मोहब्बत में अपने ये रोजे


किस्से तो कई हैं,
बंद दीवारों के अंदर।
हौसलें नहीं है,
की कोई उनको खुले आसमान के तले पढ़े.
मेरी मोहब्बत कुछ इस कदर हैं उनसे,
की पलके बिछा दी,
उन्होंने जहाँ – जहाँ अपने कदम रखे.
जा चुन ले किसी को भी जमाने में,
मुझे छोड़कर।
हम फिर भी रखेंगे,
तेरी मोहब्बत में अपने ये रोजे।

 

 

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो मेरे अंगों से खेले


वो मेरे अंगों से खेले,
तो हम समझें की आईने में कमी क्या है.
जमाना कहता है की,
करवा – चौथ मेरे पाँवों की बेड़ियाँ हैं.
वो क्या समझेंगे,
इन बेड़ियों को पहन के मैंने पाया क्या है.
आवो,
कभी सुन ले – सुना ले एक दूसरे को,
की तुमने औरत को हर विस्तर पे सुला के,
उसके संग सो के,
किन उचाईयों पे पहुंचा दिया.
और मैं एक व्रत कर करवा – चौथ का,
कौन सा एहसास जी लिया है.

 

 

 

परमीत सिंह धुरंधर

Spark


The color is dark,
But she has the spark,
That I need.
Who cares about the skin?
If she could touch my heart.

 

Parmit Singh Dhurandhar

बक्षों पे उठाया नहीं जाता


हुजूर, आपसे अब यहाँ उम्र का गुजर नहीं होता,
कुछ मिले हमें भी अब की यूँ तन्हा इसारा नहीं होता।
ढलें हैं चेहरे ही बस, मंसूबें अब भी जवानी की मौजों में हैं,
यूँ घूँघट में अब सब कुछ मुझसे बांधा नहीं जाता।
कब तक आईना दिखलाये मुझे भंवर मेरी योवन का,
अब आँचल का भार यूँ बक्षों पे उठाया नहीं जाता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ की नयी सहेली


माँ, देखो कैसे,
अपनी बच्ची की जुल्फों में,
कंघी फेर रही है.
माँ, देखो कैसे,
अपनी बच्ची को सजा रही है.
माँ, भूल गयी है खाना,
माँ, भूल गयी है पीना।
जब से माँ के जीवन में,
एक बच्ची आयी है.
हाथों के जलने का,
अब पता नहीं चलता।
ना सांझ के ढलने पे,
किसी के आने का इंतज़ार ही रहता।
माँ, फिर से हो गयी है ,
गावँ की अल्हड एक छोरी।
जब से माँ के जीवन में,
ये नयी सहेली आयी है.

Based on true incident.

परमीत सिंह धुरंधर

भोले – भाले खत्री


मेरे सैयाँ छैल – छबीले,
दिखाते हैं खूब रोआब।
जब चाहे पकड़ लेते हैं,
मेरी पतली कमर,
चाहे धुप हो या हो छावँ।
मेरे सैयाँ बड़े सजीले,
रखते हैं खूब ध्यान।
थक जाऊं थोड़ा भी,
तो दबा देते है पैर – हाथ.
मेरे सैयाँ खूब नखरीले,
तुनक जाते हैं हर एक बात.
मैं पकाऊं मछली,
तो मांगते हैं वो मांस।
मेरे सैयाँ भोले – भाले,
खत्री उनका नाम.
खोल नहीं पाते,
एक बटन चोली का,
मेरी कैसी फूटी किस्मत राम.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मीरा के मोहन


तुम्हारी नजर के हैं दीवाने सभी,
मेरी हर नजर में तुम्हीं हो तुम्हीं।
रुस्वा करो, तनहा रखो,
शिकवा कोई, कभी ना, कहीं।
अब इस जिंदगी में बस तुम्हीं हो तुम्हीं।
धूल में रहूँ, काँटों में रहूँ,
मुस्कराती रहूंगी, बस अपने चरण में रखो.
इस मीरा के अब मोहन तुम्हीं, तुम्हीं हो तुम्हीं।
एक विष सा है, ये सम्पूर्ण जीवन मेरा,
बनके प्रभु, अब इसकी लाज रखो.
हर अग्नि-परीक्षा, हंस कर दे दूंगी,
आजीवन, बस, तुम मेरे, केवल मेरे ही रहो.
की इस अबला सीता के,
अब राम बस, तुम्हीं हो तुम्हीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा से कटिहार तक


माँ ने कहा था बचपन में,
तुम लाल मेरे हो लाखों में.
तुम्हे पा कर मैं हर्षित हुई थी,
नाचे थे पिता तुम्हारे, जब आँगन में.
गोलिया चली थीं, तलवारे उठीं थी,
छपरा से कटिहार तक.
बाँट रहे थे सप्ताह – भर, रसोगुल्ला,
बड़े -पिता तुम्हारे, कोलकत्ता में।
दादी ने चुम्मा था माथा तुम्हारा,
गिड़ – गिड़ के पीपल पे.
दादा ने फुला के सीना,
खोल दिया था खलिहान, जन – जन में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

पुत्र मेरे, तुम नीलकंठ बनो


मैंने देखें हैं दिल के कई टुकड़े,
भिखरे हुए तेरे आँगन में.
रोते हो क्या तुम आज भी,
बैठ के मेरे यादों में.
बढे चलो, मुझे भूलकर,
ये प्रेम नहीं,
ये बेड़ियाँ हैं, तुम्हे रोकेंगी।
पुत्र मेरे, सबल बनो,
इस निर्बलता के केंचुल से.
जीवन में जो भी विष मिले,
ऐसे उसे धारण करों,
की अजर – अमर नीलकंठ बनो.
नागिन है ये दुनिया, बस बिष ही देगी,
उसपे नारी,
शल्य सा तुम्हारा मनोबल हरेगी।
पुत्र मेरे, तुम अपने हाथों से,
कुरुक्षेत्र में भविष्य गढों।
ना की भविष्य का चिंतन,
नारी के आगोस में बैठ के करो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मुख़ौटा


दिल जब टुटा तो समंदर भी छोटा हो गया,
हर रिश्ते पे मेरे एक मुख़ौटा आ गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर