स्त्री


सत्य की पूजा नहीं होती,
धर्म की चर्चा नहीं होती।
वेदों को जरूरत नहीं,
जिन्दा रहने के लिए,
की मनुष्य उसे पढ़ें।
वेदों की उत्पत्ति,
मनुष्यों से नहीं होती।
तैमूर, चंगेज, क्या?
सिकंदर भी थक गया था,
यहाँ आके.
ये हिन्द है,
यहाँ तलवारो के बल पे,
तकदीरें सुशोभित नहीं होती।
वो जितना भी सज ले,
तन पे आभूषण लाद के.
मगर, यहाँ, बिना शिशु को,
स्तनपान कराये,
नारी कभी पूजित नहीं होती।
घमंड किसे नहीं,
यहाँ सृष्टि में.
बिना अहंकार के,
सृष्टि भी शाषित नहीं होती।
तीक्ष्ण बहुत है तीर मेरे,
मगर बिना तीक्ष्ण तीरों के,
शत्रु कभी पराजित नहीं होती।
मुझे संतोष है,
की वो वेवफा निकली।
क्यों की बिना बेवाफ़ाई के,
कोई स्त्री कभी परिभाषित नहीं होती।

 

परमीत सिंह धुरंधर

तनी कमर नपवा जा


तनी घूँघट में छुप के गोरी,
दालान में आजा.
भरल दुपहरिया में ठंडा,
दही-चूरा खिला जा.
अबकी के कटनी में,
नया कमरघानी बनवा देम.
तनी अंचरा गिरा के गोरी,
कमर नपवा जा.
छोड़ अ अब कहल,
बाबुल के प्रेम के कथा।
तनी फुरसत में,
तोता -मैना के किस्सा वाच जा.
अब की के दवनी में,
नायका लहंगा दिलवा देम.
तनी अंचरा गिरा के गोरी,
कमर नपवा जा.
कब तक माई-भाई के चिंता में,
जोबन के बांध बू.
कभी फुरसत में,
हमसे तेल लगवा जा.
अबकी के फगुवा में,
नायका चोली सिलवा देम.
तनी अंगिया हटा के,
जोबन नपवा जा.
तनी घूँघट में छुप के गोरी,
दालान में आजा.
भरल दुपहरिया में ठंडा,
दही-चूरा खिला जा.
अबकी के कटनी में,
नया कमरघानी बनवा देम.
तनी अंचरा गिरा के गोरी,
कमर नपवा जा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

आँखें तुम्हारी बड़ी बड़ी


आँखें तुम्हारी बड़ी बड़ी,
ये जुल्फे बिखरी सी l
क्या बात है हुस्न का तुम्हारे सनम,
हर दिल में तुम्ही उतरी सी l
है नशा जो तेरी आँखों में,
हम मयखाने में क्यों जाये l
है वफ़ा जो तेरी साँसों में,
हम पैमाना क्यों छलकाए l
तुमको पिलाना है पिला दो
मदहोश बनाना है बना दो l
तुम्हारे खूबसूरत जिस्म पे,
लहराता हुआ आँचल,
पागल करता है हमें,
तुम्हारी जुल्फों का बादल l
तुम्ही हो जब सावन की बदली,
हम कहीं और क्यों भींग जाए l
है वफ़ा जो तेरी साँसों में,
हम पैमाना क्यों छलकाए l
दिल में आग सी आप बसे हो,
कल नहीं आज नहीं बरसो से छुपे हो l
जब नाम आपका है गुनगुनाने को,
हम कोई और नगमा क्यों गाए l

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न – इश्क़ का अंतर


ऐसे नहीं होता शिकार,
इश्क़ में, जिस्म का.
फिर अंतर ही क्या रह जाएगा?
हुस्न से, इश्क़ का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

निरीह, सुसुप्त, वक्ष


मिल जाती है सबको ही सोहरत,
बाजार में.
ये सोहबत है, जो मिलती है,
बस पाठशालाओं और मयखानों की,
बंद दीवार में.
उनका आँचल है जो,
चुपके से सरक जाता है,
हर एक रात.
वक्षों को छोड़कर,
अकेला, निहत्था,
मझधार में.
ये तो सोहबत है, लबों की,
जो अपनी प्यास मिटाने को,
कर देता है आगे,
निरीह, सुसुप्त, वक्षों को,
भीषण संग्राम में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

निकाह होने के बाद


मेरी मोहब्बत में,
उन्होंने एक खुसनुमा गुनाह,
कर दिया।
दिल मेरे नाम,
और जिस्म किसी और,
को कर दिया।
निकाह होने के बाद भी,
उनके नैनों के जाम मेरे हैं.
उन्होंने अपनी हया मेरे,
और बेहयाई किसी और के,
नाम कर दिया।
मत पूछ,
हुस्न से इस भेद का राज.
यही तो है, जिसने
जिस्म और दिल के आग,
को अलग – अलग कर दिया।
अब भी शिकायतें करते हो,
तुम हुस्न से.
अरे तुम्हारा पौरष क्या है?
इनके आगे.
इन्होंने अपने दो बाहों से ही,
कितनों के आँगन को,
गुलजार कर दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जॉन – बिपाशा – करण: एक त्रिकोण


जैसे ही मैंने बिपाशा को अपनी बाहों में खींचा अपने ओठों के करीब, उसने मेरे कानो में धीरे से कहा, “तुम बाप बनने वाले हो.” बिजली के एक झटके से मैं उससे अलग होके, बिस्तर से कूद पड़ा.
मैं, ” ये क्या कह रही हो तुम? ये कैसे हो गया?”
बिपाशा सिर्फ मुस्करा रही थी जैसे मैंने कोई बेवकूफी कर दी हो. कुछ देर यूँ ही मुस्कराते और मुझे देखने के बाद उसने कहा, “तुमने ही तो किया है, इसमें इतना परेशान होने की जरुरत नहीं। मैं सब संभाल लुंगी, तुम्हे कुछ करने की जरुरत नहीं।”
मैं, “लेकिन बिपाशा, हम ने ये तय किया था न की अभी तीन – चार साल नहीं। चलो कल जाके गर्भपात करा लेंगे।”
बिपाशा, “देखो मुझे नहीं पता क्या तय हुआ था. मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाली। ये मेरा सपना है. एक औरत मातृत्व के सुख के बिना अधूरी है. और, मैं ३५ की हूँ, चार साल मैं नहीं रुक सकती। मैं सिर्फ तुम्हे बता रही थी क्यों की अब पांचवा महीना है. मैं गर्भपात नहीं कर सकती।”
इतना सुनते ही मेरे पाँवों की जमीन खिसक गयी. मैंने कहा, “तुमने मुझे इतना बड़ा धोखा दिया। अगर तुम्हे मातृत्व का सुख ही चाहिए था तो जॉन के साथ ही ये सुख ले लेती।” इतना कह के मैं बाहर आ गया और सिगरेट सुलगा ली. वो अकेली कमरे में थी, मैंने उसकी दुखती नब्ज दबा दी थी.
कुछ देर बाद वो आयी और गले से लिपटते हुए बोली, “करण, तुम्हे पता है, जॉन ना तो शादी करना चाहता था ना ही वो बच्चा चाहता था. तुम अगर चाहते हो तो तलाक ले लेंगे, लेकिन मैं ये बच्चा चाहती हूँ.”
मैं, “बिपाशा, ये तो धोखा ही है न. तुम १० साल रही जॉन के साथ, लेकिन वो नहीं चाहता था, इसलिए तुमने अपने औरत बनने के सुख को ठुकराया। अब उस सुख के लिए तुमने मेरी आकांक्षाओं की परवाह नहीं की. इसका एक ही मतलब हैं की तुम्हे मुझसे प्रेम ही नहीं, तुमने सिर्फ बच्चे के लिए शादी की. अगर तुम्हे सिर्फ बच्चा ही चाहिए था तो तुम बिना जॉन को बताये भी तो कर सकती थी.”
बिपाशा, “तो क्या तुम दूध पीते एक बच्चे हो? तुम्हे नहीं पता था की शादी क्यों की जाती है? तुम सब मर्द एक से हो, तुम्हे सिर्फ जिस्म चाहिए। मैं उस समय तैयार नहीं नहीं माँ बनने के लिए. जब मेरा मन था तो जॉन शादी नहीं करना चाहता था. बिना शादी किये मैं माँ नहीं बन सकती थी
अगली सुबह, मैंने खुद को समझाया और बिपाशा के पास जाके माफ़ी मांगी और उसे डॉक्टर के पास जाने को बोला। उसने बताया, “मैं डॉक्टर से मिल आयी हूँ, मैं ठीक हूँ.” नौ महीने बाद मैं एक बच्चे का पिता और बिपाशा माँ बन चुकी थी. एक साल बाद जूनियर करण के जन्मदिन पे बिपाशा जिद पे अड़ गयी की जॉन को बुलाएँगे। मैं अचंभित था क्यों की उसी के चलते मैंने जॉन से बोलचाल बंद की, उसे शादी में नहीं बुलाया। बिपाशा, “जॉन मेरा एक अच्छा दोस्त हैं, उसने मुझे हर मोड़ पे सहयोग दिया है. मुझे नहीं समझ में आता, तुम्हे उससे क्या दिक्कत है.” अंत में मैं मान गया.
और आज तीन महीने बाद, हम दोनों का तलाक हो गया. बिपाशा फिर से जॉन के साथ रहने लगी हैं. मुझे कभी – कभी लगता है की उसने बस मुझसे बच्चे के लिए शादी की या जॉन को पाने के लिए. पत्रकारों को उसने तलाक के बाद कहा, ” मैं एक स्वभिमानी, स्वतंत्र, स्वयं पे निर्भर हूँ, मैं अपने बच्चे का लालन -पालन कर सकती हूँ. मैं आज की भारतीय नारी को एक संदेस देना चाहती हूँ की वो अपने बच्चे के लालन-पालन के लिए अपने पति पे निर्भर न रहें। मुझे ख़ुशी है की मेरा सच्चा दोस्त जॉन मेरे इस निर्णय के समय मेरे साथ है. और हाँ जॉन सिर्फ  मेरा दोस्त है, उसका अपना परिवार है, आप कृपया कुछ और न समझे।”

 

परमीत सिंह धुरंधर

चुनर सरक जाए


अंखिया -से – अंखिया ऐसे मिलाव गोरी,
ताहर चुनर सरक जाए, और उड़ जाए मेरी नींद गोरी।
देहिया – के – देहिया के पास, अतना लाव गोरी,
की ताहर कंगन खनक उठे, और हमार दिल गोरी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


हमने इश्क़ किया जो,
तो समंदर भी रो पड़ा.
हालात ही कुछ ऐसे बन गए,
की तूफ़ान भी डर गया.
किश्ती हमारी,
गैरों की हो गयी,
मजधार में लहरों ने,
किनारा कर लिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो ख्वाब भी तो न रहा


जो मुझे यकीन दिला दे,
वफाये – मोहब्बत का,
ऐसा तो कोई हुस्न नहीं।
और उनके अंगों से मोहब्बत हो जाए,
मेरा अब वो दौर भी तो नहीं रहा.
जो भी मिलती हैं,
मिलती है बस अपनी चोली को कसकर।
उन्हें क्या पता?
की इन आँखों में वो ख्वाब भी तो न रहा.

 

परमीत सिंह धुरंधर