माँ


जब धरा पे मैंने,
चलाई कुदाल,
तो धरती बोली,
पाँव तो सम्भाल,
मेरे लाल, परमीत।

लाखो में एक है माँ


कौन कहता है कि झुड़ियां,
खूबसूरती को मिटा देंती हैं,
मेरी माँ आज भी,
लाखो में एक है, परमीत।

अनमोल माँ


रिश्ते दरक,
गएँ हैं,
इस कदर,
कि बहने लगे हैं,
यादें अब,
मवाद बनकर।
सुखी डालों पे,
अब भी,
लगे है,
हरे पत्तें,
जो,
बिलख रहे हैं,
जावानी में ही,
अपनी जड़ों,
से बिछुड़कर, परमीत।

माँ


मेरी बागों में जितने भी फूल खिले है,
तेरी आँचल में जब तक न गिरेंगे,
चैन नहीं है इनकी पखुड़ियों को,परमीत
जब तक ये तेरे पावों को न चूम लेंगे, माँ.

दूध


महान-महान लोगों ने अपनी कलम से माता-पिता के सन्दर्भ में लिखा है. मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि जब मैं किसी को रगड़ देता हूँ तो मुझे मेरी माँ कि याद आती है, और जब मैं किसी को रगड़ने के लिए तैयार होता होता हूँ तो पापा कि याद आती है. जैसे भगवान् हनुमान जी ने कहा हैं कि भगवान् श्री राम के नाम कि महता स्वयं भगवान् श्री राम से भी ज्यादा है. ठीक उसी तरह माँ के दूध कि महता माँ से भी ज्यादा है. अंत में एक कविता जो बचपन में पापा सुनाते थे:
सोलह भैंस के चौंसठ चभाका,
सवा सेर घी खाईं रे,
कहाँ बारन तहार बाघ मामा,
एक ताकड़ लड़ जाईं रे.
नए खून का नया हूँ मैं बांका,
नई मेरी अंगराई रे,
कहाँ बारन तहार, बाघ मामा,
एक ताकड़ लड़ जाईं रे, परमीत.

लुटेरा बन जा दिल


आवारा बन जा दिल,
नकारा बन जा दिल,
हर इल्जाम ले ले तू,
हंस-हंस के सीने पे.
पर अपने माँ का,
दुलारा बन के दिल,
दुलारा बन के दिल.
टूट रहे हैं ख्वाब,
हर एक पल में,
टूट जाने दे उन्हें.
छूट रहे है साथ,
हर एक का जीवन में,
छूट जाने दे उन्हें.
लुटेरा बन जा दिल,
बंजारा बन जा दिल,
हर पाप तू कर ले,
इन हाथों से अपने.
पर अपने माँ का,
सहारा बन के दिल,
दुलारा बन के दिल, परमीत.

माँ


Image

जिंदगी है सितारों में,
बस माँ कि दुआ से,
कब माँगा है,
मैंने खुदा बोल,
कुछ भी सिवा,
माँ कि निगाहों के.
क्या रखा है,
जन्नत में,
क्या चाँद कि,
आदावों में,
कब चाहा है,
मैंने खुदा बोल,
कुछ भी सिवा,
माँ कि चरणों के, परमीत.

 

माँ


जुमला वो ही पढ़ो,
जो जानकारी दे,
बरना क्या रखा है,
हिंदी में, उर्दू लिखने में.
साँसे जितनी भी जियो,
जियों शान से मगर,
बरना क्या रखा है,
मयखाने में,
मंदिर जाने में.
चाहे जो भी करो काम दोस्तों,
पर आंसूं ना आयें माँ कि आँखों में,
बरना क्या रखा है,
टाटा होने, बिरला होने में, परमीत.

माँ


एक बेवफा ने लुटा,
मोहब्बत में हमको पिला के,
हर मोड़ पे गिर रहा हूँ,
जवानी में ही मैं लड़खड़ा के.
एक -एक चोट पे मेरे छलकता है,
दर्द पिता कि आँखों में,
और मुस्कुराता है यार मेरा,
मेरे जख्मो पे एक नयी अदा से.
एक बेवफा ने हाँ लुटा,
आँचल में अपने सुला के,
भटकने लगा हूँ अब,
अपनी ही गलियों में आके.
जिसके लिए परमीत ने छोड़ा,
अपनी माँ को रोते हुए,
आज माँ ही बैठी है उसके,
जख्मों को अपने सीने पे लेके.

माँ और मिष्टान


बार-बार,
हर बार,
जन्म मिले मुझे,
तो तेरी गोद,
में मेरी माँ.
बार-बार,
हर बार,
खाने को मिले,
परमित को तेरी हाँथो,
पुआ-पूरी, मिष्टान.