चंचल मन, कोमल तन,
बालकपन में अभिमन्युं।
अभिमन्युं-अभिमन्युं।
माँ का दूध पीते – पीते,
पहुंचा रण में अभिमन्युं।
अभिमन्युं-अभिमन्युं।
चारों तरफ सेनाएं सुसज्जित,
बीच में अकेला अभिमन्यु।
अभिमन्युं-अभिमन्युं।
द्रोण-कर्ण के तीरों को,
तिनकों सा उड़ता अभिमन्युं,
अभिमन्युं-अभिमन्युं।
कर्ण के पूछने पे परिचय, बोला
माँ मेरी सुभद्रा, मैं उसका अभिमान-अभिमन्यु।
अभिमन्युं-अभिमन्युं।
एक अर्जुन से बिचलित कौरव,
के समुख काल सा धुरंधर अभिमन्युं।
अभिमन्युं-अभिमन्युं।
Category: Mother
अभिमन्यु
मैं अपनी तीरों से,
नभ में तेरा नाम लिखूंगा।
हर एक पल में मेरी माँ,
तुझे प्रणाम लिखूंगा।
द्रोण-कर्ण भी देख लें,
माँ शौर्य तेरे दूध का.
जब मैं धुरंधर उनकी तीरों से,
चिड़िया बनाके उड़ाऊंगा।
ना यूँ कम्पित हो माँ,
भविष्य की कल्पना से.
मैं लाल तेरा हूँ माँ,
तेरा ही कहलाऊंगा।
द्रोण के चक्रविहू को तोड़,
वहाँ पुष्प खिलाऊंगा।
और उन पुष्पों से माँ,
रोज तेरा आँगन सजाऊंगा।
माँ
माँ ने कहा था बचपन में,
तू लाल मेरा है लाखों में.
दुनिया मुझ पे हंसती रही,
पर माँ ने चूमा माथे पे.
आँचल में बिठाया,
बाहों में उठाया,
एसे रखा मुझे,
जैसे कोई रत्न रखा हो,
दुनिया से छुपा के.
समय इतना बदल गया,
मैं राजा से रंक बन गया.
हर रिस्ता टुटा मेरा प्रेम में,
फिर भी रखती है माँ धुरंधर,
को सीने से लगा के.
माँ का लाल
तेरे वास्ते ए माँ, मैं लौट के हाँ आऊंगा,
न तू उदास हो, मैं रण जीत के ही लौटूंगा।
आज समर में देख ले, ज़माना भी बढ़ के,
क्या द्रोण, क्या कर्ण,
सबको परास्त कर के ही लौटूंगा।
तेरा दूध ही मेरे शौर्य का प्रतीक है,
और क्या चाहिए, जब मुझपे पे तेरा आशीष है.
ना कृष्णा का, ना अर्जुन का,
मैं बस परमीत, लाल माँ तेरा कहलाऊंगा।
माँ का आँचल
शेर की दुनिया इतनी छोटी क्यों है?
क्यों जंगल में शेर अकेला बैठा है?
हाथियों का झुण्ड, हिरणों का समूह,
फिर शेर क्यों गुमसुम अकेला है?
बल से नहीं प्रेम से जीतो,
बल से तो सिर्फ पत्थर टूटता है.
माँ के आँचल में सो के देखो,
यहीं पे सबकी किस्मत बदलता है.
खुदा की चाहत में भटकने वालों,
यहीं पे, परमीत, हर खुदा बसता है.
माँ
एक पल जो रात कटे पलकों में उनके,
तो खुद तेरी खातिर मैं हज हो आऊँ.
पर एक पल भी मैं दूर रहूँ अपनी माँ से,
तो मेरी आँखों को खुदा तू दीखता नहीं।
एक पल को जो रौंद दूँ जामने को,
तो सनम तेरी लबों को चुम ले परमीत,
पर एक पल भी मैं दूर रहूँ अपनी माँ से,
तो सनम तेरी लबों में वो मिठास नहीं।
माँ
कोई समझता नहीं है,
ममता के आँचल को,
किस्मत बदलती है,
बस माँ दोस्तों।
वो दबाते रहे तलवे,
मौलवियों- शंकराचार्यों के,
मैंने चूमा चरण एक बार माँ के,
सितारे चमकने लगे हैं,
मेरी कदमो में आके.
कोई समझता नहीं है,
ममता के आँचल को,
हर विघ्न बेटे का,
हरती है बस माँ दोस्तों.
कोई समझता नहीं है,
ममता के आँचल को,
किस्मत बदलती है,
परमीत, बस माँ दोस्तों.
माँ
अंगों से खेला हूँ,
रंगों से खेला हूँ,
पर आज भी तरसता हूँ,
माँ के लिए.
जुल्फों में सोया हूँ,
बाँहों में सोया हूँ,
पर आज भी बिलखता हूँ,
माँ के लिए.
ओठों को चूमा है,
पाँवों को चूमा है,
पर आज भी तरपता हूँ,
परमीत, माँ के लिए.
माता-पिता
अगर न होते माता-पिता,
तो कैसा होता बचपन,
भूख से बिलखता मैं,
और, कचरे में ढूंढता भोजन।
अगर न होते माता – पिता,
तो कैसा होता योवन,
जुवा खेलता गलियों में,
और, करता मदिरा-सेवन।
अगर न होते माता – पिता,
तो कैसा होता जीवन,
मैं गुलामी करता किसी का,
और, लोग करते मेरा शोषण।
मैं शेर सा दहाड़ता हूँ,
परमीत, जाकर हर एक वन,
अगर न होते माता-पिता, तो,
गिदर सा उठता, किसी का जूठन।
माँ
मांगता नहीं हूँ मैं,
किसी से,
दुआ जिंदगी कि,
सलामत है जब तक,
साँसे मेरी माँ कि.
सागर कि लहरें चाहें,
डूबा दें किनारा,
तोड़ नहीं सकती हैं,
वो मेरा हौसला.
आसमाँ जला दे चाहें,
गिरा कर बिजलियाँ,
नहीं मिटा सकती है,
वो मेरा काफिला.
डरता नहीं हूँ मैं,
देख के,
भीड़ दुश्मनों कि,
सलामत है जब तक,
साँसे मेरी माँ कि.
मांगता नहीं हूँ मैं,
किसी से,
दुआ जिंदगी कि,
सलामत है जब तक,
साँसे मेरी माँ कि.