थोड़ा ठहरकर


तू मिलता, तो मुस्कुरा भी लेता,
शहर में तेरे थोड़ा ठहरकर।
तेरे बिना कुछ भी नहीं बाकी,
ज़िंदगी बिखर गई, एक रात संवरकर।

हवाओं ने भी तेरा हाल पूछा,
मैं जब भी निकला इन गलियों से होकर।
हर रास्ता कुछ कह लेगा फिर से मुझसे
जो चले हम दो कदम साथ मिलकर।

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मायके आना-जाना है


वो जिनको मिली मोहब्बत की कई दुकानें,
उनकी किताबों में भी मेरा चर्चा है।
मैं यूँ ही नहीं बदनाम हूँ ज़माने में,
उनका अब भी मायके, आना-जाना है।
हर इक मोड़ पे आज भी रुक जाते हैं पाँव मेरे
जैसे शहर में यहीं-कहीं उनका ठिकाना है।
जो बात नहीं कह सके थे बरसों तक,
ये कलम लिख रही अब वो ही अफ़साना है।

सारे समंदर कुछ भी नहीं, एक इश्क़ के दर्द के आगे,
उसकी प्यास मिटती नहीं, हज़ारों बाहों में उतारकर।
लब मुस्कुराए भी तो क्या, आँखें बयाँ कर बैठीं राज,
छुपा न सका दिल का आलम, हर इक नजर को टालकर।
वो हर किसी में ढूँढती है शायद मेरी परछाईं,
मैं रह गया हूँ खामोशियों में खुद को टटोलकर।
मेरी बाँहों में कोई उतरती नहीं अब उम्रों से,
बैठा हूँ तन्हाई की छत पर, सारी प्यास समेटकर।
कई बार चाहा उसे भुला दूँ इस कदर,
पर लौट आता हूँ उसी मोड़ पर, सब कुछ भुलाकर।
वो जो गया तो लौट कर देखा भी नहीं पीछे,
मैं रह गया उस रास्ते को हर रोज़ सँजोकर।

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बिहार मेरा, अनमोल बड़ा


बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ.
तेरी गोद में मैं खेला
वही रंग मेरा तुझपे गया.
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ।

वहीं पिता की ऊँगली पकड़ कर मैं चला
वहां दौड़ा और फिर बड़ा हुआ.
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ।

वहीं तूने झुलाया झूलों पे
वहीं लोरी तुम्हारी सुनकर मैं सोया।
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ।

वहीं नाम मिला, वहीं प्यार मिला
वहीं सरसों का तेल देह पे चढ़ा.
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ.

वहीं आम के बाग़,
वहीं मछली के तालाब।
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ.

कितना भी मैं कमा लूँ ताज
कितना भी मैं बना लूँ ताज
फिर भी वो सुकून नहीं
की मिट्टी में वह जो फूल खिला।
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ.

रिश्ता ना फिर ऐसा मिला
दिल ना कहीं फिर ये जुड़ा।
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ

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शायर वही जो फ़िराक है


शायर वही जो फ़िराक है,
बाक़ी सब तो इश्क़ में बर्बाद हैं,
हमने चाहा जिसे वो आबाद है,
गोद में खिला रही नन्हीं जान हैं।

शहर वही जहाँ उसके पाँव हैं,
बाक़ी सब तो धूल, राख, ख़ाक हैं।
दिल वही जो उसके लिए धड़के,
बाक़ी सब तो बस बेजान हैं।

जिस पल में उसका जिक्र हो,
वही लम्हा मेरा इनाम है.
मेरी हर दुआ में उसका नाम है,
हर ख़ुशी लगती, उसका पैगाम है.

जिसे चाहा वो पराया निकला,
हम उस हसरत की ही मिसाल हैं.
मौत भी शरमा जाए देखकर,
हम ऐसे ख़ामोश सवाल हैं।

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तेरी ही रूह से बगावत कर दे


आ, जामने भर की बंदिशें तोड़कर
जिस्मों को ज्वाला कर दे।
शांति की हर राह मेरी जाती है
तुम्हारे वक्षों पे.
आ, इन्हे अब आजाद कर दें.

तुम्हारे कठोर अंगो से टकराएं
झूम-झूम कर,
आ, इन धीमी हवाओं को तूफ़ान कर दे।
शर्म से झुकी इन नजरों को
लाज के भंवर से निकाल कर
आ, इन्हे सुलगती आंच कर दें।

उलझा कर साँसों को साँसों से
आ, धड़कनों को बेताब कर दें।
मचल उठे,
तेरा अंग – अंग छूने को मुझे, इस कदर
की तेरा जिस्म,
तेरी ही रूह से बगावत कर दे।

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Between Heat and Heartbeat


Enjoy your bath and rule my heart,
Steam wraps around you, a work of art.
The night is heavy, my body still,
Yet my mind roams where I’ve no will.

I wish you were here, not far away,
To trace the drops that slip and play,
Down your curves, like silver streams,
Lost between my waking dreams.

Water beads upon your skin,
Gliding slow, where I have been.
Each ripple whispers, calls my name,
Ignites my pulse, fuels my flame.

Fingers trace your dampened strands,
How I long to take your hands,
Pull you close, breathe you in,
Drown in love, lost in sin.

Enjoy your bath—your body’s glow,
But know my thoughts still overflow.
If only distance could unwind,
You’d be here, your lips on mine.

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मन को साधना ही, तो साधना है


मन को साधना ही, तो साधना है
बह गए जो इश्क़ में, तो ताउम्र बहना है.
वो नजर नहीं है तेरी कामना में
वो तो माया का एक छलावा है.
धोखा तो उससे भी आगे हैं,
जब बाहों में लेके, ठोकरों में तौला है.

सच की तलाश में भटके कई,
हर जिस्म में बस एक धोखा है।
जिसे चाहा दिल से अपना बना लें,
वो ही हर बार निकला बेवफा है।
अब ना आस लगती किसी चेहरे से,
ना दिल को कोई सपना भाता है।
मन को साधना ही, तो साधना है
वरना हर चाह में बस ताउम्र बिखरना है।

हर मुस्कान में अब डर सा है,
हर क़सम के पीछे एक पर्दा है।
जिसे समझा था रूह का रिश्ता,
वो भी दिल का एक सौदा निकला है।
अब न रंज है, न कोई शिकवा,
बस खुद से मिलने का वादा है।
जिसे पाना समझा था मंज़िल कभी,
अब उसे भूल जाना इबादा है।

मन को साधना ही, तो साधना है
इश्क़ में बहना नहीं — संभलना है।

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मुझसे मेरी तन्खा ना पूछ


मैं तन्हा हूँ तन्हा तुम्हारे लिए
मुझसे मेरी तन्खा ना पूछ।
मेरे नसों में है साँगा का ख़ून
मेरे दर्द की दवा ना ढूंढ।

मैं सुलगता रहा तेरी चाहत में
अब बुझने की वज़ह मत पूछ।
तेरी यादें हैं धुएँ की मानिंद,
इनमें मेरा वजूद मत ढूंढ।

हर मोड़ पे तेरी ही चर्चा रही,
कहाँ छूटे थे—अब मत पूछ।
मैं छुपा बैठा हूँ अपने आप में,
इस दिल की धड़कन मत सूंघ।

अगर जान सको तो जान लो मुझे,
हर बात की सफ़ाई मत पुछ।
मैं बिखरा हूँ उस नाम के साथ,
जिसे अब तू भी नहीं ढूंढ।

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ये वीरों की है अधूरी गूँज


मैं तन्हा हूँ तन्हा तुम्हारे लिए
मुझसे मेरी तन्खा ना पूछ।
मेरे नसों में है साँगा का ख़ून,
मेरे दर्द की दवा ना ढूंढ।

मैं लड़ा अपने जज़्बातों से
जैसे सांगा ने घायल जूनून।
हर ज़ख्म में एक हल्दीघाटी है,
हर साँस में राजपूताना का जुनून।

मेरी आँखों में धूल नहीं, धुंध है,
इस इतिहास को मुझसे मत पूछ।
मैं टूटा हूँ जैसे चित्तौड़ की दीवारें,
मुझमे किले की मूरत मत ढूंढ।

वो जो पूछे हैं दिल की बातें,
उन्हें रणभूमि की राख सूंघ।
ये प्रेम नहीं कोई कविता मात्र,
ये वीरों की है अधूरी गूँज।

मैं चुप हूँ तो समझ लेना ये,
मौन भी एक शौर्य की पुँछ।
जो गिरा नहीं हारा नहीं कभी,
उसका बेटा हूँ — मत पूछ।

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वो जो आग बन गई


उसकी नज़र है जो याद, आती बहुत है
उसकी कमर है, जो आग लगाती बहुत है।
नाज़ुक बदन पे बक्षों का भार, पहले चोली,
फिर दुपट्टा, अब किताबें उठाती बहुत हैं।

शर्म वो जो समंदर डूब जाए,
भँवर वो जो भँवरा भूल जाए।
उसके रसीले अधर, वो जाम जो,
हिम्मत बढ़ाती बहुत है।

बालों की लट है, जो बादलों को लूट लाए,
काजल की रेखा, जो नींदें उड़ाए।
ज़ुल्फ़ों के साए वो जो, जिस्म ही नहीं,
परछाईं तक को बहकाती बहुत है।

चाल में नज़ाकत, निगाहों में फ़ितरत,
लफ्ज़ों में शोला, अदाओं में राहत।
वो जब भी हँसे, क़सम, मौसम, कायनात —
हर दिल को शायर बनाती बहुत है।

अब वो न ज़ंजीरें सहती है ज़ालिम,
न चौखट पे रुकती है बग़ावत की आलिम।
कसम ले कि कह दूँ, अब वो नाजुक औरत, परी या मल्लिका नहीं —
इक तूफ़ान है, जो हर सीने में उठती बहुत है।

जिस्म पे जो नज़रों की तिजारत रखे,
उन नज़रों में अब आग भरती बहुत है।
जो पूछे ‘तेरी औक़ात क्या है?’
हँस के कहे — इंकलाब करती बहुत है।

ना बिंदी, ना चूड़ी, ना परदे का डर,
अब लब पे है सच, आँखों में है नज़र।
वो पंख पसारे जो उड़ चली एक बार,
ज़मीं क्या, ये अम्बर भी जलती बहुत है।

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