चिंतन की कटारी हो


तुम शहर की धुप में लगती बड़ी प्यारी हो
तुम प्रिये अब भी हमारी चिंतन की कटारी हो.
लट तुम्हारी बूंदों में, बूंदें तुम्हारी लट पे
प्यास हमारी बिना मिटाये, दुप्पटे को भिंगो रही हो.

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नज़र तुमपे ही है


मेरी नज़र तुमपे ही है सनम
तुम हो कि, तुम्हें ही ना कोई खबर
तुम पढ़ती हो दुनिया भर की किताबें
बस मेरी ही किताबों पे नहीं तुम्हारी नज़र।

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कब तक बैठते हम फिर मेहँदी रचा के


बहुत देर कर दी हुजूर आते-आते
ना वो नजर ही रही, ना वो चिलमन रहा
कब तक बैठते हम फिर मेहँदी रचा के?
बहुत देर कर दी हुजूर आते-आते।

तेरा शौक है की छूटता नहीं
तू है की कुछ समझता नहीं
हम जल गए खुद ही बिजली गिरा के।
बहुत देर कर दी हुजूर आते-आते।

खुदा ये मोहब्बत ना दे अब किसी को
बहुत दर्द है इसमें हर एक मिलन पे
कितना लुटे हैं हम उनकी एक अदा पे।
बहुत देर कर दी हुजूर आते-आते।

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गजब की धुप


गजब की धुप में निखरा तेरा रूप
या निखरे तेरे रूप पे गिरती गजब की धुप
तेरी मुस्कान एक कातिल सी
या कातिल है तेरा मुस्कुराना खूब.

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फिर से इश्क़ किया


इतना सा दिल था, जा तोड़ दिया
तुझे भुला कर, फिर से इश्क़ किया।
कभी चाहा था तुझे, दुनिया भुला कर
तुझे भुला कर, अब फिर से इश्क़ किया।

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बिहार-दिवस


नजर ही नहीं आई, कब वो बेवफा हो गई
मोहब्बत भी तब हुई, जा वो पराई हो गई
ए मिट्टी तू कहीं, मैं कहीं, तेरी खुसबू,
मेरी शहनाई तो नहीं, मेरी तन्हाई हो गयी.

On Bihar Diwas, March 22, 2025.

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मेरी कहानी


तू आज तड़पाने में मसरूफ़ है,
कल तेरी तड़प मेरी कहानी होगी।

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Falling for Her Rise


She likes to rise,
But I like to fall—
Fall into the depths of her lap,
For her bosom, soft as night, cradles me whole.
She rises with strength, defiant and proud,
While I surrender, weightless, to her embrace,
Drawn to the quiet, the calm, the tender unknown.

Where she soars to conquer the skies,
I drift below, into her tides—
Not in defeat, but in reverence,
For the ocean of her being calls me home.
She rises with fire; I fall with grace,
Together, we dance in our perfect space.

For in falling, I do not lose—
I find the diamonds at the meeting of her thighs,
The treasures of love, of touch, of truth.
She rises, and I fall,
Two forces in motion,
Bound to the rhythm of one endless ocean.

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पहला प्यार बिहार जैसा


पहला प्यार कैसा होता है
बिहार जैसा।
उजाड़ हो गया जहाँ मेरा पर वही मेरा नशा है
कोई और उजाड़े उसे तो फिर दर्द होता है.
जाने कैसे बाँट लेते हैं लोग माकन और देश को
मैं पूर्वांचल का हूँ, पर वो मिथिलांचल मांगते हैं
तो दर्द होता है.
यूँ ही नहीं कहते हमें, बाबूसाहेब छपरा के
हमारे सीने में बिहार बसता हैं.

तेरी चुनर को मैं सजा न सका
ये तेरी विवशता, तेरी गरीबी नहीं है
ये मेरी नाकामी, मेरी वेवफाई हैं.
फटी, मैली -कुचैली कपड़ों में तू
आज भी मीठी सी शहनाई है.
हस ले ये दुनिया चाहे जितना भी
की ढल गयी तेरी जवानी, और
अब झुर्रिया हैं चेहरे पे
पर मैंने जी और देखि तेरी अंगराई है.

तेरी लचकती कमर पे बिहार मेरा
उलझती नज़र पे छपरा बसा
वादियाँ राजगीर की, वो वक्ष तेरे
विचरता है मन, हर प्रातः जहां।

तेरी जुल्फें सघन, उफनती नदी
अधर तेरे, कोई सोइ नागिन
पटना की प्यारी कचौड़ी गली
तेरी वो नाभि गहरी
भटकता है दिल, हर शाम जहां।

तेरी चाल, सोनपुर का वो मेला
जिससे जलता था लाखों का चूल्हा
वो कटाव, वो कसाव तेरा, गंगा का किनारा
लगती थी नाव मेरी, हर रात जहां।

ना मिली नौकरी, तू छोड़ गयी
जैसे पैसे के लिए छूटा गावं मेरा।
तेरी बाहें मेरा खलिहान
अब कोई और सो रहा है जहां।
तेरी यादें, तेरा चेहरा, बनारस
दिल का चैन, लुटा है जहां।

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छपरा लुटाईल बा


इहे कमरिया पे खेत कतना बिकाइल बा
देख ला हाल बाबूसाहेब के, छपरा लुटाईल बा.
जिनगी जवन रहे हरियर, उँहा अब पतझड़ आइल बा.
इहे कमरिया पे खेत कतना बिकाइल बा.

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