ठोकर


जब उसने मेरे दिल को तोड़ा,
ठोकर – पे ठोकर लगा के.
तब मुझे एहसास हुआ, धुप में,
नंगे पैर चलती माँ के प्यार का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Respect mom and not religion.

वो माँ है


जो सिर्फ सूरत देख के मुस्करा दे,
वो माँ है.
जो जेब की भार देख के मुस्कराए,
वो औरत है.
जो कीचड़-मिटटी से सने देह को,
अपने सबसे सुन्दर साड़ी से पोंछे,
वो माँ है.
जो रात में बाहों में आके भी, बाजार की,
साड़ियों और गहनों की बात करे,
वो औरत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पहनते हैं पैंट में लगा कर पैबंद


बहुत दौलत कमा के भी,
जब खुशियाँ दूर ही रही.
तो हमने घुंघरुओं पे,
लुटा दी साड़ी दौलत।
माँ के लिए,
एक साड़ी भी नहीं खरीद सके,
ये गम रहा हमको।
उस सुकून को,
फिर से पाने के लिए,
पहनते हैं पैंट में लगा कर पैबंद।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जहाँ माँ ही मिठाई भी है


बुलंदियों का नाम है गरीबी,
जो टूटे ख़्वाबों में भी जिन्दा रखती है.
ये ऐसा दर्द है,
जो अमीरों की बस्ती में नहीं,
गरीबों  के साथ रहती है.
जहाँ काटती है,
माँ आज भी अपने पेट को.
अपने बच्चे की भूख मिटाने के लिए.
नौ माह का ये दर्द नहीं,
जो सेव-अंगूरों से मीट जाए.
ये तो वो ममता है, जो
उम्र भर एक फटी साड़ी में पलती हैं.
एक माँ की कहानी है गरीबी,
जो रौशनी में नहीं, मैगज़ीन के कवरों पे नहीं,
टूटी चारपाई, और जुगनू में चमकती है.
जहाँ उबलते नहीं हैं चावल,
बिना हाथ, चूल्हे में जलाए।
जहाँ पकती नहीं है रोटी,
बिना चक्की में जवानी पिसाय।
जहाँ चढ़ती नहीं है, जवानी,
बिना माँ के हाथ से खाये।
जहाँ पचता नहीं पानी भी,
बिना माँ के लोरी सुनाय।
की एक जन्नत सी है गरीबी,
जहाँ माँ ही मिठाई भी है.
ये ऐसी मोहब्बत है यारों,
जो अमीरों की किस्मत में नहीं,
बस गरीबों की झोली में हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यार


जो अपनी माँ से प्यार नहीं करते,
वो अपने बच्चों की माँ से प्यार कैसे करेंगें?
और जो अपने बच्चों की माँ से प्यार नहीं करते,
वो क्या अपनी माँ को प्यार करेंगे?

 

परमीत सिंह धुरंधर

मुसाफिर की किस्मत में


मुसाफिर की किस्मत में,
माँ का सुख कहाँ?
लड़कियों की चाहत,
ताउम्र सफर की,
उनका एक मुकाम कहाँ?
जो मान लेते हैं,
झटपट अपने बेगम की हर ख्वाइस।
ऐसे शौहर को क्या पता?
की बेगम के शौक क्या -क्या?
और नजरें कहाँ – कहाँ?

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं मजदूर था कभी


मैं मजदूर था कभी,
जब मेरे अपने खेत थे.
मैं मजदूर था कभी,
जब मेरे अपने बैल थे.
हाँ, मैं भी मजदूर था,
जब मेरे अपने बाग़ थे.
मैं मजदूर था कभी,
जब मेरी दुकानें,
मेरे खलिहान थे.
अब तो मैं बस एक बंजारा हूँ.
चूल्हा जलता था,
हाँ दिए की मद्धम रौशनी में.
रोटी पकती थी,
वो बंट जाती थी,
आते – आते अपनी थाली में.
मगर,
आती बड़ी मीठी नींद थी,
पछुआ के उस ताप में,
माँ के उस थाप में.
अब तो व्यंजनों का भण्डार है,
हर थाली में जैसे एक त्योंहार है.
मगर अब छोटी रातें,
और लम्बी थकान हैं.
मैं एक मजदूर था,
जब माँ सोती नहीं थी,
माँ, एक – एक रूपये का तह लगाती थी.
आज, मैं सिर्फ एक मजबूर हूँ,
जब तहखानों में रूपये है,
मगर माँ नहीं है,
और बीबी उठती नहीं है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यार और परवाह


बचपन में बहन, माँ से ज्यादा,
जवानी में माँ, महबूबा से ज्यादा,
और बुढ़ापे में बीबी, बच्चों से ज्यादा,
प्यार, और परवाह करती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत में थोड़ी- बहुत ममता का होना बहुत जरुरी है


हर मोहब्बत में थोड़ी- बहुत ममता का होना बहुत जरुरी है, वरना वो मोहब्बत, मोहब्बत न होकर, वासना, काम, लोभ और प्रतिशोध बन जाता है. इसलिए तो माँ सर्वश्रेष्ठ है देवों से भी, क्योंकि माँ गलती या पाप होने पे भी उसकी सजा नहीं देती। माँ तो गले लगाती है फिर भी. लेकिन, देवता देते हैं, भाई! ऐसा कोई रिश्ता नहीं है, चाहे पिता, भाई, बहन, दादा, दादी या गुरु का ही रिश्ता हो, जो बिना ममता के बहुत दिनों तक जीवित रह सके!

 

परमीत सिंह धुरंधर

त्रिदेओं से बड़ी है ममता तेरी


त्रिदेओं से बड़ी है ममता तेरी,
ये माँ तू ही है विधाता मेरी।
मैं यूँ ही तेरी चरणों में जीता रहूँ,
तू खिलाती रहे, मैं खाता रहूँ।
तेरी आँचल में हैं जन्नत मेरी,
तुझी से है दुनिया मेरी।
तू यूँ ही मुझे संभालती रहे,
मैं मुस्काता रहूँ, मैं हँसता रहूँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर