संघर्ष ही मेरा उद्देश्य है


मुझे हार बर्दास्त नहीं,
और जीत की कोई चाह नहीं।
संघर्ष ही मेरा उद्देश्य है,
जब तक मंजिल,
आ जाती मेरे पास नहीं।
तारो-चाँद से, ये माना,
की किस्मत का है लेना – देना।
मगर मेरे हौसलों पे,
इनकी गति का कोई असर नहीं।
हर चट्टान मैं तोड़ दूंगा,
अगर वो मेरे राहों में आये.
उबड़-खाबड़ राहों के बिना,
मिलती धरा को कभी प्रवाह नहीं।
संघर्ष ही मेरा उद्देश्य है,
जब तक मंजिल,
आ जाती मेरे पास नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

गुनाहों की चादर


दुनिया की भीड़ में,
मैं खो गया.
ऐसा आप सोचते हो,
ये हकीकत नहीं हैं दोस्तों।
हकीकत तो ये है की,
गुनाहों की चादर,
इतनी लंबी है उनकी,
की मैं आसानी से छुप गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी सबकी अधूरी ही है


समुन्द्र की लहरों,
पे बैठा हर इंसान,
बस किनारों को देखता है.
और किनारों पे बैठा इंसान,
लहरों को देखता है.
जिंदगी सबकी अधूरी ही है.
कोई अँधेरे में,
तन्हाई में रोता हैं,
तो कोई भीड़ में, महफ़िल में,
अंदर-ही-अंदर,
सुलगता है, सुबकता है.
जिंदगी सबकी अधूरी ही है.
कोई हुस्न की यादों में,
कोई हुस्न की बाहों में,
आकर, समाकर,
ओठों को चूमकर भी,
किसी – न – किसी प्यास में,
निरंतर, अविराम, ही जलता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हम तो उग्र्र हैं अपनी जवानी में


हम भी कम नहीं हैं उस्तादी में,
बस अंतर इतना है,
की वो मौन हो के खेलते हैं बाजियाँ,
और हम थोड़े वाचाल हैं अपनी जवानी में.
उनकी तमन्ना की रौंद दें हर किसी को,
और मैं तो रौंद ही देता हूँ,
जो टकराता हैं मुझसे मेरी राह में.
हम भी कम नहीं हैं छेड़खानी में,
बस अंतर इतना है,
की वो इंतज़ार में बैठे रहते हैं,
की कब एकांत हो.
और हम तो उग्र्र ही हैं अपनी जवानी में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इंसान बनने का मजा ही कुछ और है


शौक मुझे भी है की खुदा बनू,
मगर इंसान बनने का मजा ही कुछ और है.
ताकत के बल पे,
तो शैतान भी दुनिया को अपना बना ले.
मगर संघर्ष और बुलंद इरादों का नशा,
ही कुछ और है.
मैं मौन हूँ,
ये मेरी कमजोरी नहीं।
सपनों को सीने में दबाने का,
मजा ही कुछ और है.
ये निश्चित है की एक दिन,
तुम्हे कसूँगा अपनी इन बाहों में.
मगर जवानी में तनहा विरह की आग में,
जलने का नशा ही कुछ और है।

 

परमीत सिंह धुरंधर

छोटा शहर है, न छोड़ा कीजिये


रिश्तों को ऐसे न तोडा कीजिये,
छोटा शहर है, न छोड़ा कीजिये।
बड़े शहर में बिखर जाओगे,
भीड़ है इतनी की पिछड़ जाओगे।
फिर याद आएगी मेरी चुनरियाँ।
रिश्तों को ऐसे न तोडा कीजिये,
छोटा शहर है, न छोड़ा कीजिये।
अभी पैसों की चाहत है, समझ नहीं पाओगे,
काँटों में फंस के, उलझ जाओगे।
फिर याद आएगी मेरी नगरिया।
रिश्तों को ऐसे न तोडा कीजिये,
छोटा शहर है, न छोड़ा कीजिये।
यहाँ माँ है, ममता है, हैं बगीचे हरे- भरे,
जब ठोकरों में होगी तुम्हारी जिंदगी,
याद आएगी तब मेरी नजरिया।
रिश्तों को ऐसे न तोडा कीजिये,
छोटा शहर है, न छोड़ा कीजिये।

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक फतह तो लिख


हार कर,
कहाँ छुप जाऊं,
ये तो बता दे खुदा।
रुसवाई है, तन्हाई है,
उसपर हैं,
ये शिकस्त की बेड़ियाँ।
मुझे उनके सर पे,
ताज का गम नहीं।
पर इस जंग में,
एक फतह तो लिख,
मेरे नाम पे खुदा।
बेवफाई है, महंगाई है,
उसपर हर तरफ,
खनकती हैं चूड़ियां।
मुझे उनकी डोली उठने,
का गम नहीं।
पर इस प्रेम में,
एक रात तो लिख,
मेरे नाम में खुदा।
आवारा हूँ, बंजारा हूँ,
उसपर मंजिलों से मिटती नहीं दूरियाँ।
मुझे अपनी, मात – पे – मात,
का गम नहीं।
पर इस खेल में,
कभी तो मेरी भी शह,
लिख दे खुदा।
परमीत सिंह धुरंधर

छपरा से कटिहार तक


माँ ने कहा था बचपन में,
तुम लाल मेरे हो लाखों में.
तुम्हे पा कर मैं हर्षित हुई थी,
नाचे थे पिता तुम्हारे, जब आँगन में.
गोलिया चली थीं, तलवारे उठीं थी,
छपरा से कटिहार तक.
बाँट रहे थे सप्ताह – भर, रसोगुल्ला,
बड़े -पिता तुम्हारे, कोलकत्ता में।
दादी ने चुम्मा था माथा तुम्हारा,
गिड़ – गिड़ के पीपल पे.
दादा ने फुला के सीना,
खोल दिया था खलिहान, जन – जन में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


इश्क़ करना जरुरी है जिन्दा रहने के लिए,
जिन्दा रहना जरूरी है हुस्ने -बेवफाई समझने के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जंग


जंग कभी सितारों में नहीं होती,
जब की चाँद केवल एक है.
क्यों की उनको पता है,
चाँद सिर्फ बेवफा होता है.
जंग पतंगों में भी नहीं होती,
जब की शमा भी केवल एक है.
क्यों की उनको भी पता है,
इश्क़ में मरना सिर्फ पतंगों को है.
जंग तो भौरों में भी नहीं होती,
कलियों के रास को लेकर।
क्यों की भौरें जानते हैं,
साँझ होते ही कालिया,
वफ़ा – महब्बत सब भूल जाती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर