बाजार में बिकता नहीं……


बाजार में बेचने जाता हूँ,
बिकता नहीं,
आग में जलाता हूँ,
जलता नहीं,
अँधेरे में कही छोड़ आता हूँ,
पर साथ छूटता नहीं,
मंदिर, मस्जिद, कोई भी दर,
पे सजदा , भी अब किसी काम,
आता नहीं,
इंसान हूँ, पर
इंसानों की हर बस्ती,
में जाकर देखा,
किसी के पास ये अमूल्य ,
रत्न नहीं,
पर कोई भी इसे , मुझसे
छीनता नहीं,
चुराता नहीं……..Crassa

एक दोस्त के नाम….


किसी ने मेरी पंक्तियों को आज सराहा,
तो ये लगा , जिन्दगी सही राहों पे तो है.
कांटे ही सही, चुभते हुए मेरे पांवों में,
ये मेरे खून के बहते कतरे, किसी की निगाहों में तो हैं, परमित…..Crassa

फिर एक प्रयाश हो…


ये दिल न निराश हो,
ये दिल न उदास हो
,है रब कही पे हाँ अगर,
तो ऐ दिल उठ,
फिर एक प्रयास हो.
ऎसी कोई धरती नहीं,
जिसपे कोई फूल न खिले,
ऐसा कोईआसमाँ नहीं ,
जिसके तारे न टूटें,
है रब कहीं पे हाँ अगर,
तो उठ ऐ दिल,
फिर ये पाँव परमीत,
मंजिल पे बढ़ें……Crassa

अपने प्रिये मित्र प्रवीण को शादी की शुभकामानावों के साथ:


जीवन  के  इस  नए ,

खुबसूरत मोड़  पे ,

उम्मिद्दों  के  इस

नए  बरसात  में ,

इस  नयी  सुबह  की,

नयी  रौशनी  में ,

जब  आपके  कदम

आगे  बढे  , तो

कोई  आपके साथ होगा,

पीछे मुड़ने की,

जरुरत नहीं,

बस एक एहसास होगा,

कठिनाइयों को देख कर अब,

दोस्तों की याद नहीं,

बस  Crasaa उनका ख्ययाल होगा….

हसरते जिन्दगी


कभी जाम बन कर ओठों का, कभी ख्वाब बनकर आँखों का,

हसरते जिन्दगी ने हर पल में छला है,
जब घूँघट उठाया उनका अपनी चार दिवारी  में, परमित
रंगे-हुस्न ने हकीकत दिखलाया है,

नयी दुनिया..


ना मंदिरों में घंटी बजाऊंगा, ना मस्जिदों में सर ही झुकाउंगा,

तेरे दुआ से खड़ा हूँ माँ, तेरे चरणों में ही दुनिया बसाऊंगा.
नन्हे कदमो से जब चला था, तेरी ऊँगली पकरकर पिता,
तुमने गोद में उठ के आसमा दिखाया था,
गीता कभी ना मै पढूंगा, ना आयत ही कुरान के दोहराऊंगा,
प्यार पाया है, प्यार की दुनिया बनाऊंगा,
जो करते है भेदभाव इस धरती पे,
वो क्या समझेंगे इस मिटटी के रंग को,
स्वर्ग छोड़ के उतरती है गंगा,
इसी मिटटी में मिल जाने को,
ना सितारों की चमक में खोऊंगा, ना महफ़िल में बुझ पाऊंगा,
इस मिटटी का लाल हूँ, इसी में मिल जाऊँगा.
जो दावा करते है मुझे समझने का,
उन्हें नहीं पता की मै ,
उनकी समझ से परे एक अनंत हूँ,
कभी परमित, कभी सोनामित,
कही सिंह तो कभी Crassa कहलाऊंगा….