I was crazy for you


I was crazy for baby you,
But I got a new crew.
Once I was on the floor,
Wine looked better than you.
For full four hours,
I got a memory loss.
I know you are angry,
But that was not my fault.
With the dim light and music on,
Wine looked hotter than you.
I was crazy for baby you,
But I got a new crew.
Once I was on the floor,
Wine looked better than you.

 

Parmit Singh Dhurandhar

बुढ़ापे का चिराग


जो इंसान,
परेशान है सारे शहर में.
शायद वो किसी का,
बाप हैं.
शायद उसका पुत्र,
पड़ गया है किसी के इश्क़ में.
और उसके बुढ़ापे का,
वो एक ही चिराग है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शमा के आगोस में


समंदर जब अपने ज्वार-भाटे के उबाल पे था,
तब कसा था मैंने उसे अपने बाहों में.
मेरे मिटने के बाद, उतारी हैं जमाने ने,
कस्तियाँ अपनी उसके लहरों पे.
वो जो बखान करते हैं महफ़िल-महफ़िल
अपनी रातों का.
नहीं जानते की कितने परवाने सोएं हैं,
उनसे पहले, उनकी शर्मीली शमा के आगोस में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


ज़माने भर की दौलत कमा कर भी,
एक प्यास नहीं मिटती।
खूबसूरत जिस्म को पाकर,
रातें तो काट जाती हैं.
मगर अपनी मिटटी की सरहदों से दूर,
वो मीठी नींदें नहीं मिलती।
किस्मत में सबकुछ पाकर भी,
कितना तरपता हूँ माँ तेरे लिए.
की आज भी मेरी थाली की रोटियों में,
वो खुश्बूं तेरे हाथों की,
और वो स्वाद नहीं मिलती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बिस्तर की चाहत


बिस्तर की चाहत क्या होती है?
ये उन जाड़े की रातों से पूछो।
जिनके ख्वाब टूट जाते हैं,
सुबह की किरणों से.
चादर की सिलवट क्या होती है?
पूछों उन रातों से, जो ढल जाती हैं,
अपने अधूरेपन को छुपाने में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


हम उन मयखानों के नहीं,
जिनके प्याले टूटते नहीं।
हम उन सितारों के भी नहीं,
जो अपनी चाल बदलते नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।
उस चाँद की आशिकी ही क्या?
जिसमे कोई दाग नहीं।
उस दरिया की मस्ती ही क्या?
जो अपने किनारों को डुबाता ही नहीं।
हमने तो इश्क़ उससे किया,
जिसका नाम आज तक वफादारों में नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ की रोटियां


जवानी का खेल है,
किसी के इश्क़ में रोना।
बुढ़ापे के आंसू तो बस, निकलते है,
याद कर माँ की लोरियाँ।
आसान नहीं,
हाथों को जला कर सेकना रोटियां।
समजह्ते हैं ये तब,जब थाली में,
पड़ती हैं जाली-भुनी रोटियां।
जावानी का खेल है,
सितारों में चाँद का देखना,
बुढ़ापे में तो,
चाँद-तारों,सबमे दिखती हैं,
बस माँ की ही रोटियां।
यूँ उम्र गुजार दी,
जिसे पाने को.
उसे पाकर, याद आती हैं,
बस माँ की रोटियां।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

शर्म


वो भूल गयी हमको,
अपने इश्क़ के जद्दोजहद में.
उन्हें अब कुछ याद नहीं,
अपना घर बसाने के कसमोकस में.
मगर आज भी नहीं बदला हैं,
उनका वो एक अंदाज।
वो बाजार में मुस्काराती हैं, आज भी,
अपने आँखों में शर्म को उतार के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वफाओं पे रोती हैं


हमसे क्या पूछते हो?
किनारों पे घर कैसे बनायें?
कई शहर डूबे हैं,
इन किनारों पे बसकर।
शौक किसे नहीं,
की सागर की लहरों पे खेले।
मगर कस्तियाँ नहीं उतारते इनमे,
दिल में जुल्फों का ख्वाब रखकर।
खुदा भी उसका नहीं,
जो इश्क़ में, हुस्न पे, आँख मूंद ले.
वफाओं पे रोती हैं ये, बेवफाओं के आँगन में,
अपने वफादारों को मिटा कर.

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


मैंने इश्क़ किया उस दरिया से,
जिसकी धारा के कई किनारे हैं.
मैं क्या बाँधूँ उसकी लहरों को,
जो बस खारे – सागर के ही प्यासे हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर