोना -पीतल सब कुछ चढ़ा गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पानी ही पानी


उनसे मिलने के पहले, खुद से मोहब्बत थी,
उनसे मिलने के बाद, खुद से नफरत होती है.
पहले हम दिन-रात सोते ही रहते थे,
अब नींदें उनकी, तन्हाई अपनी है.
की कहाँ रखे सीने में उनकी यादो को संभाल के,
अब हर तरफ, चारो और पानी ही पानी है.
बस पानी ही पानी है.

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


वो कहते हैं की आमिर का फोटो बल्गर नहीं,
जो खुद किरण राव को बुर्क़े में रखते हैं.
हमें क्या अब सैफ समझायेंगे की मोहब्बत क्या है,
जो मोहब्बत की शुरुआत भी तालाक से करते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

मुर्ख से मोहब्बत


टूटते है शहंशाह के, तो ताज बनते हैं,
ये हम हैं जो उसे आंसुओं में बहा गए.
मुर्ख से मोहब्बत, उजाड़ देती है किस्मत,
हम आज भी अकेले, वो लाखो रिश्ते बना गए.
दिल्रुबावों का दिल और दामन, दोनों ही,
खुसबू से भरा है, मोहब्बत से नहीं.
मोहब्बत तो मैले – कुचले आँचल में उसके,
हम जिसके आँखों में कीचड़, ह्रदय में खंजर उतार गए.
मैं किस खुदा को सजदा दूँ और किस दर पे,
खुदा खुद दिग्भ्रमित है,
जब वो अपनी चुनर को तीज की साड़ी बता गए.
मोहब्बत का जिक्र मुझसे ना करो यारो,
इस कुरुक्षेत्र में जीतकर, वो मृतकों को काफ़िर बता गए.
घूम-घूम कर मांगते हैं,
हर गली-मोहल्ले में औरतों का सम्मान,
जवान जिस्म की चाहत में जो, अपनी बीबी को छोड़ गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ताज


टूटने पे, शहंशाह के, ताज बन जाते हैं,
ये तो इंसान हैं जो आंसुओं में बहा देते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

गुलाबो


ए गुलाबो, वो गुलाबो,
सुन गुलाबो तू जरा,
मेरी छमिया, मुझको छोड़ चली,
अब घर सम्भाल तू मेरा।
छोटे- छोटे मेरे बच्चे,
देख तुझी को अम्मा बोलें।
इनके मुख को ही देख के,
अब चूल्हा जला तू मेरा।
ए गुलाबो, वो गुलाबो,
सुन गुलाबो तू जरा,
मेरी छमिया, मुझको छोड़ चली,
अब घर सम्भाल तू मेरा।
बोलेगी तो नथुनी दिला दूँ,
ना तो बोलेगी तो हँसुली।
जो आये मन में, वो करना,
करूँगा ना, टोका – टोकी,
बस साँझ -सबेरे आके कर दे,
चूल्हा -चौकी तू मेरा।
मेरी छमिया, मुझको छोड़ चली,
अब घर सम्भाल तू मेरा।

 

परमीत सिंह धुरंधर