कलम और तन्हाई


इस कदर लूट के मेरी तन्हाई मुझे
तुम हंसती हो मुझपे मेरे ही द्वार पे,
सुख गयी मेरी कलम जिस,
तेरी योवन को सजाते-सजाते,
और तू आज भी आती है,
मेरे पास है तो बिना श्रृंगार के.
सोचा था जिन ख़्वाबों को हकीकत,
बना के सजाऊंगा उनकी जुल्फों में,
वो ही हंसती हैं मेरी काली रातो पे,
निराश हो गयी मेरी कलम,
जिस आशा को लिखते-लिखते,
और तू आज भी आती है,
मेरे पास है तो वो ही सब्जबाग ले के, परमीत

जीवन है तो लड़ जायेंगे


कुछ कर जायेंगें,
कुछ कर जायेंगे,
जीवन है तो लड़ जायेंगे।
न जीत कि लालसा,
न हार कि परवाह,
जब ठोक दिया है ताल,
तो आखाड़े में भी उतर जायेंगे।
रौशनी किसने मांगी है खुदा यहाँ,
जब मोहब्बत कि है तुझसे हसीं,
तो अब अँधेरी रातों को,
तेरी बाहों में गुजार लेंगे, परमीत।
कुछ कर जायेंगें,
कुछ कर जायेंगे,
जीवन है तो लड़ जायेंगे।

शंखनाद


जिस दिन समर में मैं कूदा दोस्तों,
सूरज प्रखर हुआ और,
बादल छट गये दोस्तों।
दुश्मनों कि निगाहें, है मुझ पे गड़ीं,
और मेरी नज़रों ने भी निशाना है साधा दोस्तों।
रक्त कि बूंदें थिरकने लगी हैं तन पे,
और जख्मों ने किया मेरा चुम्बन दोस्तों।
मेरा अंत ही है उनका इति श्री,
और उनका अंत ही मेरा जीवन दोस्तों।
खेलें हैं वो भी आँचल में कितने,
खेला हूँ मैं भी अपनी माँ के गोद में,
शीश कटेगा अब मेरा या,
फिर होगा परमीत मेरा शंखनाद दोस्तों।

श्रींगार और परुषार्थ


घटनावों का घटित होना,
कल्पनावों का सृजित होना,
एक स्त्री का छल है,
दूजा परुषार्थ है.
सृजन है, श्रींगार है,
दोनों में निर्माण है,
मगर एक भाग्य के अधीन,
दूजा कर्म का आकार है,परमित.

जवानी


हम अगर कर्ज न उतारे,
तो फिर हमारी शोहरत ही क्या.
हम अगर दीप न जलाएँ,
तो फिर हमारी नियत ही क्या.
उठती लहरें गिरती हैं,
किसी न किसी किनारें से,
हम अगर लहरों को न रोकें.
तो फिर हमारी सरहद ही क्या.
खिलता हुआ यौवन लेकर,
वो तोडती हैं बस शीशा.
हम अगर बंजर को हरियाली न दें,
तो फिर हमारी जवानी ही क्या, परमित.

जिन्दगी


धुवाँ-धुवाँ सी हैं जिन्दगी,
कभी जमीं तो कभी,
आसमां पे है जिन्दगी.
सजाती तो है रोज वो खुद को,
आइना देख के,
कभी हसरते-जवानी,
तो कभी बाजारू-दारु है जिन्दगी, परमित.

उठो और लड़ो


उठो और लड़ो,
इसलिए नहीं की ,
तुम किस्मत के धनी हो.
उठो और लड़ो ,
इसलिए की तुम,
सत्य के साथी हो.
उठो और लड़ो,
इसलिए नहीं की,
तुम सत्ता के पुजारी हो.
उठो और लड़ो,  परमित
इसलिए की तुम,
सत्य के सिपाही हो……

गोरी और काली रानी


एक राजा की दो रानी,
एक गोरी ,
एक काली-कानी.
एक दिन शिकार में,
राजा हार गये,
शेर के प्रहार से.
कैसे तो जान बची,
पर बिछुड़ गये राजा,
आपने रानी के श्रींगार से.
घोड़े दोड़े ,
मंत्री भागे,
पूरब से पंछिम तक,
कोना-कोना छान मारा,
उत्तर से दक्खिन तक.
राज-पाट सँभालने को,
मंत्री बन गये राजा,
और, रानियाँ भूल गयी,
राजा को मंत्री के प्यार से.
भूलते-भटकते, एक दिन राजा
जा पहुंचे अपने दरबार में,
दुर्बल-मलिन तन को,
पहचान न सकी गोरी रानी,
कानी रानी ने स्वागत किया, परमित
राजा का प्रेम के मल्हार से.

खौंफनाक


मुझे खौंफनाक समझने वालों,
मुझसे खौंफजदा न हों.
मैं खुद खौंफजदा हूँ परमित,
की कोई मुझसे खौंफनाक न हों…..Crassa

मैं बुलंद हूँ, बुलंदियों का नाम हूँ…..


बहुत दूर-दूर से उठती हैं लहरें ,
मेरे किनारों को तोड़ देने को,
मगर हम किनारें वहीँ हैं वहीँ,
कि लहरें मिट जाती है जहां आके,
कि बहुत जोर -जोर से उमरते है बादल,
मेरी सरहदों को डूबा देने को,
मगर ये सरहदे वहीँ हैं वहीँ,
मिट जातें है बादल जहां बरस के, परमित…Crassa