अभी अधरों को वक्षों पे लगाया था


अंग – अंग खिल कर,
हिमालय हो गए हैं.
वो कहती है,
की ये नाजुक बड़ी है.
अभी – अभी अधरों को,
वक्षों पे लगाया था.
और वो हैं की,
उनपे चोली कस रही हैं.
अभी सिलवट तक टूटी नहीं,
और चादर भी कोरा ही है.
मैंने जुल्फों को बस,
अभी छुआ ही तो था.
और वो हैं की अपनी,
चुनर समेटने लगीं हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जिस पे रख देती थी वो अपना दुप्पटा


वो क्या समझेंगें इश्क़ को?
जिनकी उम्र गुजर गयी.
हमारी जवानी तो बंध कर रह गयी,
कालेज के उस दीवार से.
जिससे चिपक गयी थी वो सहम के,
या शायद शर्म से,
जब थमा था हमने उन्हें अपने बाँह में.
वो क्या समझेंगें इश्क़ को?
जिन्होंने प्राप्त कर लिया महबूब के जिस्म को,
हमारी तो नजर टिकी रह गयी,
आज तक कालेज के उस दिवार पे.
जिस पे रख देती थी वो अपना दुप्पटा,
जब कसता था मैं उन्हें अपनी बाँह में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कहीं चोली मेरी खुल गयी


दिले – नादानी में,
कई कहानी बन गयी.
कहीं चुनर मेरी ढलकी,
कहीं चोली मेरी खुल गयी.
किसी के निशाने पे थी मैं,
तो किसी के निशाने पे था दिल.
किस -किस को संभालती,
थी बड़ी मुश्किल।
नई-नवेली मेरी जवानी में,
कई कहानी बन गयी,
कहीं पायल मेरी टूटी,
कही मेरी कमर ही टूट गयी.
रस पी कर,
उड़ गए सारे ही भौरें।
मैं बनना चाही जिसकी,
वो सौतन मेरी ले आएं.
कच्ची पगडण्डी पे,
कई कहानी बन गयी.
कहीं तिजोरी मेरी लूटी,
कही मैं ही पूरी लूट गयी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मेरा खाट अभी तक कुंवारा है


तू माँ बन गयी चार बच्चों की,
मेरा खाट अभी तक कुंवारा है.
तेरे हुस्न का चर्चा गली-गली में,
मेरे कुंवारेपन का ढिंढोरा है.
जगमग करते महल में,
तू सोती है दिया भुझा के,
मेरे जीवन में बस अँधियारा है.
चालीस में भी बलखाती है तू,
जाने किसको रिझाने को,
मेरे बुढ़ापे का अब तक ना कोई सहारा है.
तू माँ बन गयी चार बच्चों की,
मेरा खाट अभी तक कुंवारा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

तू माँ बन गयी चार बच्चों की


मैं आशिक़ हूँ तेरी नजरों का,
रहता हूँ मयखाने में,
तू माँ बन गयी चार बच्चों की,
मैं बैठा हूँ बंजारों में.
जाने क्या मिल गया तुझे?
चंद लकीरें मिटा कर.
सोना – चाँदी से तन तेरा शोभे,
हम जुगनू बन रह गए अंधेरों में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

I just need your strong biceps


You cannot be a man,
Until you hold my waist.
It does not mater,
How old you are?
I just need your strong biceps.
You cannot be a man,
Until you hold my waist.
All diamonds and rings,
I can scarify to be your dream.
It does not matter,
How poor you are?
I just need a strong house.

 

Parmit Singh Dhurandhar

टकटकी लगी है तुम्हारे वक्षों पे


तुम्हारी जवानी का नशा ही ऐसा है प्रिये,
बस आँखों ने संभाला है मुझे।
टकटकी लगी है तुम्हारे वक्षों पे,
सावन भी उतर आया है जिसपे खेलने।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तन्हाई में कट रहीं हैं ये चांदनी राते


कोई मिलता ही नहीं, जिसे अपना कह सके,
तन्हाई में कट रहीं हैं ये चांदनी राते।
किसको नहीं है शौक ओठों के जाम का,
बेबसी बन गयीं हैं ये जवानी की साँसे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न को समझना आ गया


मेरे अश्कों पे तुम्हे मुस्कुराना आ गया,
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
जिसकी सत्ता है, तुम शौक़ीन उसकी,
चंद सिक्कों पे, तुम्हे आँचल ढलकाना आ गया,
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
नियत तुम्हारी हमसे अच्छा कौन समझेगा?
जिसे दौलत की चमक पे थिरकना आ गया.
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.
औरत को वफादार लिखने वालों की कलम,
पे मुझे शक है,
जिन्हे चार दीवारों के अंदर चादर बदलना आ गया.
मेरी जान, मुझे भी अब हुस्न को समझना आ गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चोलिये में फँसल बा


तहार चोलिया के तोड़ के बटन रानी,
आज कहबू त हो जाइ खुले – आम रानी।
ऐसे भी जानअ ता सारा ई जवार रानी,
तहार चोलिये में फँसल बा हमार जान रानी।

 

परमीत सिंह धुरंधर