मेरी उम्र गुजर गई जिस मयखाने में
वहीँ पे शहर ने अपना गुलशन बना लिया।
ता उम्र हम जिसके पिघलते रहे
उस हमनवाज ने मेरी मौत पे
बस दो बून्द ढलका दिया।
परमीत सिंह धुरंधर
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मेरी उम्र गुजर गई जिस मयखाने में
वहीँ पे शहर ने अपना गुलशन बना लिया।
ता उम्र हम जिसके पिघलते रहे
उस हमनवाज ने मेरी मौत पे
बस दो बून्द ढलका दिया।
परमीत सिंह धुरंधर
तेरी एक नजर पे उम्र ठहर गयी
बस जिंदगी ने साथ नहीं दिया।
गरल ही तरल हो तो सरल क्या?
मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?
तपते रेगिस्तान में
तन को झुलसाती हवायें हैं
विचलित पथिक हो तो प्रयास क्या?
मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?
जीवन अमृत की तलाश में आधर पे अमृत-कलश हो
छलक गरल जाए
यह जान मुख मोड़ लूँ तो प्यास क्या?
मधुबन में तुमसे मिलन कैसा?
परमीत सिंह धुरंधर
प्रिये प्रेम मिलन में मैं तुमसे
प्रति दिन ही हारा हूँ
तुम छलती हो नैनों से
और मैं शिव-शंकर सा भोला हूँ.
तुम मृग बनकर कुलांचे भरती
मधुवन के सारे पथों पे
मैं मीरा सा तुम्हारे एक दरस को
जन्मों की प्यास संजों बैठा हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.
तन – मन के आलस त्याग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.
प्रभाकर चढ़ के आ गइलन अम्बर पे
तू हू अब अपना रथ के उतार अ.
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.
मन के बांधल जाला, तन के ना बांधे पौरष
निंद्रा-देवी से कह द, आपन बोरिया – बिस्तर बाँधस।
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.
कलरव-गान करके खगचर भरे उड़ान
तहरा देह के इ कइसन लागल थकान।
छू ने को आसमान तू भी हुंकार भर अ
जाग अ – जाग अ हो शिकारी जाग अ.
परमीत सिंह धुरंधर
कौन कहता है की मुझे तुमसे मोहब्बत नहीं?
जरा पूछ इन खगचरों से
जिनके साथ मैं तुझे पाने को उड़ा
की आसमा में कहीं भी सुराख नहीं है.
परमीत सिंह धुरंधर
मुझे शरारत सूझी
जवानी में
तो उनसे मोहब्बत हो गयी.
एक रात का सफर था
मगर अब ये आदत हो गयी.
परमीत सिंह धुरंधर
एक लालू – एक राबड़ी
प्रेम जैसे हेमामालिनी।
एक की चाहत दूजे के गाल की
एक के मुख पे हर पल नाम दूजे की.
युग-युगान्तर की ये जोड़ी
प्रेम जैसे हेमामालिनी।
एक नहीं, नौ – नौ संतानों का सुख
देख एक दूजे को भूल जाते हर दुःख।
एक अलबेला – एक अलबेली
प्रेम जैसे हेमामालिनी।
एक लालू – एक राबड़ी
प्रेम जैसे हेमामालिनी।
परमीत सिंह धुरंधर
मेरी कुछ सरहदे हैं
तुम्हारे कुछ रास्ते
दोनों मिल जाएँ
तो फिर अपनी रियासते।
सत्ता पे बैठे लोगो को
हम घेर लेंगें
तुम साथ चलो तो
तुम्हे भी कुछ सुन लेंगे।
ह्रदय को भाने
लगी हो तुम
तुम फूल बनकर खिलो तो
हम भौंरा बन लेंगे।
तुम्हारी नजर का तीर
अभी तक मेरे जिगर में है
तुम कहो तो
इस जख्म के साथ जी लेंगें।
परमीत सिंह धुरंधर
वो किताबों के मेरे पन्ने बने हैं
वो शहर की मेरी दुकानें बने हैं.
ढूंढती है जिसे नजर मेरी प्यासी
वो ख़्वाबों के मेरे समंदर बने हैं.
वो मासूम सा चेहरा
छोड़ गया मुझे भंवर में
जिसके लिए हम दीवाने बने हैं.
These lines are for someone from Raebareli.
परमीत सिंह धुरंधर
हमसे बोलो
तुम्हे क्या चाहिए?
तुम पुत्र मेरे हो
तुम्हे ला के हम देंगें।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।
पाकर तुम्हे प्रफुलित मन है
विराट होने का यही क्षण है
नस – नस में तुम्हारे
लहू है मेरा
नस – नस को तुम्हारे तृप्त करेंगे।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।
अधूरा है आनंद का हर एक पल
जो मुस्कान न हो तुम्हारे मुख पे
चल कर खुद काँटों पे
पुत्र तुम्हारे लिए
हम हर पुष्प खिलायेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।
धुरंधर – सुशीला के
लाल हो तुम
तुम्हें यूँ तो व्याकुल
नहीं देख पायेंगे।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।
भीषण होगा युद्ध
और वृद्ध हम होंगे
तब भी समर में
पुत्र तुम्हे
अकेला तो नहीं भेजेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।
प्रिये हो तुम पुत्र, अति हमें
ये प्यार किसी और को
तो हम फिर ना दे पायेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।
In the memory of my father Dhurandhar Singh.
परमीत सिंह धुरंधर