अब जीने का मन नहीं


अकेला हूँ, थका हूँ,
शिकायत करूँ, तो कहाँ,
हर तरफ से ,
ठुकराया हुआ हूँ।
तमन्नाएँ इतनी पाल ली,
की उनके बोझ से दबा हूँ। 
ख़्वाब इतने देखे,
की उनके टूटने से, जख्मी हूँ। 
चाँद ऐसा मिला, सफर में,
की उसके छुपने से,
अंधेरों में बैठा हूँ। 
जमाने से इतनी दुश्मनी,
की हर राह में अकेला हूँ। 
जवानी की मस्ती में इतना दौड़ा,
की पावों में अब दम नहीं।
इतना उड़ा आसमा की चाहत में,
की साँसों में दम नहीं।
कमबख्त ये दिल मेरा,
उनकी मोहब्बत में इतना डूब गया,
की अब,
किनारों तक पहुचने का दम नहीं।
की अब जीने का मन नहीं,
की अब जीने का मन नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर 

जिंदगी


दौलत की जितनी है,
मुझे चाहत,
उतनी दौलत कहाँ,
मिलती है.
माँगा है जिसे,
मोहब्बत में,
वो अब कहाँ,
दिखती है.
अरे प्यारों,
ये ही तो है जिंदगी,
ये कब हमारी मुठ्ठी में,
बंद रहती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर 

परिन्दें


परिन्दें आसमा के,
धरती पे सिर्फ दाना,
चुगते हैं.
और हम धरतीवालों,
की किस्मत को देखो,
हम आसमा को छू कर भी,
प्यासे रहते हैं.
माँ को कुचल कर,
हम उस न दिखने वाले,
खुदा की दर पे,
सर झुकाते हैं.
जो बिना माँ के,
एक चीटीं भी नहीं गढ़,
पाते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

ख़ास जिंदगी


थोड़ी – थोड़ी आग है, थोड़ी सी बरसात है,
ये जिंदगी मुझे खुदा, अब भी लगती बड़ी ख़ास है.
ठोकरें भी मेरे हौसले तो नहीं तोड़ पाती हैं,
काँटों के बीच में ही तो कलियाँ मुस्काती हैं.
थोड़ी – थोड़ी आस है, थोड़ी सी प्यास है,
ये जिंदगी मुझे खुदा, अब भी लगती बड़ी ख़ास है.
टूटते ख़्वाब भी नहीं मुझे रोक पाते हैं,
काँटों के बीच में ही तो फूल मुस्काते हैं.

जलता दीपक


मेरी सारी दौलत ले कर,
वो सोहरत मुझे लौटा दो,
जब तुम कहती थी,
मेरे कानों में,
की ये जलता दिया बुझा दो,
वो जलता दीपक बुझा दो.
मेरी सारी खुशियां ले कर,
वो ग़मों की राते लौटा दो,
जब तुम कहती थी,
मुझसे,
की वो खुली किवाड़ भिड़ा दो,
वो खुली किवाड़ भिड़ा दो.

परमीत सिंह धुरंधर 

मैं नहीं हूँ


मंजिलों को पाने के लिए,
समझौतों पे समझौते हुए.
एक बार मंजिल मिल जाए,
तो फिर,
कौन अपने, कौन पराये।
ये वसूल रखने वालों की,
भीड़ में मैं नहीं हूँ.
एक ही समय में खाता हूँ,
सेवइयां और मछलियाँ, दोनों
ईद और दिवाली के,
इंतज़ार में बैठा कोई,
मजहबी मैं नहीं हूँ.
और उठता हूँ आज भी,
माँ की लोरी सुन कर,
रेडिओ मिर्ची और एफ. एम.,
से जागने वालो की,
जामत में मैं नहीं हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

पापी मन


पापी मन,
नारी के तन,
में कितना,
उलझा है.
भूल के,
अपने माता-पिता,
जुल्फों में,
लेटा है.

परमीत सिंह धुरंधर 

जिंदगी


जिंदगी एक दुकान है, जहाँ कुछ भी मेरा नहीं.

प्रकृति


सूर्य कहते हैं,
प्रखर बनो.
हवा कहती है,
बहते रहो.
नदिया कहती है,
जोश से जियो.
और किनारें कहते हैं,
प्रेम में टूट चलो.
वृक्ष कहते हैं,
सदा ऊपर उठो.
कलियाँ कहती है,
खिलते रहो.
फूल कहते हैं,
समाज को,
सुगन्धित करो.
और भौरें कहते हैं,
विचरते रहो.
लहरें कहती हैं,
उछल कर वार करो.
चाँद कहता है,
शीतल बनो.
अग्नि कहती है,
खुद पहले जलो.
और बादल कहते हैं,
बरसने में ना,
भेद करो.
रात कहती है,
दीपक बनो.
दिया कहता है,
पथ प्रदर्शित करो.
पत्थर कहते हैं,
स्थिर रहो.
और राहें कहती है,
मंजिल की तरफ,
बढ़ते रहो.
उषा कहती है,
श्रम करो.
साँझ कहती है,
मनन करो.
फल कहते हैं,
मिठाश बांटों.
और काटें कहते हैं,
स्वीकार करो.
दर्पण कहता है,
सत्य समझों।
जीवन कहता है,
समय का मान करो.
समय कहता है,
त्याग करो.
और मोह कहता है,
बलिदान करो.

परमीत सिंह धुरंधर

दुल्हन


जो दर्पण को देख कर शर्मा जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो झुकी पलकों से भी दिल को छू जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जब लौटूं मैं हल लिए काँधे पे,
दिनभर का थका हारा,
तो वो मंद – मंद मुस्करा कर,
अभिनन्दन करे दरवाजे पे,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो काजल भी लगाये आँखों में,
मेरी आँखों में आँखे डाल कर.
जो चूड़ी भी पहने तो,
मेरी बाहों में बाहें डाल के,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो मेरे ठन्डे चावल के थाली पे भी,
हौले-हौले पंखा बैठ के डुलाये,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।

परमीत सिंह धुरंधर