मै ऐसा नहीं


मै ऐसा नहीं जो आसमा के चाँद को पसंद आऊं,
मै ऐसा नहीं जो सितारों की महफ़िल में नज़र आऊं,
मै छोटा सा एक दरिया हूँ,
जिसकी लहरों में कोई धार नहीं,
मै ऐसा नहीं की किनारों को तौल दूँ.
मै जैसा भी हूँ, जहाँ भी हूँ,
सींच दूंगा इस मिटटी को,
सुख जाने से पहले दे जाऊंगा वो हरियाली परमित ,
जो नसीब नहीं सागर के बांहों में किसी को दोस्तों.

अकेला हूँ


इंसानो की बस्ती का हर रंग फीका है,
हर शख्स को सूरज से ही शिकवा है.
सब कह रहे है चाँद में दाग ही नहीं,
सूरज ने अपनी किरणों से इसे झुलसाया है.
हर मोड़ पे गूंजती है सैकड़ो आवाजें,
हर शख्स ढूंढता है चोर कहाँ है.
सब कह रहे है की सूरज ने धोखा किया है,
इस उजाले में सबका रंग दीखता है.
हर शख्स के दामन में रंग काला है.,
कितना ढूंढा दिया लेकर, हर गली, हर कूचे में.
मैं अकेला हूँ तन्हा आज भी,
मेरे रंग का कोई मीत नहीं मिला है.
खूबसूरत हैं वो लोग जो भीड़ में छुपे हैं,
धुरंधर सिंह की किस्मत में बस ये ख़्वाब लिखा है.

गुरु – गजानन


अगर गुरु जी आप ना होते,
तो, पूरब से पश्चिम,
उत्तर से दक्क्षिण तक,
हम भटकते।
दुनिया की ठोकरों,
से झुलसते, और
कुण्ठाग्रसित हो कर,
हम धधकते।
आशा के विपरीत है,
धुरंधर सिंह का जीवन,
मगर हर सफलता के,
आप ही हो गजानन।

तड़का


अभी रात मेरी बाहों में थी,
की सुबहा आके छनकने लगी.
मीठे-मीठे ख़्वाबों में धुरंधर के,
हकीकत का तड़का लगाने लगी.

गर्व


सागर की लहरे उछलती रहीं,
नौका मेरी डुबाती रहीं।
किनारों को मेरे डूबा के,
मुझे भटकाती रहीं।
ये सच है की,
मैं कुछ पा न सका जीवन में।
पर धुरंधर को राजपूत होने,
का गर्व कराती रहीं।

प्यार


मैं दिल को ये कहने लगा हूँ की,
प्यार झूठा होता है, और
धुरंधर ये जूठ बोलने लगा है.

घास की रोटी


पकाया है तुमने तो,
घास की ये रोटी नही.
अपने हाथो से खिला दो,
फिर ऐसा जीवन नहीं.
कष्ट क्या है धुरंधर राणा को,
जब तक तुम्हारे नयनो में हूँ.
बाहों में सुलो लो अपने,
फिर ऐसी कोई महल नहीं.

राणा


राणा ने संग्राम किया,
न कभी आराम किया।
एक चेतक के साथ पे,
मेवाड़ को आजाद किया.
हल्दीघाटी की वो ऐसी लड़ाई,
हाथी पे बैठे,
अकबर तक भाला थी पहुंचाई।
राणा ने संग्राम किया,
न कभी आराम किया।
राजपुताना के शान पे,
धुरंधर जीवन को,
कुर्बान किया।

अभी तो मैं जवान हूँ


तुमने तो सारी उम्र गुजार दी,
और अब शादी की बात करते हो.
अभी तो मैं जवान हूँ,
और तुम मुझसे ऐसी बात करते हो.
अभी तो मैं खेलूंगी, खिलाऊँगी,
अपनी अदाओं पे सबको नचाउंगी,
अभी तो मैं प्रियंका-कटरीना हूँ,
और तुम मुझसे,
बिपाशा-करीना की बात करते हो.
बेशर्म हो तुम, बेहया हो तुम,
मैं तुम्हे अब क्या कहूँ?
बेगैरत हो तुम.
अभी तो मैं छलकती,
आलिया हूँ.
और तुम मुझमे,
प्रीटी और रानी ढूंढते हो.
तुमने तो सारी उम्र गुजार दी,
और अब तुम धुरंधर,
मुझसे शादी की बात करते हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कंगन मैंने खरीदे हैं


इम्तहान मेरे जीवन की,
कब होगी मेरे ईस्वर,
मैने उनको चुन लिया है,
वो कब चुंनेंगी ईस्वर।
हाथों में चूड़ी है,
आँखों में काजल,
कानो में कुण्डल है,
पावों में पायल,
की कंगन मैंने खरीदे हैं,
वो कब पहनेंगी मेरे ईस्वर।
इम्तहान मेरे जीवन की,
कब होगी मेरे ईस्वर,
मैने उनको चुन लिया है,
वो कब चुंनेंगी ईस्वर।
बादल बरसते कितने मिलें,
उपवन में कितने ही फूल खिलें,
जो मन को मेरे छू ले,
वो कहाँ है शूल,
ह्रदय-आघात तो बहुत मिलें,
वो कब हृदय को सिचेंगी मेरे ईस्वर।
इम्तहान मेरे जीवन की,
कब होगी मेरे ईस्वर,
मैने उनको चुन लिया है,
वो कब चुंनेंगी ईस्वर।
राते जब आ-आके,
करती हैं मुझसे बाते,
तो सीने में उठती हैं,
लाखो जज्बातें,
की बासुरी तो बजा दी है प्रेम की,
धुरंधर ने,
वो मीरा बनके कब नाचेंगी मेरे ईस्वर।
इम्तहान मेरे जीवन की,
कब होगी मेरे ईस्वर,
मैने उनको चुन लिया है,
वो कब चुंनेंगी ईस्वर।