समंदर


मिला जो समंदर, वो बेचैन बहुत था
मैं अविवाहित और वो तन्हा बहुत था.
हजारों दरियाएँ बाहों में सिमटी
मगर रूह में उसके प्यास बहुत था.
मिला जो समंदर, वो बेचैन बहुत था
मैं अविवाहित और उसमे दर्द बहुत था.

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दीप जला के


धुप में बैठा हूँ दीप जला के
यही मेरे इश्क़ की कहानी है.
हो गए उसके, अब तो चार-चार बच्चे
फिर भी मुझको वो लगती कुवारी है.

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The Nagercoil Express


The Nagercoil Express was running at full speed.
Our gang—including me—waited at Pune Junction,
holding onto a single belief.

As the train stopped, we ran along the platform,
my friends by my side,
trying to help me find her
without a photo, without a clue.
None of them had seen her before,
but together we searched,
while I alone knew her face.

Suddenly, I heard a scream—my name.
There she was, her face glowing,
her mother standing beside her, surprised.

She introduced me,
and I saw her mother ignite with emotion.
Her daughter shimmered with worth,
proving herself in her mother’s eyes,
while her mother silently weighed what to do next.

The train gained momentum.
She whispered for me to step down.
On the platform, I felt as though I could rule life with her as queen.
I felt like a maharana victorious at Haldighati,
winning unexpectedly,
for the real challenge had been finding her
without a date, a reservation, or even the train’s name.

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माया


सब है माया, माया का खेल ही तो रचने आए है.
दो नैना तेरे ए नारी, बस मर्द को छलने आए हैं.
जो हैं बाहों में उनका भी क़त्ल होगा कल,
बस हम बाहों में आने से पहले ही मारे गए हैं.
जिनको यकीन है की ये मेरी, बस मेरी ही बन गयी
इसी यकीन से कितने पहले यहाँ सुलाए गए हैं.

बादल बरसते नहीं है,
बिजलियाँ उन्हें बेचैन कर देतीं हैं
रोने के लिए.
आदमी घर बसता नहीं है
औरत मजबूर कर देती हैं
चारदीवारी में ताउम्र रहने के लिए.

धुप में जितने छावं भी नहीं
उतने उसके पाँव है हसीं।

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ये उम्मीदें तुमसे मिलन की


घड़ी -की-घड़ी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.
छोटी -से छोटी होती जा रहीं
ये आसमा और ये जमीन
पर, दूरी – की – दूरी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.

सोचा था की पटना से एक पल बांधूंगा
चलेंगे नंगे पाँव जिसपे हम और तुम.
ये लकीरे लिखी – की -लिखी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.
घड़ी -की-घड़ी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.

अब नहीं है इरादा
नहीं है जूठी ही आशा
टूटी-की-टूटी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.
घड़ी -की-घड़ी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की

मिलता भी कोई तो कैसे?
हमने दिल में बसाया है तुमको
उजड़ी-की-उजड़ी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.
घड़ी -की-घड़ी रह गयी
ये उम्मीदें तुमसे मिलन की.

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छल जाना प्रेम में


छल जाना प्रेम में हाँ, प्रभुता का प्रमाण है
येही तो वो पल है प्यारे, जब भक्त, भगवान् पे बलवान है.
जिस नारायण को छलिया कह असुर व्याकुल रहते थे
वो नारायण भक्तों पे अपने नंगे पावँ दौड़ते थे.
पी लेना विष झूठ का प्रेम में, प्रभुता का प्रमाण है
यही तो वो पल है प्यारे, जब महाकाल बन जाते भोलेनाथ हैं.

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पिता के पाँव को


हम उस धरती के वंशज है, जहाँ पिता पुत्र पे मरते हैं -२
हम उस धरती से आते हैं जहाँ पुत्र पिता के लिए लड़ते हैं.
हम उस धरती के वंशज है, जहाँ पिता पुत्र पे मरते हैं -२
हम उस धरती से आते हैं जहाँ पुत्र पिता के लिए लड़ते हैं.
तुम पूजा जितना पूजना है हाँ अपने प्यार को -२
हमने तो बस पूजा है धरती, और पिता के पाँव को.

जब-जब हम थे तुतलाये, चूमा हमारे गाल को
जब -जब लौटे थे जीत के, चूमा हमारे माथ को.
पर जिस दिन था दुनिया को रौंदा, बोले पिता
मेरे माँ को, हे देवी, प्रणाम तुम्हे, नारी तुम महान हो.
तुम पूजा जितना पूजना है हाँ अपने प्यार को -२
हमने तो बस पूजा है धरती, और पिता के पाँव को.

तुमने पिता बनाया मुझको ऐसे हाँ पुत्र का
जो धरा पे रम रहा लिए दम्भ मेरे नाम का
क्षण -क्षण में ह्रदय में मेरे जो आनंद का भण्डार भरें
और पल-पल में सीना मेरा करता है विशाल जो.
तुम पूजा जितना पूजना है हाँ अपने प्यार को -२
हमने तो बस पूजा है धरती, और पिता के पाँव को.

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वक्त बदला तो सब बदल गए


वक्त बदला
तो सब बदल गए।
शहर में दूकान
और दीवार बदल गए।
आसमा में चाँद और
धरती पे गांव बदल गए।
आँखों के ख्वाब
और चाह बदल गए।
उसकी चोली -२
और कमर के नाप बदल गए।
वक्त बदला
तो सब बदल गए।

रिश्ते और औक़ात
बदल गए।
हँसी के रंग,
मौज के साज बदल गए।
प्यार के खत,
और जवाब बदल गए।
लोग तो लोग,
उनके नक़ाब बदल गए।
घर की चौखट,
शर्म और लाज बदल गए।
उसकी घुँघरैलियाँ,
और नैनों का जोश बदल गए।
वक़्त बदला,
तो सब बदल गए।

गीत की धुनें,
और साज बदल गए।
गली-नाले, रास्ते
और चौराहे बदल गए।
फूलों की खुशबू,
और मौसम बदल गए।
खेत की मिट्टी,
और कुएँ का पानी बदल गए।
उसकी होंठों की मुस्कान,
और गालों का रंग बदल गए।
वक़्त बदला,
तो सब बदल गए।

चाय की प्याली,
और चौखट बदल गए।
रात के दीपक,
और जाम बदल गए।
सावन की रिमझिम,
और तान बदल गए।
सपनों के मीत,
और गीत बदल गए।
उसकी कमर की लचक,
और चाल बदल गए।
वक़्त बदला,
तो सब बदल गए।

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वो ख़ूबसूरत थी, और मैंने शादी नहीं की


किसी ने पूछा — ज़िंदगी पे क्या ख़्याल है?
मैं मुस्कुराया, धीरे कहा —
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।
वो क्रिश्चन थी, मैं हिंदू,
वो तमिलियन, मैं बिहारी।
वो नाज़ुक, छुईमुई सी, पतली छरहरी,
मैं — धूप में तपने वाला, सोने वाला, सतुआ खाने वाला,
उसकी उँगलियाँ किताबों के पन्नों जैसी,
मेरे हाथ — खेत की मिट्टी सने हुए।
कुछ देर ठहरी थी वो मेरी दुनिया में,
बातें- वादे, हज़ार हुईं,
मगर फिर —
एक दिन वो जो मुकर गई।
उसके बाद फिर चाहत किसी की नहीं की।
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।।
न जाने क्या था उसके मन में,
या शायद सब जानकर भी अनजान थी।
मैं वहीं रह गया — अधूरा, खामोश,
किनारों सा हर पल में टूटता रहा, बिखरता रहा
मगर फिर….
यूँ किसी से घंटों वैसी गुफ्तगू नहीं की।
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।
वक़्त रह गया जो मेरी हथेलियों में,
उस वक्त में वो मेरी नहीं थी.
ज़माना चुरा ले गया जो, वो राह मेरी थी।
लोग कहते रहे —
“किस्मत थी,”
“तेरी नहीं थी,”
“चल छोड़, आगे बढ़,”
मगर दिल जानता था —
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।

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मैं बस बिहार देखता हूँ


गर्व की हर रात को, ओस में भिंगो के
ऊषा की किरणों में चमकता देखता हूँ।
मैं सोते-जागते, बस बिहार देखता हूँ।
प्रचंड धूप में, पसीने से लथपथ
मैं बहते अपने हल, और लहलहाते धान देखता हूँ।
मैं चलते-बैठते, बस बिहार देखता हूँ।

मैं कितना भी चाह लूँ तुझे ए मिट्टी,
तुझे पाने की प्यास कम होती नहीं।
परदेश की गलियों में जब भी थकता हूँ,
रसोईं में लिट्टी की खुशबू, खिचड़ी-अचार देखता हूँ.
मैं खाते-सूंघते, बस बिहार देखता हूँ।

अधरों पे छपरा तो नयनों में सीवान देखता हूँ।
मैं गाते-झूमते, बस बिहार देखता हूँ।
तुम भी देखो, जहाँ से तुम आए हो,
दिनकर-नागार्जुन की माटी से मैं
अपनी कलम से संपूर्ण ब्रह्मांड देखता हूँ।

जहाँ पग-पग पे कथा है पुरखों की,
मैं खेतों की हर मेड़ पे इतिहास देखता हूँ।
बचपन की गलियों में गूंजती किलकारी,
हर कोने में माँ का आँचल देखता हूँ।
मैं चलते-लिखते, बस बिहार देखता हूँ।

छठ की अरघ्य में उगते सूरज को,
मैं प्रवासी आँखों से नमन देखता हूँ।
करवों की भीड़ में जब “बोल बम” सुनता हूँ,
हर तरफ में गंगा का बहाव देखता हूँ।
मैं यादों में भी, बस बिहार देखता हूँ।

पटना की शामों में उम्मीदों की लौ,
गंगा की धार में समय को बहता देखता हूँ।
भोजपुर की तलवार, मिथिला का श्रृंगार,
हर दिशा में एक तेजस्वी चेहरा देखता हूँ।
मैं जागते-सपने, बस बिहार देखता हूँ।

तुम भी लौटो, इस धरती के रंग में,
जहाँ मिट्टी में सोना उगता है हर बार।
दिनकर-नागार्जुन की माटी से मैं
कविता नहीं, एक जीवंत संसार देखता हूँ।
मैं जीते-मरते, बस बिहार देखता हूँ।

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