Love pains


Love comes with pains
As flowers bring sharp
But hidden thorns.
Morning sun brings hidden afternoon
Full of heat and dampness.
And rains carry life
For pathogens and insects.

We focus so much on the smile
We never think of our faults.
We enjoy all the huge waves of love
Till the boulder arrives
And crushes us
And finally paralyzed our souls.

The season changes
The weather changes
Seeds germinate
And flower turns into fruits
But our mind
Our heart and our souls
Carry only pains, sorrow and tears
Till we die or we hide from the world.

Parmit Singh Dhurandhar

Shadow


I can imagine my life without you
But I cannot imagine life with you.
You speak so much before we kiss
But you don’t speak after our kiss
I can imagine you before our kiss
But I cannot imagine while kissing you.

You are like my banyan tree
It does not matter how vertical light falls
It always makes a shadow
I can see the shadow from far
But I cannot see the shadow
While tangling in your arms.

Parmit Singh Dhurandhar

Desire


Our desires promulgate in the darkness
And bring us close
My heart sails through the ocean of your eyes
While your body breaths in my arms.

Parmit Singh Dhurandhar

Still in my eyes


You are still in my eyes
But now I don’t make tears.

You are still in my heart
But I don’t feel the pain.

You are still in my head
But I don’t have any tensions.

Parmit Singh Dhurandhar

बेचैन कर जाऊंगा


इस कदर टुटा हुआ हूँ
छूने से बिखर जाऊंगा।
इरादा तो ऐसा कुछ नहीं
मगर ठहर नहीं पाउँगा।

तेरी आँखों में कैद कई
इस खेल के माहिर धुरंधर
मैं तो हारा हूँ मगर
तुझे बेचैन कर जाऊंगा।

First two lines are not mine. It is modified from Gulam Ali jee ghazal.

परमीत सिंह धुरंधर 

ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा


पलकों का तेरे ना वादा ही रहा
ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा.
तू थाम रही है जाने अब किसकी हाँ बाहें
ना वो शर्म ही रही, ना वो घूँघट ही रहा.

तूने ही हमको मयखाने से लेकर
मंदिर की सीढ़ियां चढ़ाई थी कभी
अब ना वो देवी ही रहीं, ना साकी ही रहा.
पलकों का तेरे ना वादा ही रहा
ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा.

मासूम नयन तेरे और भोले चेहरे से
ना जाने किन-किन को यहाँ धोखा ही मिला?
क्या वफ़ा करे मोहब्बत में कोई ?
जिसकी किस्मत में तू महबूब है मिला।
पलकों का तेरे ना वादा ही रहा
ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा.

परमीत सिंह धुरंधर 

मोहब्बत


दर्द में उनसे तू शिकायत न कर
ये शहर है उनका, तू बगावत न कर.
मिलेंगे तुझे कई हुस्न इस सफर में
यूँ ठहर कर उनसे मोहब्बत न कर.

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


दरिया का सफर देखिये
समंदर के इश्क़ में
राहें बदल – बदल कर मचली
मगर मजिल बस एक है.

किनारें टूटते हैं,
डूबते हैं, बिखरते हैं
मगर साथ-साथ चलते हैं
इस सफर में
इनका साथ अटल है.

परिंदों का सफर देखिये
आसमान के इश्क़ में
छोड़कर डाल, घोंसला, दाना-पानी
निकल पड़ते हैं उषा के आगमन पे.

हारते, उड़ते, प्यासे
संध्या पे लौट आते हैं
मगर अगली सुबह फिर
से वही चाहत, वो ही उड़ान
क्योंकि उनका उत्साह अटल है.

फूलों का सफर देखिये
उषा के इश्क़ में
खिलती में हर सुबह
उषा के चुम्बन से.

टूटती हैं, बिखरती हैं
काँटों से उलझ -उलझ कर
बदरंग हो जाती हैं.
मगर सुबह फिर नई कलि खिलती है
इनका विश्वास अटल हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

इश्क़ पे कोई और रंग


ये दिल, ये दर्द, ये दवा
इश्क़ पे कोई और रंग चढ़ाता भी तो नहीं।

ये रोटी, ये कपड़ें, ये मकान
शहर में अब कुछ भाता भी तो नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

श्री गणेश और मूषक


पिता और मैं, जैसे
सुबह की लालिमा
और चाँद की शीतलता
दोनों एक साथ
जिसका स्वागत करते
पक्षीगण कलरव गान से.

पिता और मैं
सुसुप्त अवस्था में
जैसे कोई ज्वालामुखी
और बहुत अंदर उसके सीने में
कहीं आग सा धड़कता मैं.

पिता और मैं, जैसे
छपरा का कोई धुरंधर
त्यागकर अपनी चतुराई
और चतुरंगी सेना
बना मेरा सारथि
और कुरुक्षेत्र में उतरता
नायक बन कर मैं.

पिता और मैं, जैसे
शिव और भुजंग
पिता और मैं, जैसे
हरी और सुदर्शन
पिता और मैं, जैसे
सूर्य और अम्बर
पिता और मैं, जैसे
श्री गणेश और मूषक।

परमीत सिंह धुरंधर