पिता-परमेश्वर


मेरी उदण्डता, मेरी प्रचंडता,
मेरी शक्ति के, दाता तुम.
तुम पिता नहीं, परमेश्वर हो,
इस जीवन के, अधिष्ठाता तुम.
प्राणों से प्रिये हो मुझको,
प्यारी से भी प्यारे हो.
त्रिलोक को जीत के मैं लौटूं,
रखते हो ऐसी अभिलाषा तुम.
तुम पिता नहीं, परमेश्वर हो,
मेरे भाग्य के विधाता तुम.

परमीत सिंह धुरंधर

पुत्र का गर्व


सिंह सा गर्जना करता हुआ,
जब तू चलता है धरती पे.
गर्व होता है मुझको ए पिता,
पुत्र तुम्हारा कहलाने में.

परमीत सिंह धुरंधर

पिता


बड़े पिता की संतान होने का ये फायदा है की माँ का प्यार दोगुना हो जाता है.
खाने को मिले या न मिले, पहनने को मिले या न मिले, मगर पिता भी माँ बनके प्यार लुटाने लगता हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

मंत्र


बाप का मंत्र कभी बेकार नहीं जाता,
ब्रह्माश्त्र भी इस के सामने काम नहीं आता.

परमीत सिंह धुरंधर

अगस्त 22


प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.
शब्द मत समझना इन्हे कलम के,
मैंने साक्षात इसमें अपना ह्रदय रखा है.
तुम्हारी कमर पे हरपल झूलती,
वो चोटी मेरे ह्रदय की वीणा हैं.
जिसे मैंने तुमसे दूर इस शहर में,
अब तक हर एक पल में झंकृत रखा है.
प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.
हर सुबह,
तुम्हारी केसुओं से जो छनती थी बुँदे,
मैंने उसे, विरहा के इस तपते रेगिस्तान में भी,
अपनी पलकों में संजोये रखा हैं.
प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.
सब कुछ निपटा के, हर दीपक बुझा के,
जब तुम कमरे में आती थी एक दिया जला के,
मैंने आज तक, जीवन के हर निराशा में,
असफलता में, उसकी लौ को अपने सीने में,
प्रज्जवलित रखा है।
प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पापी मन


पापी मन,
नारी के तन,
में कितना,
उलझा है.
भूल के,
अपने माता-पिता,
जुल्फों में,
लेटा है.

परमीत सिंह धुरंधर 

दुल्हन


जो दर्पण को देख कर शर्मा जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो झुकी पलकों से भी दिल को छू जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जब लौटूं मैं हल लिए काँधे पे,
दिनभर का थका हारा,
तो वो मंद – मंद मुस्करा कर,
अभिनन्दन करे दरवाजे पे,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो काजल भी लगाये आँखों में,
मेरी आँखों में आँखे डाल कर.
जो चूड़ी भी पहने तो,
मेरी बाहों में बाहें डाल के,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो मेरे ठन्डे चावल के थाली पे भी,
हौले-हौले पंखा बैठ के डुलाये,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।

परमीत सिंह धुरंधर

पिता


तुम्हारी चरणों में पिता,
मैं भी अभिनन्दन करता हूँ,
मैं कर तो कुछ नहीं पाउँगा,
पर दिल से तुम्हारा बंदन करता हूँ.
ऐसी कोई सुबहा नहीं,
जब आँखों में आंसूं न आये,
ऐसी कोई रात नहीं,
जब दिल को तुम याद न आये.
मैं कर तो कुछ नहीं पाउँगा,
पर हर एक छन मैं,
तुम्हारी चरणों में नमन करता हूँ.
तुम्हारी चरणों में पिता,
मैं भी अभिनन्दन करता हूँ,
मैं कर तो कुछ नहीं पाउँगा,
पर दिल से तुम्हारा बंदन करता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

मीठी नींद


पिता,
इसलिए नहीं की,
कोई गोद नहीं है,
मैं रोता हूँ.
पिता,
इसलिए भी नहीं,
की खाने पे कोई,
साथ नहीं है,
मैं रोता हूँ.
और,
इसलिए भी नहीं की,
कोई रहनुमा नहीं है,
मैं रोता हूँ.
बल्कि,
इसलिए रोता हूँ,
की अब वो नजर नहीं,
जो मुझमे एक अच्छाई,
ढूंढ सके.
वो जिगर नहीं,
जो हमारी नजर को,
पढ़ सके.
वो दर नहीं,
जहाँ मैं दो घडी,
चैन पाने के लिए,
आँखे बंद कर सकूँ, परमीत।

माता-पिता


अगर न होते माता-पिता,
तो कैसा होता बचपन,
भूख से बिलखता मैं,
और, कचरे में ढूंढता भोजन।
अगर न होते माता – पिता,
तो कैसा होता योवन,
जुवा खेलता गलियों में,
और, करता मदिरा-सेवन।
अगर न होते माता – पिता,
तो कैसा होता जीवन,
मैं गुलामी करता किसी का,
और, लोग करते मेरा शोषण।
मैं शेर सा दहाड़ता हूँ,
परमीत, जाकर हर एक वन,
अगर न होते माता-पिता, तो,
गिदर सा उठता, किसी का जूठन।