मैं उस पिता का पुत्र हूँ


मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो धरती पे किसी से हारा नहीं,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो उर्वशी पे भी डिगा नहीं।
खडग उठा लिया है जब,
तो करो मेरा सामना महारथियों,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जिसका तीर कभी चूका नहीं।
शिशु समझ के मौत का भय,
किसको दिखा रहे हो,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो रण में शिव से भी डरा नहीं।
तुम उन्माद में हो अपने शौर्य के,
मैं जवानी में चढ़ के आया,
रौंद के हर दिशा से जाऊँगा तुम्हे,
ये अपनी माँ से मैं कह के आया।
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जिसका रथ कभी रुक नहीं।
मैं उस पिता का ‘परमीत’ पुत्र हूँ,
जिसका धवज कभी झुका नहीं।

अभिमन्यु


काश तुम होते हमारे साथ पिता जी,
तो हम यूँ अकेले न होते।
इस मोड़ पे जिंदगी के,
यूँ तन्हा-तन्हा न होते।
अभिमन्यु बढ़ा है,
तुम्हारी शान में,
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल इस मैदान में,
जग करता रहेगा,
तुम्हारा गुणगान पिता जी,
काश तुम होते हमारे साथ पिता जी।

पिता तेरी चरणों में


पिता तेरी चरणों में, ये जीवन समर्पित है,
पास नहीं है तन के, पर मन में तू ही जीवित है.
थक के जब भी मैं रुका, दुःख के समंदर में भींग के,
नजरो को दूर तू ही नजर आता hai.
पास नहीं है तन के परमीत के,
पर रुधिर में तू ही प्रहावित है.
मन में तू ही जीवित है.