पुत्र मेरे, तुम नीलकंठ बनो


मैंने देखें हैं दिल के कई टुकड़े,
भिखरे हुए तेरे आँगन में.
रोते हो क्या तुम आज भी,
बैठ के मेरे यादों में.
बढे चलो, मुझे भूलकर,
ये प्रेम नहीं,
ये बेड़ियाँ हैं, तुम्हे रोकेंगी।
पुत्र मेरे, सबल बनो,
इस निर्बलता के केंचुल से.
जीवन में जो भी विष मिले,
ऐसे उसे धारण करों,
की अजर – अमर नीलकंठ बनो.
नागिन है ये दुनिया, बस बिष ही देगी,
उसपे नारी,
शल्य सा तुम्हारा मनोबल हरेगी।
पुत्र मेरे, तुम अपने हाथों से,
कुरुक्षेत्र में भविष्य गढों।
ना की भविष्य का चिंतन,
नारी के आगोस में बैठ के करो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पापा आप मेरी मदिरा थे


पापा – वो – पापा,
आप मेरा ख्वाब थे.
खुले बगीचे में,
बादल की बूंदों सी,
मिठास थे आप,
मेरी जिंदगी का.
हरी घास पे,
नन्ही बूंदों सी,
नयी सुबह थे आप,
मेरे हर सपने का.
पापा – वो – पापा,
आप मेरा ख्वाब थे.
आप गंगा थे मेरे,
मैं किनारों का पत्थर।
डूब कर आपकी धाराओं में,
चमक उठा जिसका कण – कण.
आप हिमालय थे मेरा,
जिसकी घाटी में,
पुलकित हुआ,
और प्राप्त किया,
दुश्मनों की आँखों में खलने वाला,
मैंने ये योवन।
पापा – वो – पापा,
आप मेरी बुलंदी थे.
पापा, आप मेरी वो मदिरा थे,
जिसका नशा,
आज तक उतरा नहीं।
जिसके आगे कोई और,
जाम नहीं।
जिसके स्वाद में,
आज तक साँसों की,
प्यास मिटती नहीं।
मैं अपना मोक्ष भी,
ठुकरा दूँ,
बैंकुठ भी ठुकरा दूँ,
बस आपकी गोद,
और दुलार की खातिर।
पापा – वो – पापा,
आप मेरी साहस थे,
मेरी दौलत थे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सिंह सा दहाड़ लेता है


जिंदगी ने हर तरफ से तन्हा कर दिया,
उमीदों के हर किनारे को तोड़ कर,
बे- आसरा कर दिया।
फिर भी नशों में बहता ये खून,
जो राजपूती है,
उछाल लेता हैं,
उबाल लेता है.
संकट के हर घड़ी पे,
ये सिंह सा दहाड़ लेता है.
मैं मिटने की राह पर रहूँ,
साँसे टूटने की कगार पे रहे.
छाने लगते हैं जब भी,
हार की आंशका के ये काले बादल।
गिरते – गिरते भी, धूल में धूसरित होते भी,
ये खून, दुश्मनों को ललकार देता है.
मुझमे फिर से अहंकार भर,
जोश भर,
आखिरी क्षणों में भी,
राण-भूमि में, अरुंओं के सम्मुख,
नाव-योवन प्रदान करता हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पापा


प्रखर था,
प्रबल था,
प्रमुख था,
प्रधान था,
प्रवाहित था,
प्रज्जवल्लित था,
दीप सा.

निडर था,
निर्भय था,
मुखर था,
निश्छल था,
निस्चल था,
अटल था,
अचल था,
पर्वत सा.

प्रतिभावान था,
प्रकाशवान था,
उदयमान था,
गतिमान था,
विराजमान था,
उर्जावान था,
सूर्य सा.

तेज था,
ताप था,
वेग था,
बहाव था,
प्रहाव था,
कटाव था,
मुझमे दरिया सा.

कटाक्ष था,
खवाब था,
लगाव था,
जुड़ाव था,
आत्मविश्वास था,
सम्मोहन था,
मुझमे चाँद सा.

कुटिल था,
जटिल था,
विकट था,
विरल था,
विराट था,
अकंटक था,
असाध्य था,
समुन्द्र सा.

अब,
मंद हूँ,
मूक हूँ
मजबूर हूँ,
सरल हूँ,
साध्य हूँ,
स्थिर हूँ,
वृक्ष सा.

अब,
जड़ित हूँ,
पीड़ित हूँ,
प्रताड़ित हूँ,
शोषित हूँ,
शासित हूँ,
कुपोषित हूँ,
धूसरित हूँ,
पशु सा.

दीन हूँ,
दुखी हूँ,
विस्मित हूँ,
पराजित हूँ,
विभाजित हूँ,
विस्थापित हूँ,
निर्बल हूँ,
निर्धन – निस्सहाय सा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पापा और परमीत


जब तक थे पापा,
परमीत था निराला।
जब से गए पापा,
परमीत हैं अकेला।
तरकश में मेरे तब,
तीरों की कमी थी.
फिर भीं मेरे तीरों ने,
परचम था लहराया।
तरकश में मेरे अब तीर -ही तीर हैं,
मगर अभी तक मैंने,
एक भी दुर्ग नहीं ढाया।
जब तक थे पापा,
परमीत में परशुराम सी थी प्रखरता।
जब से गए पापा,
परमीत का मतलब हो गया है निर्बलता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बहुत याद आते हो पापा


बहुत याद आते हो पापा,
जिंदगी ज्यों – ज्यों ढल रही है यहाँ।
दर्द इसका नहीं की,
सीने को सैकड़ों जख्मों ने छलनी किया।
आँसूं ये इसके लिए हैं की,
जल्दी ही टूट रहा है तुझसे नाता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

यादों का समंदर है पिता


तेरे यादों का समंदर है पिता मेरे दिल में,
क्या किसी से मोहब्बत चाहूँ जब सागर ही है मुझमे।
भटकती मेरी राहों को कैसे तुमने संभाला होगा,
अब जाके समझा जब कितनो को रुलाया है मैंने।

 

परमीत सिंह धुरंधर

नूरे – धुरंधर हूँ मैं


जंग तो होगी,
चाहे पूरी दुनिया एक तरफ,
और मैं अकेला ही सही.
नूरे – धुरंधर हूँ मैं,
पीछे हटने का सवाल ही नहीं।
मौत का भय मुझे क्या दिखा रहे हो,
लाखो दर्द में भी जो मुस्कराता रहा,
खून उसका हूँ मैं,
झुकने का सवाल ही नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

आनंद


जब दिल टूट जाए, तो माता – पिता की सेवा करनी चाहिए।
धन तो नहीं मिलेगा, पर आनंद जरूर मिलेगा।

परमीत सिंह धुरंधर

आप थे, तो किसी के चुम्बन में भी मज़ा था


जिंदगी के इस दौर में अकेला पड़ गया हूँ,
भीड़ से सजी इस बस्ती में भी मैं तन्हा पड़ गया हूँ.
ए पिता, धीरे – धीरे तेरी चाहत बढ़ने लगी है.
जिंदगी हैं मजबूर अब,
बिना तुम्हारे बोझ सी लगने लगी है.
आप थे, तो किसी के चुम्बन में भी मज़ा था,
बन के भौंरा, मैं भी मंडराता था.
अगर आप होते, तो मैं इठलाता,
अगर आप होते, तो मैं मंडराता,
फूल तो लाखों हैं, पर उनमे अब वो बात नहीं,
रिश्ते तो कई बन रहे, मगर वो मिठास नहीं।
रिश्तों के संगम में भी मैं प्यासा रह गया हूँ.
ए पिता, धीरे – धीरे तेरी चाहत बढ़ने लगी है.
जिंदगी हैं मजबूर अब,
बिना तुम्हारे बोझ सी लगने लगी है.

There is no meaning to have living relationship if you do not have a good relationship with your father.

परमीत सिंह धुरंधर