शेर की दुनिया इतनी छोटी क्यों है?
क्यों जंगल में शेर अकेला बैठा है?
हाथियों का झुण्ड, हिरणों का समूह,
फिर शेर क्यों गुमसुम अकेला है?
बल से नहीं प्रेम से जीतो,
बल से तो सिर्फ पत्थर टूटता है.
माँ के आँचल में सो के देखो,
यहीं पे सबकी किस्मत बदलता है.
खुदा की चाहत में भटकने वालों,
यहीं पे, परमीत, हर खुदा बसता है.
Category: Life
These are just related to life as philosophy.
भीष्म-अभिमन्यु
मूंद रही आँखे,
देख रही थी,
पिता को आते.
की पिता आके,
बचा लेंगें.
अंतिम क्षणों तक,
इस उम्मीद में,
लड़ा अभिमन्यु,
पिता-पुत्र का रिश्ता,
कुछ ऐसा ही है,
एक तरफ भीष्म गिरें हैं,
तो एक तरफ जूझ,
रहा है, परमीत, अभिमन्यु.
राजपूतों की परंपरा
हम राजपूतों की ये परंपरा है,
जीवन से जयादा जमीन की चाहत है.
बंजर हो या उर्वर हो,
तन-मन को उसकी गोद में ही राहत है.
हम राजपूतों की ये परंपरा है,
दोस्तों से जयादा दुश्मनों में शोहरत है,
मारते हैं-मरते हैं,
जंग में मिले जख्मों से ही मोहब्बत है.
हम राजपूतों की ये परंपरा है,
जो समर्पित कर दे वो ही महबूबा है,
सजाते हैं-सवारतें हैं, परमीत
उसकी बाहों में ही फिर जन्नत है.
प्रयास
उल-जुलूल,
हरकते,
अब बंद कर
ए दिल,
कब चाँद धरती पे,
आने वाला हैं.
प्रयास ही करना है,
तो, नहर बनाने में कर,
कब तेरी फसलों को,
सागर आके सींचने वाला है.
कलियाँ जो खिल नहीं सकती
बागों में तेरे,
उनके लिए, अपनी जमीं को,
न छोड़, परमीत
की कब कलियों से,
बचपन पलने वाला हैं.
जीवन
निराश मन,
बेताब मन,
बेचैन मन,
वक्त के दोराहे,
पे खड़ा,
किस तरफ जाए,
दोनों तरफ हार है.
हार कर स्वीकार करूँ,
अपनी पराजय,
या सफलता के चुम्बन,
के सपने सजोंते-सजोंते,
मिटा दूँ, परमीत
ये जीवन।
हिंदुस्तान- पाकिस्तान
तलाश,
आज खत्म हुई,
ए दिल,
जब देखा,
उनका चेहरा।
मगर एहसास,
हुआ,
मज़बूरी का,
सिसकते जज्बातों का,
की कह भी,
नहीं सकते उनको,
हम अपना।
सुकून-दर्द का,
एक रिश्ता है,
जो साथ-साथ,
बहता रहता है,
एक हाथ के,
फासले पे भी,
हिंदुस्तान- पाकिस्तान में,
मीलों का,
फासला हैं, परमीत।
लक्ष्य
मैं इसलिए धरती पे नहीं आया हूँ,
की हुस्न तेरा श्रृंगार करता रहूँ,
तेरी आँखों में झांक के,
तेरी जुल्फों में सो के
अपनी जिंदगी काटता रहूँ।
मैं इसलिए धरती पे नहीं आया हूँ,
की हर दर पे सर झुकता रहूँ,
कभी लाचार बन के उनकी चौखट पे,
कभी बीमार बन के उनकी चाहत में,
उनका इंतज़ार करता रहूँ।
मैं इसलिए धरती पे नहीं आया हूँ,
की स्वर्णो की चाहत में संग्राम करूँ।
मैं इसलिए धरती पे भी नहीं आया हूँ,
की सफलता के झंडे लागउँ।
मैं आया हूँ, तो
इस धरती को हरा कर जाऊँगा,
हर तरफ शीशम के पेड़ लगा जाऊँगा।
गायों को बहुत दूर तक चरना न परे,
इस माटी के कण-कण में परमीत,
हरी- हरी घाँसे खिला जाऊँगा।
This is the poem related to the confusion the writer has in his life. He is not able to understand the purpose of his life in this world. Then he realized that he is not here to do science, film and marriage. He is not on this earth to collect gold, land and property, he is not here to do fight, to rule or to guide people. He is here to serve his mom, his country and the Nature. He wants to plant as many trees as possible. He wants to cover all the lands with trees, grass and flowers so that a cow does not need to go very far for grazing. A child does not need to go very far to get the fruits.
चुनौती
मैं तोड़ दूंगा,
पहाड़ों को,
अगर वो,
कुचल न सके,
मेरी साँसों को.
मैं उलट दूंगा,
इस जमाने को,
अगर ये रोक न सका,
मेरे कदमों को.
मैं इसलिए नहीं आया,
धरती पे,
की छू सकूँ,
उचाईयों को.
मगर मैं जला दूंगा,
इस आसमान को,
अगर ये न बरसने दे,
बादल को, परमीत
जीत-हार
न जीत न हार, सत्य है प्यार
क्या जीते थे राम, रावण का अंत कर
क्या जीते थे राम, सीता का त्याग कर
क्या जीते थे पांडव, दुर्योधन का अंत कर
क्या जीते थे पांडव, भीष्म का अंत कर
जीत कर भी, होती है अक्सर हार,
कर दे इस, माया का त्याग
रस है इस, जीवन का त्याग
सत्य है प्यार, न जीत न हार
by a friend
परमीत का चैन और परमीत का दिल
इधर गया, उधर गया
यहाँ रहा, वहां रहा
इस दिल को,
चैन कभी मिला नहीं।
कोई तसल्ली,
इस दिल को दे,
ऐसा भी,
कोई मिला नहीं।
हार से,
यह टूटा नहीं
न जीत से,
अहंकारी हुआ
कुछ देर, थमा जरूर
पर धड़कना,
इसने छोड़ा नहीं।
आज भी, धड़कता है,
कल भी, धड़केगा,
उन सुनहरे दिनों की तलाश में,
जहाँ इस की दिलरुबा होगी,
इस का चैन होगा,
प्रेम की बौछार होगी,
चैन इस की साँस होगी।