हम जिस तहजीब की तरफ बढ़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ महबूब तो कई हैं, सर्द रातों में,
जिस्म को सहलाने को.
मगर, हम जिस माटी को छोड़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ माँ आज भी अकेली है, राह देखती,
हमारे लौट आने को.
परमीत सिंह धुरंधर
हम जिस तहजीब की तरफ बढ़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ महबूब तो कई हैं, सर्द रातों में,
जिस्म को सहलाने को.
मगर, हम जिस माटी को छोड़ रहें हैं दोस्तों,
वहाँ माँ आज भी अकेली है, राह देखती,
हमारे लौट आने को.
परमीत सिंह धुरंधर
वो करती है गुजरा, थाली में बचे चाँद चावल के दानें से.
माँ तो मात देती भूख को भी, बस बेटे के मुस्कराने से.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी बाहों में सरकते-सरकते,
सुबह से शाम हो गयी.
अब भूख लगी है मुझे,
माँ की फिर याद आ गयी.
तेरे तन की खुसबू ,
भी अब मीठी नहीं लगती।
वो लड्डू मेरी माँ के हाथों की,
फिर से मुझे याद आ गयी.
परमीत सिंह धुरंधर
माँ,
ईस्वर का रूप है.
माँ,
सर्द मौसम में घूप है.
माँ है,
तो मीठी है भूख.
माँ,
मिठाई का संदूक है.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं अपनी माँ की चरणों को,
गंगा समझता हूँ,
मुझे धर्म से क्या लेना देना,
मैं तो रोज ये तीर्थ करता हूँ.
मैं अपनी माँ की बोली को,
गीता समझता हूँ.
मुझे वेद-पाठ से क्या लेना देना,
मैं तो ये ही कर्म रोज करता हूँ.
मैं तो अपनी माँ के हाथों के खाने को,
प्रसाद समझता हूँ,
मुझे कथा-वाचन से क्या लेना देना,
मैं तो रोज ये ही पुण्य कमाता हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
रफ़्तार मेरी बढ़ती जा रही है,
पर सांस है की उखड़ती नहीं है.
जाने माँ ने कैसे दूध पिलाया है,
दुश्मनो के बीच में भी,
मेरी आवाज दबती नहीं है.
परमीत सिंह धुरंधर
तस्वीरें खुदा की भी सजने लगी हैं,
जब से मेरी माँ मुस्कराने लगी है.
बहारों का तो पता नहीं,
पर आँगन में मेरे तितलियाँ उड़ने लगी है.
वो ही सूरज की किरणे, तन को जलती हैं,
वो ही पसीने की बुँदे, तन को भिगोती है.
मगर मधुर हवाएँ अब चलने लगी हैं,
जब से मेरी माँ मुस्कराने लगी है.
परमीत सिंह धुरंधर
अपनी माँ की दुवाओं का, मैं एक हिसाब हूँ,
तेरी गुलशन में मालिक, मैं आज भी आज़ाद हूँ.
सितमगर ने तो ढाए वैसे कई सितम हम पर,
पर हौसले से सीने में, मैं आज भी बुलंद हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
माँ का कोई रूप नहीं,
माँ का कोई रंग नहीं.
माँ तो दिव्य है,
माँ साक्षात ब्रह्म है.
माँ ही ओमकार है,
माँ ही निराकार है.
धरती पर माँ,
भागवत का रूप साकार है.
विश्व का आधार,
धर्म का श्रृंगार,
माँ प्रेम का सास्वत,
भण्डार है.
संस्कृति माँ से, माँ ही ज्ञान,
स्वयं नतमष्तक है भगवान,
सृष्टि का माँ ही,
पालनहार है.
परमीत सिंह धुरंधर
बात – बात में खून बहाते हो,
चाँद लकीरों के नाम पे.
मेरा तो धर्म, मजहब, ईमान,
सब वहाँ है,
जहाँ वो अपने केसुओं को बिछा दें.
सबसे बड़ा धर्म माँ की गोद,
सबसे बड़ी इबादत,
महबूब की आगोश है.
इसके मिलने पे,
जन्नत-जहन्नुम का भेद मिट जाता है.
परमीत सिंह धुरंधर