संसार


तुम मिले तो ख्वाब बने,
बन गया पूरा संसार।
और कोसिस की जो तुम्हे पाने की,
तो एक -एक कर, टूटा हर ख्वाब।
तुमने छल लिया नैनों से,
जाम छलका- छलका के.
तुम मिले तो प्यास जगी,
जग गयी पूरी हर रात.
और कोसिस की तुझे पीने की,
तो एक -एक कर, टूटा हर जाम.
तू बलखाई, तू अंगराई,
तू शरमाई हर रंग में.
और जो कोसिस की तुझे,
थामने की,
तो मिट गया हर प्यार।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो अपने वक्षो पे चोली कस रही हैं


नादाने – दिल को संभालो यारों,
की दरियाँ में आग लग रही है.
प्यास है की मेरी मिटती नहीं,
और वो अपने वक्षो पे चोली कस रही हैं.
बस दो घड़ी का ही है प्यार उनका,
जिसकी कसमे को वरसों से खाती थी.
की अभी जी भर के चूमा भी नहीं,
और वो अपनी अंगिया पहन रही हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ये जवानी तेरे वक्षों पे गुजरे


जिंदगी का हर बंधन, तन्हाई में गुजरे,
मगर ये जावानी तेरे संग एक चटाई पे गुजरे।
तू सरक न सके, मैं सरकने ना दूँ,
तू पलट न सके, मैं पलटने ना दूँ.
इसी जद्दोजहद में, पूरी रात यूँ ही लड़ाई में गुजरे।
मगर ये जावानी तेरे संग एक चटाई पे गुजरे।
तू सोचे की तेरे माँ – बाप ने कहाँ बाँध दिया,
मैं सोचूं की कमबख्त ये कहाँ फंस गया.
इसी पेशोपश में उम्र का हर लम्हा गुजरे।
मगर ये जवानी तेरे वक्षों पे गुजरे।
जिंदगी का हर बंधन, तन्हाई में गुजरे,
मगर ये जावानी तेरे संग एक चटाई पे गुजरे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कोयल से बोला काग रे


मधुर – मिलान की आस में,
कोयल से बोला काग रे.
कभी तो आके बैठ ज़रा,
मेरी इस डाल पे.
तू भी तो देख जरा आके,
कितना यहाँ सूनापन,
और कितनी मुझमे तेरी प्यास रे.
मधुर – मिलान की आस में,
कोयल से बोला काग रे.
तू भी काली, मैं भी काला,
फिर भी दुनिया तुझको पूजती।
छल लेती है हर बार तू मुझे,
फिर भी जग को सच्ची तू ही दिखती।
कभी तो समझ इस दिल को तू,
ये कितना अकेला और बेताब रे.
मधुर – मिलान की आस में,
कोयल से बोला काग रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बहती रहूँ यूँ ही


दरिया – दरिया इश्क़ करूँ मैं,
सागर-सागर प्रीत रे.
तू जो रहे हर किनारे पे मेरे,
बहती रहूँ यूँ ही, मैं, सदा – नित रे.
मेरी लहरें, मेरी हो कर भी,
रहती हैं सदा तेरी चाह में.
जल सी ठंठी हो कर भी मैं,
सुलगती रहती हूँ तेरी आस में.
तू जो मेरी लहरों पे ही हर कंकड़ मारे,
बहती रहूँ यूँ ही, मैं, सदा – नित रे.
दरिया – दरिया इश्क़ करूँ मैं,
सागर-सागर प्रीत रे.
तू जो रहे हर किनारे पे मेरे,
बहती रहूँ यूँ ही, मैं, सदा – नित रे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


शरीर कितना भी थक जाए माँ का,
मन नहीं थकता।
पुत्र अगर समीप हो तो,
घर का चूल्हा कभी नहीं बुझता।
जो भी चाहो, जब भी चाहो,
पक कर गर्म थाली में मिलता।
शरीर कितना भी थक जाए माँ का,
मन नहीं थकता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

खता तुम्हारी माफ़ कर दूंगी


तुम रात भर बैठों मेरे पास आकर,
मैं दिनभर सपने देख के गुजारा कर लुंगी।
तुम बस मेरे साँसों को छू दिया करो इन ओठों से,
मैं हर खता तुम्हारी माफ़ कर दूंगी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ करो उससे


इश्क़ करो उससे,
जो तुमपे तंज कस दे.
वरना हुस्न तो सदा से बिछता रहा है,
क्रूर शासकों के नीचे।
वो घर बसा दें, या तुम्हे औलादें दे दें,
इसे उनकी मोहब्बत मत समझों।
कुछ तो उनकी भी जरूरतें हैं,
वरना वो यूँ तुम्हारे आगे खामोस नहीं रहते।

 

परमीत सिंह धुरंधर

औरत – मर्द


वो जो कल तक,
मेरी किस्मत बदलना चाहती थी,
अब अपना घर बदल रही हैं.
मर्द बस बदनाम हैं इस बाजार में,
गली – गली में औरत अपना बिस्तर,
बदल रही है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में


अपने पिता के प्रेम में पुकारता हूँ प्रभु शिव तुम्हे,
मेरे पिता को लौटा दो,
मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में.
मुझे भय नहीं मौत का, ताप का,
बस मुझे गोद दिला दो फिर वही,
मैं विष धारण कर लूंगा अपने कंठ में.

 

परमीत सिंह धुरंधर