कर्ण


हर पल में बेचैनी है जिसके,
हर नींद में एक ही चाह,
एक बार सामना तो हो जिंदगी,
मैं रोक दूंगा अर्जुन की हर राह.
ना माँ की दुआएं हैं, न प्रियेसी की प्रीत,
न किसी से आशा है, न किसी का आशीष,
बस एक बार सामना तो हो जिंदगी,
मैं रोक दूंगा अर्जुन की हर जीत.

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

सैनिक का प्रेम


हिमालय की गोद में बैठा,
मैं पल-पल,
तुम्हे याद करता हूँ,
तुम्हे पाने की इतनी तमन्ना,
की सर्द हवाओं को,
अब अपना कहता हूँ.
तेरी जुल्फों की जंजीरे,
इतनी प्यारी हैं,
की मैं दुश्मन की गोलियों को,
सीने पे धारण करता हूँ।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

सौ बार लड़ूंगा हल्दीघाटी में


राते जितनी काली हो,
नशा उतना ही आता है मुझे,
दर्द जितना गहरा हो,
जीने में उतना ही मज़ा है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
दिल्ली की रौनक मुबारक हो तुम्हे,
मेवाड़ की शान भाती है मुझे।
मैं राजपूत हूँ, कोई मुग़ल नहीं,
योवन की हर धारा तेरे लिए है,
माँ की गोद लुभाती है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

प्रण


जहाँ विश्व थम जाएँ,
मैं वहां तक प्रयाश करूँ,
थक कर गिर भी जाऊं,
तो उठ कर साहस,
फिर एक बार करूँ,
हे प्रभु हरि विष्णु।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

प्रण


अहंकार से रिक्त रहूँ,
पाखण्ड से मुक्त रहूँ,
प्रेम से सदा संचित रहूँ मैं,
पाप से सदा बंचित रहूँ मैं,
हे प्रभु विष्णु।
वेदो को गीतों में ढाल के,
जन – जन को पहना दूँ,
धर्म को माँ, और माँ को धर्म मान के,
सम्पूर्ण भारत को नहला दूँ.
अभिलाषों से रिक्त रहूँ,
लालशा से मुक्त रहूँ,
ज्ञान से सदा संचित रहूँ मैं,
अज्ञान से सदा बंचित रहूँ मैं,
हे प्रभु हरी बिष्णु।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

फक्कड़


मैं पीता नहीं हूँ, पर पियक्कड़ हूँ मैं.
मैं बुद्धू ही सही, पर बुझक्कड़ हूँ मैं.
कहीं आता-जाता नहीं, पर घुमक्कड़ हूँ मैं.
मुझे क्या समझोगे, समझने वालों,
मैं फ़कीर नहीं हूँ, पर फक्कड़ हूँ मैं.
मुझे कुछ याद नहीं, कब क्या घटित हुआ,
पर आज भी उनके होठों का चक्कर हूँ मैं.

परमीत सिंह परवाज

जवानी


दिल चाँद बनके आज भी घटता – बढ़ता रहता है,
ये जवानी है मेरे यार, दिल मचलता रहता है.
इतने कांटो से जख्मो को पाकर भी,
ये बागों में जाकर फूलों को चूमता रहता है.
ये जवानी है मेरे यार, दिल मचलता रहता है.

परमीत सिंह परवाज

अतीत का चुम्बन


मैं भुला नहीं हूँ, आज तक तुझे,
पर भूलने लगा हूँ, मैं जमाना।
मैं नशा नहीं करता हूँ, पर अब,
ढूढ़ने लगा हूँ बहना।
तेरी गलियों से मेरा, कोई अब रिश्ता नहीं,
फूलों की बागों में भी, अब मैं नहीं जाता।
मेरा किसी से नहीं है, अब प्रेम कोई मगर,
हर कोई चाहता है, न जाने क्यों मुझसे याराना।
इन होठों को याद नहीं अब वो चुम्बन,
ना इन पलकों को याद है अब वो रात.
ठोकरों में हूँ मैं आज भी सही,
मगर सिख गया हूँ मुस्कराना।
खुदा की दुनिया से मेरा मोह,
है तेरे हुश्न से जयादा,
खुदा पे ही छोड़ दिया है अब मैंने,
मेरा आने वाला हर फ़साना।

 

परमीत सिंह परवाज

जामे-मोहब्बत


हुस्न ने आज हमें आँखों से नहीं, ओठों से नहीं, शब्दों से पिलाया है,
जब उसने धुरंधर सिंह को “मनीष मल्होत्रा” कह कर बुलाया है.
मिलता नहीं है कोई इस बाजरे-किस्मत में मंजिल तक साथ देने को,
मगर राहे-सफर में किसी ने आज हमें क्या जामे-मोहब्बत पिलाया है.

दीवानगी


किसी और की नाराज़गी से,
इंसान बंदगी तो नहीं छोड़ सकता।
मोहब्बत पे मर मिटने वाला,
आशिकी तो नहीं छोड़ सकता।
वो और हैं जिससे मोहब्बत पसंद ना होगी,
उनसे सहम कर धुरंधर सिंह,
अपनी दीवानगी तो नहीं छोड़ सकता।