मैं बस बिहार देखता हूँ


गर्व की हर रात को, ओस में भिंगो के
ऊषा की किरणों में चमकता देखता हूँ।
मैं सोते-जागते, बस बिहार देखता हूँ।
प्रचंड धूप में, पसीने से लथपथ
मैं बहते अपने हल, और लहलहाते धान देखता हूँ।
मैं चलते-बैठते, बस बिहार देखता हूँ।

मैं कितना भी चाह लूँ तुझे ए मिट्टी,
तुझे पाने की प्यास कम होती नहीं।
परदेश की गलियों में जब भी थकता हूँ,
रसोईं में लिट्टी की खुशबू, खिचड़ी-अचार देखता हूँ.
मैं खाते-सूंघते, बस बिहार देखता हूँ।

अधरों पे छपरा तो नयनों में सीवान देखता हूँ।
मैं गाते-झूमते, बस बिहार देखता हूँ।
तुम भी देखो, जहाँ से तुम आए हो,
दिनकर-नागार्जुन की माटी से मैं
अपनी कलम से संपूर्ण ब्रह्मांड देखता हूँ।

जहाँ पग-पग पे कथा है पुरखों की,
मैं खेतों की हर मेड़ पे इतिहास देखता हूँ।
बचपन की गलियों में गूंजती किलकारी,
हर कोने में माँ का आँचल देखता हूँ।
मैं चलते-लिखते, बस बिहार देखता हूँ।

छठ की अरघ्य में उगते सूरज को,
मैं प्रवासी आँखों से नमन देखता हूँ।
करवों की भीड़ में जब “बोल बम” सुनता हूँ,
हर तरफ में गंगा का बहाव देखता हूँ।
मैं यादों में भी, बस बिहार देखता हूँ।

पटना की शामों में उम्मीदों की लौ,
गंगा की धार में समय को बहता देखता हूँ।
भोजपुर की तलवार, मिथिला का श्रृंगार,
हर दिशा में एक तेजस्वी चेहरा देखता हूँ।
मैं जागते-सपने, बस बिहार देखता हूँ।

तुम भी लौटो, इस धरती के रंग में,
जहाँ मिट्टी में सोना उगता है हर बार।
दिनकर-नागार्जुन की माटी से मैं
कविता नहीं, एक जीवंत संसार देखता हूँ।
मैं जीते-मरते, बस बिहार देखता हूँ।

RSD

बिहार मेरा, अनमोल बड़ा


बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ.
तेरी गोद में मैं खेला
वही रंग मेरा तुझपे गया.
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ।

वहीं पिता की ऊँगली पकड़ कर मैं चला
वहां दौड़ा और फिर बड़ा हुआ.
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ।

वहीं तूने झुलाया झूलों पे
वहीं लोरी तुम्हारी सुनकर मैं सोया।
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ।

वहीं नाम मिला, वहीं प्यार मिला
वहीं सरसों का तेल देह पे चढ़ा.
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ.

वहीं आम के बाग़,
वहीं मछली के तालाब।
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ.

कितना भी मैं कमा लूँ ताज
कितना भी मैं बना लूँ ताज
फिर भी वो सुकून नहीं
की मिट्टी में वह जो फूल खिला।
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ.

रिश्ता ना फिर ऐसा मिला
दिल ना कहीं फिर ये जुड़ा।
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ

RSD

माँ की निगाहों में है


फ़िज़ाओं में रौशनी सितारों से नहीं, दुआओं से है
मेरी राहें-मंजिल मेरी माँ की निगाहों में है.

RSD

माँ की ममता और पिता का दुलार


माँ की ममता और पिता का दुलार,
संसार में बस ये ही दो हैं भगवान्।
फिर भी मन भटकता है, कितनो के द्वार
बस पाने को जीवन में प्यार।

माँ की ममता और पिता का दुलार,
संसार में बस ये ही दो हैं भगवान्।
ये ही मेरे शिव हैं, ये ही मेरे विष्णु
इनकी चरणों में हैं चरों मेरे धाम.

माँ की ममता और पिता का दुलार,
संसार में बस ये ही दो हैं भगवान्।
और किसने लुटाये हंस-हंस के अपने स्वप्न
और कर दी तुमपे अपनी खुशियाँ निसार।adher

RSD

फटी-मैली-कुचैली साड़ी में


जो सर्वविदित सत्य है
उसी से सबको इंकार है.
जिसका प्रेम जितना पवित्र है
वो उतना ही लाचार है.
अश्कों में बंधकर भी
जिसका ह्रदय बिशाल है.
फटी-मैली-कुचैली साड़ी में
भी माँ सागर सी अथाह है.

जितना मथ लो, गरल की एक बून्द नहीं
बस प्रेम-ही-प्रेम, आपार है.
मगर मनुष्य को कहाँ
इसका ज्ञान है?
भागता-भागता ही रहा जो
चैन-सुकून की तालाश में
फिर लौटा है, महलों को छोड़कर
टूटी-फूटी-टपकती झोपडी में
जो उसके माँ का निवास है.

Rifle Singh Dhurandhar

छापरहिया एक बादल


मेरे मुख का दर्प ये ही हैं
ये ही हैं मेरे सागर।
पाकार इनसे जीवन-अमृत
हुआ मैं दम्भ में पागल।

अट्टहास लगाता जीवन में हूँ
की कोई छीन नहीं सकता मेरे ये आनंद।
सुशीला- धुरंधर का लाल मैं
फीका जिसके आगे स्वर्ग, मेनका का आंचल।

उसपे मैं तोमर राजपूत
और छापरहिया एक बादल।
जहां पे मैं ठहर जाऊं
वहीँ पे बरसे सावन।

The poem is written for my father and mother. It is the best blessing I have in my life.

Parmit Singh Dhurandhar

जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ


जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.
तन – मन के आलस त्याग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

प्रभाकर चढ़ के आ गइलन अम्बर पे
तू हू अब अपना रथ के उतार अ.
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

मन के बांधल जाला, तन के ना बांधे पौरष
निंद्रा-देवी से कह द, आपन बोरिया – बिस्तर बाँधस।
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

कलरव-गान करके खगचर भरे उड़ान
तहरा देह के इ कइसन लागल थकान।
छू ने को आसमान तू भी हुंकार भर अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.

परमीत सिंह धुरंधर

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?


हमसे बोलो
तुम्हे क्या चाहिए?
तुम पुत्र मेरे हो
तुम्हे ला के हम देंगें।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

पाकर तुम्हे प्रफुलित मन है
विराट होने का यही क्षण है
नस – नस में तुम्हारे
लहू है मेरा
नस – नस को तुम्हारे तृप्त करेंगे।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

अधूरा है आनंद का हर एक पल
जो मुस्कान न हो तुम्हारे मुख पे
चल कर खुद काँटों पे
पुत्र तुम्हारे लिए
हम हर पुष्प खिलायेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

धुरंधर – सुशीला के
लाल हो तुम
तुम्हें यूँ तो व्याकुल
नहीं देख पायेंगे।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

भीषण होगा युद्ध
और वृद्ध हम होंगे
तब भी समर में
पुत्र तुम्हे
अकेला तो नहीं भेजेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

प्रिये हो तुम पुत्र, अति हमें
ये प्यार किसी और को
तो हम फिर ना दे पायेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

In the memory of my father Dhurandhar Singh.

परमीत सिंह धुरंधर

दबा देना तुम पाँव माँ का


आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

तुम मुझको मोहन कहना
कहूंगा राधा तुमको मैं.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

थोड़ा दबा देना तुम
पाँव माँ का रातों में.
ख्याल रखूंगा जीवन भर
मैं बढ़कर अपनी साँसों से.

आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे माँ की दुआओं का दौर है


सितारों से कह दो
ये रहनुमाओं का दौर है.
तन्हा हूँ मैं यहाँ
मगर ये मेरे इरादों का दौर है.

मिटना मेरे नसीब में तय है
मगर मिटने से पहले
ये मेरे हौसलों का दौर है.

मेरी बुलंदियों को किसी की
ताबीज नहीं चाहिए।
मेरे सर पे मेरी माँ का हाथ है.
जब तक खड़ा हूँ यहाँ
तो समझों की
मेरे माँ की दुआओं का दौर है.

परमीत सिंह धुरंधर